- ॐ विष्णवे नमः
- ॐ लक्ष्मीपतये नमः
- ॐ कृष्णाय नमः
- ॐ वैकुंठाय नमः
- ॐ गरुडध्वजाय नमः
- ॐ परब्रह्मणे नमः
- ॐ जगन्नाथाय नमः
- ॐ वासुदेवाय नमः
- ॐ त्रिविक्रमाय नमः
- ॐ दैत्यांतकाय नमः
- ॐ मधुरिपवे नमः
- ॐ तार्क्ष्यवाहनाय नमः
- ॐ सनातनाय नमः
- ॐ नारायणाय नमः
- ॐ पद्मनाभाय नमः
- ॐ हृषीकेशाय नमः
- ॐ सुधाप्रदाय नमः
- ॐ माधवाय नमः
- ॐ पुंडरीकाक्षाय नमः
- ॐ स्थितिकर्त्रे नमः
- ॐ परात्पराय नमः
- ॐ वनमालिने नमः
- ॐ यज्ञरूपाय नमः
- ॐ चक्रपाणये नमः
- ॐ गदाधराय नमः
- ॐ उपेंद्राय नमः
- ॐ केशवाय नमः
- ॐ हंसाय नमः
- ॐ समुद्रमथनाय नमः
- ॐ हरये नमः
- ॐ गोविंदाय नमः
- ॐ ब्रह्मजनकाय नमः
- ॐ कैटभासुरमर्दनाय नमः
- ॐ श्रीधराय नमः
- ॐ कामजनकाय नमः
- ॐ शेषशायिने नमः
- ॐ चतुर्भुजाय नमः
- ॐ पांचजन्यधराय नमः
- ॐ श्रीमते नमः
- ॐ शार्ङ्गपाणये नमः
- ॐ जनार्दनाय नमः
- ॐ पीतांबरधराय नमः
- ॐ देवाय नमः
- ॐ सूर्यचंद्रविलोचनाय नमः
- ॐ मत्स्यरूपाय नमः
- ॐ कूर्मतनवे नमः
- ॐ क्रोधरूपाय नमः
- ॐ नृकेसरिणे नमः
- ॐ वामनाय नमः
- ॐ भार्गवाय नमः
- ॐ रामाय नमः
- ॐ बलिने नमः
- ॐ कल्किने नमः
- ॐ हयाननाय नमः
- ॐ विश्वंबराय नमः
- ॐ शिशुमाराय नमः
- ॐ श्रीकराय नमः
- ॐ कपिलाय नमः
- ॐ ध्रुवाय नमः
- ॐ दत्तात्रेयाय नमः
- ॐ अच्युताय नमः
- ॐ अनंताय नमः
- ॐ मुकुंदाय नमः
- ॐ दधिवामनाय नमः
- ॐ धन्वंतराय नमः
- ॐ श्रीनिवासाय नमः
- ॐ प्रद्युम्नाय नमः
- ॐ पुरुषोत्तमाय नमः
- ॐ श्रीवत्सकौस्तुभधराय नमः
- ॐ मुरारातये नमः
- ॐ अधोक्षजाय नमः
- ॐ ऋषभाय नमः
- ॐ मोहिनीरूपधारिणे नमः
- ॐ संकर्षणाय नमः
- ॐ पृथवे नमः
- ॐ क्षीराब्धिशायिने नमः
- ॐ भूतात्मने नमः
- ॐ अनिरुद्धाय नमः
- ॐ भक्तवत्सलाय नमः
- ॐ नराय नमः
- ॐ गजेंद्रवरदाय नमः
- ॐ त्रिधाम्ने नमः
- ॐ भूतभावनाय नमः
- ॐ श्वेतद्वीपसुवास्तव्याय नमः
- ॐ सनकादिमुनिध्येयाय नमः
- ॐ भगवते नमः
- ॐ शंकरप्रियाय नमः
- ॐ नीलकांताय नमः
- ॐ धराकांताय नमः
- ॐ वेदात्मने नमः
- ॐ बादरायणाय नमः
- ॐ भागीरथीजन्मभूमिपादपद्माय नमः
- ॐ सतां प्रभवे नमः
- ॐ स्वभुवे नमः
- ॐ विभवे नमः
- ॐ घनश्यामाय नमः
- ॐ जगत्कारणाय नमः
- ॐ अव्ययाय नमः
- ॐ बुद्धावताराय नमः
- ॐ शांतात्मने नमः
- ॐ लीलामानुषविग्रहाय नमः
- ॐ दामोदराय नमः
- ॐ विराड्रूपाय नमः
- ॐ भूतभव्यभवत्प्रभवे नमः
- ॐ आदिदेवाय नमः
- ॐ देवदेवाय नमः
- ॐ प्रह्लादपरिपालकाय नमः
- ॐ श्रीमहाविष्णवे नमः
|| इति श्री महाविष्णु अष्टोत्तर शतनामावळि समाप्तं ||
अर्थ
श्री विष्णु अष्टोत्तरशतनामावलिः भगवान विष्णु को समर्पित 108 पवित्र नामों का एक संग्रह है। यह नामावलि भगवान विष्णु के विभिन्न रूपों, गुणों और दिव्य लीलाओं की स्तुति करती है। अष्टोत्तरशतनामावलि का अर्थ है 108 नामों की सूची, और हिंदू धर्म में 108 संख्या को विशेष रूप से पवित्र माना जाता है। इन नामों का पाठ करने से भक्त भगवान के साथ गहरा आध्यात्मिक संबंध स्थापित करते हैं। यह वेदों, पुराणों और आगम ग्रंथों से संकलित भगवान विष्णु के अनंत वैभव को व्यक्त करने वाला एक मंत्र समूह है।
इस अष्टोत्तरशतनामावलि का पाठ केवल नामों का उच्चारण मात्र नहीं है, बल्कि यह भगवान विष्णु के सभी गुणों का मनन करके हमारे मन को शुद्ध करता है। विष्णु सृष्टि के पालक, धर्म के रक्षक और मोक्ष के दाता हैं। उनका प्रत्येक नाम एक विशिष्ट गुण या लीला का प्रतिनिधित्व करता है। उदाहरण के लिए, 'विष्णवे नमः' का अर्थ है सर्वव्यापी भगवान को नमस्कार; 'लक्ष्मीपतये नमः' का अर्थ है लक्ष्मी के पति, सभी संपत्तियों के स्वामी को नमस्कार; 'जगन्नाथाय नमः' का अर्थ है जगत के स्वामी को नमस्कार। इस प्रकार, प्रत्येक नाम भगवान की अनंत शक्ति और करुणा को उजागर करता है।
इस नामावलि में 'त्रिविक्रमाय नमः' (तीन लोकों को मापने वाले को), 'दैत्यांतकाय नमः' (असुरों का नाश करने वाले को), 'पद्मनाभाय नमः' (नाभि में कमल धारण करने वाले को) और 'चक्रपाणये नमः' (चक्र धारण करने वाले को) जैसे नाम विष्णु के पराक्रम, संरक्षण शक्ति और सृष्टिकर्ता के रूप को दर्शाते हैं। ये नाम भगवान के ऐश्वर्य, ज्ञान, वैराग्य, शक्ति, बल और तेज को प्रकट करते हैं। भक्त इन नामों का जप करके, विष्णु के दिव्य गुणों को अपने जीवन में अपनाने की प्रेरणा प्राप्त करते हैं और उनकी कृपा के पात्र बनते हैं। यह स्तोत्र भक्ति के मार्ग पर आगे बढ़ने का एक शक्तिशाली साधन है।
नियमित रूप से इस अष्टोत्तरशतनामावलि का पाठ करने से मन को शांति, समृद्धि और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है। भगवान विष्णु के नामस्मरण से सभी पाप नष्ट होते हैं और पुण्य में वृद्धि होती है। कलियुग में नामसंकीर्तन ही मोक्ष का सबसे सरल मार्ग है, ऐसा शास्त्रों में कहा गया है। यह नामावलि भक्तों को भौतिक और आध्यात्मिक कठिनाइयों से बचाती है और उन्हें शांतिपूर्ण जीवन प्रदान करती है। प्रत्येक नाम एक मंत्र है, और इसका पाठ दिव्य शक्ति का आह्वान करता है तथा हमारे चारों ओर सकारात्मक ऊर्जा का निर्माण करता है।
लाभ (Benefits):
- पाप मुक्ति: विष्णु अष्टोत्तरशतनामावलि का नियमित पाठ पिछले और वर्तमान जन्मों के पापों को नष्ट करके आत्मा को शुद्ध करता है।
- समृद्धि और ऐश्वर्य: लक्ष्मीपति भगवान विष्णु के नामस्मरण से भक्तों को धन, धान्य, संपत्ति और समृद्धि की प्राप्ति होती है।
- मानसिक शांति: इन पवित्र नामों का जप करने से मन की चिंता, तनाव दूर होते हैं और आंतरिक शांति तथा सुकून प्राप्त होता है।
- सुरक्षा और निर्भयता: विष्णु सृष्टि के पालक होने के कारण, उनकी नामावलि का पाठ सभी प्रकार के भय, बाधाओं और नकारात्मक शक्तियों से सुरक्षा प्रदान करता है।
- आध्यात्मिक उन्नति: भगवान के गुणों का मनन करने से आध्यात्मिक ज्ञान बढ़ता है और मोक्ष का मार्ग सुगम होता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
श्री विष्णु अष्टोत्तरशतनामावलिः क्या है?
इस नामावलि का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
श्री विष्णु अष्टोत्तरशतनामावलि पाठ के क्या लाभ हैं?
यह स्तोत्र कौन पाठ कर सकता है?
इस नामावलि का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
इस नामावलि का मूल या उद्गम क्या है?
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