श्री विष्णु षट्पदी स्तोत्रं
अविनयमपनय विष्णो
दमय मनः शमय विषयमृगतृष्णां |
भूतदयां विस्तारय
तारय संसारसागरतः || 1 ||
दिव्यधुनीमकरंदे
परिमळपरिभोगसच्चिदानंदे |
श्रीपतिपदारविंदे
भवभयखेदच्छिदे वंदे || 2 ||
सत्यपि भेदापगमे
नाथ तवाऽहं न मामकीनस्त्वं |
सामुद्रो हि तरंगः
क्वचन समुद्रो न तारंगः || 3 ||
उद्धृतनग नगभिदनुज
दनुजकुलामित्र मित्रशशिदृष्टे |
दृष्टे भवति प्रभवति
न भवति किं भवतिरस्कारः || 4 ||
मत्स्यादिभिरवतारै-
-रवतारवतावता सदा वसुधां |
परमेश्वर परिपाल्यो
भवता भवतापभीतोऽहं || 5 ||
दामोदर गुणमंदिर
सुंदरवदनारविंद गोविंद |
भवजलधिमथनमंदर
परमं दरमपनय त्वं मे || 6 ||
नारायण करुणामय
शरणं करवाणि तावकौ चरणौ |
इति षट्पदी मदीये
वदनसरोजे सदा वसतु || 7 ||
इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य श्रीगोविंदभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य श्रीमच्छंकरभगवतः कृतौ षट्पदी स्तोत्रं संपूर्णं |
अर्थ
श्री विष्णु षट्पदी स्तोत्रं, आदि शंकराचार्य द्वारा रचित भगवान विष्णु की महिमा का गुणगान करने वाला एक अत्यंत शक्तिशाली और हृदयस्पर्शी स्तोत्र है। 'षट्पदी' का अर्थ 'छह पदों वाला' या 'छह श्लोकों वाला' होता है, यद्यपि इस स्तोत्र में सात श्लोक हैं, जिसमें अंतिम श्लोक स्तोत्र की समर्पण प्रार्थना है। यह भगवान विष्णु के विभिन्न गुणों, अवतारों और भक्तों के प्रति उनकी अपार करुणा का मनमोहक वर्णन करता है। यह स्तोत्र भक्त के मन से अहंकार, अज्ञान और संसार के भय को दूर कर, भगवान के चरणों में पूर्ण शरणागति को प्रेरित करता है।
इस स्तोत्र का आध्यात्मिक महत्व अत्यधिक है। प्रत्येक श्लोक विष्णु के एक विशिष्ट गुण को उजागर करता है, जो मन को शांत करने से लेकर संसार सागर से पार उतारने की शक्ति तक फैला हुआ है। पहले श्लोक में, भक्त विष्णु से प्रार्थना करता है कि वे अहंकार को दूर करें, मन को वश में करें, विषयों की मृगतृष्णा को शांत करें, सभी प्राणियों के प्रति दया का विस्तार करें और संसार सागर से पार उतारें। यह आंतरिक शुद्धि और आध्यात्मिक जागृति की ओर पहला कदम है।
अगले श्लोकों में, भगवान के दिव्य सौंदर्य, सच्चिदानंद स्वरूप और उनके चरण कमलों के आश्रय के महत्व का वर्णन किया गया है। दूसरा श्लोक कहता है कि विष्णु के चरणारविंद दिव्य मकरंद की तरह हैं, सच्चिदानंद की सुगंध से युक्त हैं, जो भव-भय और दुखों का नाश करते हैं। तीसरा श्लोक भगवान में अटल विश्वास पर जोर देता है – सागर और तरंगों के संबंध की तरह, भक्त भगवान से अलग नहीं है, बल्कि भगवान ही भक्त का सदा आश्रय हैं। चौथा श्लोक भगवान के शौर्य और रक्षात्मक गुणों की स्तुति करता है, दुष्ट शक्तियों पर उनकी विजय की क्षमता को बताता है। पाँचवाँ श्लोक मत्स्य, कूर्म, वराह, नृसिंह आदि अवतारों के माध्यम से पृथ्वी की रक्षा करने वाले विष्णु की करुणा का स्मरण कराता है, और भक्त स्वयं को संसार ताप से बचाने की प्रार्थना करता है। छठा श्लोक दामोदर और गोविंदा के रूप में भगवान की स्तुति करता है, भवसागर को मथने वाले मंदराचल पर्वत की तरह, भक्त के भय को दूर करने की प्रार्थना करता है। अंतिम, सातवाँ श्लोक करुणासागर नारायण के चरणों में पूर्ण शरणागति व्यक्त करता है और प्रार्थना करता है कि यह षट्पदी स्तोत्र सदा उसकी जिह्वा पर विराजमान रहे।
संक्षेप में, श्री विष्णु षट्पदी स्तोत्रं भगवान विष्णु के विभिन्न रूपों, गुणों और लीलाओं का संक्षिप्त, फिर भी गहन रूप से स्तुति करता है। यह भगवान में पूर्ण भक्ति और शरणागति को विकसित करता है, जिससे भक्त सांसारिक बंधनों से मुक्त होकर आध्यात्मिक शांति और मोक्ष प्राप्त कर सकता है। इस स्तोत्र का निरंतर पाठ मन को शुद्ध करता है, भय को दूर करता है और भगवान के निकट ले जाता है। यह भक्त के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाता है और अंततः परम आनंद प्रदान करता है।
लाभ (Benefits):
- मानसिक शांति और स्थिरता: इस स्तोत्र का पाठ मन की चंचलता को कम करता है, विषय वासनाओं को शांत करता है और आंतरिक शांति प्रदान करता है।
- संसार भय से मुक्ति: भगवान के चरणों में शरणागति से, जीवन के कष्टों और भवसागर के भय से मुक्ति मिलती है।
- भगवान विष्णु की कृपा प्राप्ति: विष्णु के विभिन्न रूपों की स्तुति करने से, भक्त उनकी अपार करुणा और आशीर्वाद प्राप्त करता है, जिससे जीवन में सभी शुभ होते हैं।
- आध्यात्मिक उन्नति और मोक्ष: यह स्तोत्र भक्त को आध्यात्मिक मार्ग पर प्रगति करने के लिए प्रेरित करता है, अंततः मोक्ष या परम पद प्राप्त करने में सहायता करता है।
- नकारात्मक शक्तियों से सुरक्षा: विष्णु के शौर्य और रक्षात्मक गुणों का स्मरण करने से, भक्त सभी प्रकार की नकारात्मक शक्तियों और बाधाओं से सुरक्षा प्राप्त करता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
श्री विष्णु षट्पदी स्तोत्रं क्या है?
इस स्तोत्र का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
श्री विष्णु षट्पदी स्तोत्रं के पाठ से क्या लाभ होते हैं?
कौन इस स्तोत्र का पाठ कर सकता है?
इस स्तोत्र का कितनी बार पाठ करना चाहिए?
श्री विष्णु षट्पदी स्तोत्रं का मूल स्रोत क्या है?
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