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श्री महाविष्णु स्तुतिः

संपादन: अद्यतन
स्तोत्रश्री महाविष्णु
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श्री महाविष्णु स्तुतिः

ब्रह्मर्षय ऊचुः |
नमस्ते देवदेवानामादिभूत सनातन |
पुरुषाय पुराणाय नमस्ते परमात्मने || 1 ||

जरामरणरोगादिविहीनायामलात्मने |
ब्रह्मणां पतये तुभ्यं जगतां पतये नमः || 2 ||

लोकालोकस्वरूपाय लोकानां पतये नमः |
शंखचक्रगदापद्मपाणये विष्णवे नमः || 3 ||

नमो हिरण्यगर्भाय श्रीपते भूपते नमः |
नमः स्वयंभुवे तुभ्यं सूत्रात्मादिस्वरूपिणे || 4 ||

विराट् प्रजापतेः साक्षाज्जनकाय नमो नमः |
विश्वतैजसरूपाय प्राज्ञरूपाय ते नमः || 5 ||

जाग्रत्स्वप्नस्वरूपाय नमः सुप्त्यात्मने नमः |
अवस्थासाक्षिणे तुभ्यमवस्थावर्जिताच्युत || 6 ||

तुरीयाय विशुद्धाय तुर्यातीताय ते नमः |
प्रथमाय समस्तस्य जगतः परमात्मने || 7 ||

ओंकारैकस्वरूपाय शिवाय शिवद प्रभो |
सर्वविज्ञानसंपन्न नमो विज्ञानदायिने || 8 ||

जगतां योनये तुभ्यं वेधसे विश्वरूपिणे |
नित्यशुद्धाय बुद्धाय मुक्ताय सुखरूपिणे || 9 ||

नमो वाचामतीताय मनोऽगम्याय ते नमः |
अप्रमेयाय शांताय स्वयंभानाय साक्षिणे || 10 ||

नमः पुंसे पुराणाय श्रेयःप्राप्त्येकहेतवे |
आकाशादिप्रपंचाय नमस्तद्रूप शंकर || 11 ||

मायारूपाय मायायाः सत्ताहेतो जनार्दन |
नमः प्रद्युम्नरूपाय नमः संकर्षणात्मने || 12 ||

नमोऽनिरुद्धरूपाय वासुदेवाय ते नमः |
योगाय योगगम्याय योगिनामिष्टसिद्धिद || 13 ||

नमस्ते मत्स्यरूपाय नमस्ते कूर्मरूपिणे |
नमस्तुभ्यं वराहाय नारसिंहाय ते नमः || 14 ||

नमो वामनरूपाय नमो रामत्रयात्मने |
नमः कृष्णाय सर्वज्ञ नमस्ते कल्किरूपिणे || 15 ||

कर्मिणां फलरूपाय कर्मरूपाय ते नमः |
कर्मकर्त्रे नमस्तुभ्यं नमस्ते कर्मसाक्षिणे || 16 ||

नमो विज्ञप्तिरूपाय नमो वेदांतरूपिणे |
गुणत्रयात्मने तुभ्यं नमो निर्गुणरूपिणे || 17 ||

अद्भुतायामरेशाय शिवप्राप्त्येकहेतवे |
नमो नक्षत्ररूपाय नमस्ते सोमरूपिणे || 18 ||

नमः सूर्यात्मने तुभ्यं नमो वज्रधराय ते |
नमस्ते पद्मनाभाय नमस्ते शार्ङ्गपाणये || 19 ||

नमस्तुभ्यं विशालाक्ष नमः श्रीधर नायक |
नमः संसारतप्तानां तापनाशैकहेतवे || 20 ||

श्रौतस्मार्तैकनिष्ठानामचिरादेव मुक्तिद |
अन्येषामपि सर्वेषां संसारैकप्रदाव्यय || 21 ||

नमोऽसुरविमर्दाय नमो विद्याधरार्चित |
क्षीरोदशायिने तुभ्यं नमो वैकुंठवासिने |
नमो रागाभिभूतानां वैराग्यप्लवदायिने || 22 ||

इति सूतसंहितायां श्री महाविष्णु स्तुतिः |

अर्थ

श्री महाविष्णु स्तुति ब्रह्मर्षियों द्वारा भगवान महाविष्णु को समर्पित एक अत्यंत गहन और पवित्र प्रार्थना है। यह स्तोत्र श्रीहरि को परम ब्रह्म, आदिभूत, सनातन और सृष्टि-स्थिति-लय के अधिपति के रूप में वर्णित करता है, जो समस्त जगत के मूल आधार हैं। देवताओं के देव, आदिभूत और पुरुषोत्तम परमात्मा को नमन करते हुए, उन्हें जन्म, जरा, मृत्यु और रोगों जैसे दुखों से परे शुद्ध चैतन्य स्वरूप के रूप में सम्मानित किया जाता है। भगवान विष्णु कालातीत, निर्मल आत्मा और ब्रह्म तथा लोकों के स्वामी हैं, यह स्तोत्र उद्घोष करता है।

विष्णु समस्त लोकों के स्वरूप हैं, शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण कर भक्तों की रक्षा करने वाले जगन्नाथ हैं। वे हिरण्यगर्भ, श्रीपति, भूपति, स्वयंभू और सूत्रात्मा के रूप में समस्त भूतों में व्याप्त होकर जगत को जीवन शक्ति प्रदान करते हैं। विराट, तैजस और प्राज्ञ – इन तीनों अवस्थाओं (जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति) के साक्षी बनकर, वे इन सभी अवस्थाओं से परे तुरीय स्वरूप में ब्रह्म के रूप में प्रकाशित होते हैं। वे ओंकार स्वरूप, कल्याणकारी, समस्त विज्ञान से संपन्न और ज्ञान प्रदान करने वाले हैं।

यह स्तोत्र विष्णु को जगत की योनि, स्रष्टा और विश्वरूपधारी के रूप में वर्णित करता है। वे नित्य शुद्ध, बुद्ध, मुक्त और सुख स्वरूप हैं। वे वाणी, मन और बुद्धि से परे, अप्रमेय और अपार शांति स्वरूप हैं। भगवान जनार्दन माया को आधार बनाकर जगत का संचालन करते हैं। प्रद्युम्न, संकर्षण, अनिरुद्ध और वासुदेव – ये चतुर्व्यूह स्वरूप सृष्टि, स्थिति और लय को धार्मिक रूप से संचालित करते हैं। वे योगियों को योग सिद्धियाँ और भक्तों को अनुग्रह प्रदान करने वाले योगेश्वर हैं।

मत्स्य, कूर्म, वराह, नरसिंह, वामन, परशुराम, राम, कृष्ण और कल्कि जैसे अवतारों के माध्यम से वे धर्म की स्थापना करते हैं, दुष्टों का संहार करते हैं और भक्तों की रक्षा करते हैं। जगत में होने वाले प्रत्येक कर्म का फल देने वाले वे ही हैं। वे कर्मकर्ता, कर्मस्वरूप और कर्मसाक्षी भी हैं। वे गुणत्रयों के आधार हैं, निर्गुण ब्रह्म स्वरूप हैं, अद्भुत रूपों से देवताओं के भी आश्रय हैं। नक्षत्र रूप में, सोम रूप में, सूर्य रूप में, पद्मनाभ के रूप में, शार्ङ्ग धनुर्धारी के रूप में वे जगत की रक्षा करते हैं। वे संसार के तापों को दूर करते हैं, मोक्ष प्रदान करते हैं, असुरों का संहार करते हैं, वैकुण्ठवासी हैं और भक्तों को अभय, धैर्य तथा वैराग्य प्रदान करते हैं। यह स्तुति महाविष्णु के सर्वव्यापी महिमा को संक्षेप में दर्शाती है और उनके अनुग्रह, सुरक्षा, शांति, ज्ञान प्राप्ति तथा मोक्ष प्राप्ति जैसे फल प्रदान करने वाला एक शुद्ध भक्ति गीत है।

लाभ (Benefits):

  • दिव्य सुरक्षा और शांति: इस स्तोत्र का पाठ भगवान विष्णु की दिव्य सुरक्षा को आकर्षित करता है, जिससे मन को असीम शांति और स्थिरता मिलती है।
  • मोक्ष की प्राप्ति: शुद्ध भक्ति से इस स्तुति का नियमित पाठ जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति दिलाकर मोक्ष प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त करता है।
  • ज्ञान और वैराग्य में वृद्धि: परमात्मा के स्वरूप को समझने से आध्यात्मिक ज्ञान, विवेक और सांसारिक आसक्तियों से वैराग्य की भावना बढ़ती है।
  • भय निवारण और धैर्य वृद्धि: भगवान विष्णु के सर्वशक्तिमान स्वरूप का स्मरण करने से बुरी शक्तियाँ और भय दूर होते हैं, जिससे आंतरिक धैर्य और आत्मविश्वास बढ़ता है।
  • कर्म बंधन से मुक्ति: चूंकि विष्णु कर्मफल दाता हैं, इस स्तोत्र का नियमित पाठ सद्भावना को बढ़ाता है और कर्म बंधनों से मुक्ति दिलाने में सहायक होता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

श्री महाविष्णु स्तुति क्या है?
यह ब्रह्मर्षियों द्वारा भगवान महाविष्णु को समर्पित एक उत्कृष्ट स्तोत्र है, जो उनके परमात्मा स्वरूप, सृष्टि-स्थिति-लय के कर्ता और अनंत महिमा का वर्णन करता है। यह श्रीहरि के दिव्य गुणों की स्तुति करता है।
इस स्तोत्र का पाठ कब करना चाहिए?
इस स्तोत्र का पाठ किसी भी समय किया जा सकता है, विशेष रूप से सुबह स्नान के बाद या शाम को दीपक जलाने के बाद पाठ करना शुभ होता है। एकादशी या गुरुवार को इसका पाठ करना अत्यंत फलदायी माना जाता है।
श्री महाविष्णु स्तुति के पाठ से क्या लाभ होते हैं?
इसके पाठ से दिव्य सुरक्षा, मानसिक शांति, मोक्ष की ओर प्रगति, ज्ञान में वृद्धि, भय का निवारण और कर्म बंधनों से मुक्ति मिलती है। यह भक्तों को धैर्य और वैराग्य प्रदान करता है।
यह स्तुति किसे पढ़नी चाहिए?
जो कोई भी भगवान विष्णु में श्रद्धा रखता है और आध्यात्मिक उन्नति, शांति तथा सुरक्षा की कामना करता है, वह इस स्तोत्र का पाठ कर सकता है।
इस स्तोत्र का कितनी बार पाठ करना चाहिए?
न्यूनतम एक या तीन बार पाठ किया जा सकता है। प्रतिदिन नियमित रूप से पाठ करना सर्वोत्तम परिणाम देता है। संकल्प सिद्धि के लिए 11, 21 या 108 बार पाठ करना लाभकारी होता है।
इस स्तोत्र का मूल स्रोत क्या है?
यह स्तोत्र ब्रह्मर्षियों द्वारा रचित है। हिंदू धर्मग्रंथों, विशेषकर पुराणों में, भगवान विष्णु की महिमा का वर्णन करते समय ऐसी स्तुतियाँ पाई जाती हैं।

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