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श्री ललिता स्तवराजः

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स्तोत्र
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श्री ललिता स्तवराजः

देवा ऊचुः |
जय देवि जगन्मातर्जय देवि परात्परे |
जय कल्याणनिलये जय कामकलात्मिके || 1 ||

जयकारि च वामाक्षि जय कामाक्षि सुंदरि |
जयाखिलसुराराध्ये जय कामेशि मानदे || 2 ||

जय ब्रह्ममये देवि ब्रह्मात्मकरसात्मिके |
जय नारायणि परे नंदिताशेषविष्टपे || 3 ||

जय श्रीकंठदयिते जय श्रीललितेंबिके |
जय श्रीविजये देवि विजयश्रीसमृद्धिदे || 4 ||

जातस्य जायमानस्य इष्टापूर्तस्य हेतवे |
नमस्तस्यै त्रिजगतां पालयित्र्यै परात्परे || 5 ||

कलामुहूर्तकाष्ठाहर्मासर्तुशरदात्मने |
नमः सहस्रशीर्षायै सहस्रमुखलोचने || 6 ||

नमः सहस्रहस्ताब्जपादपंकजशोभिते |
अणोरणुतरे देवि महतोऽपि महीयसि || 7 ||

परात्परतरे मातस्तेजस्तेजीयसामपि |
अतलं तु भवेत्पादौ वितलं जानुनी तव || 8 ||

रसातलं कटीदेशः कुक्षिस्ते धरणी भवेत् |
हृदयं तु भुवर्लोकः स्वस्ते मुखमुदाहृतम् || 9 ||

दृशश्चंद्रार्कदहना दिशस्ते बाहवोंबिके |
मरुतस्तु तवोच्छ्वासा वाचस्ते श्रुतयोऽखिलाः || 10 ||

क्रीडा ते लोकरचना सखा ते चिन्मयः शिवः |
आहारस्ते सदानंदो वासस्ते हृदये सताम् || 11 ||

दृश्यादृश्यस्वरूपाणि रूपाणि भुवनानि ते |
शिरोरुहा घनास्ते तु तारकाः कुसुमानि ते || 12 ||

धर्माद्या बाहवस्ते स्युरधर्माद्यायुधानि ते |
यमाश्च नियमाश्चैव करपादरुहास्तथा || 13 ||

स्तनौ स्वाहास्वधाकारौ लोकोज्जीवनकारकौ |
प्राणायामस्तु ते नासा रसना ते सरस्वती || 14 ||

प्रत्याहारस्त्विंद्रियाणि ध्यानं ते धीस्तु सत्तमा |
मनस्ते धारणाशक्तिर्हृदयं ते समाधिकः || 15 ||

महीरुहास्तेऽंगरुहाः प्रभातं वसनं तव |
भूतं भव्यं भविष्यच्च नित्यं च तव विग्रहः || 16 ||

यज्ञरूपा जगद्धात्री विष्वग्रूपा च पावनी |
आदौ या तु दया भूता ससर्ज निखिलाः प्रजाः || 17 ||

हृदयस्थापि लोकानामदृश्या मोहनात्मिका |
नामरूपविभागं च या करोति स्वलीलया || 18 ||

तान्यधिष्ठाय तिष्ठंति तेष्वसक्तार्थकामदा |
नमस्तस्यै महादेव्यै सर्वशक्त्यै नमो नमः || 19 ||

यदाज्ञया प्रवर्तंते वह्निसूर्येंदुमारुताः |
पृथिव्यादीनि भूतानि तस्यै देव्यै नमो नमः || 20 ||

या ससर्जादिधातारं सर्गादावादिभूरिदम् |
दधार स्वयमेवैका तस्यै देव्यै नमो नमः || 21 ||

यथा धृता तु धरणी ययाकाशममेयया |
यस्यामुदेति सविता तस्यै देव्यै नमो नमः || 22 ||

यत्रोदेति जगत्कृत्स्नं यत्र तिष्ठति निर्भरम् |
यत्रांतमेति काले तु तस्यै देव्यै नमो नमः || 23 ||

नमो नमस्ते रजसे भवायै
नमो नमः सात्त्विकसंस्थितायै |
नमो नमस्ते तमसे हरायै
नमो नमो निर्गुणतः शिवायै || 24 ||

नमो नमस्ते जगदेकमात्रे
नमो नमस्ते जगदेकपित्रे |
नमो नमस्तेऽखिलरूपतंत्रे
नमो नमस्तेऽखिलयंत्ररूपे || 25 ||

नमो नमो लोकगुरुप्रधाने
नमो नमस्तेऽखिलवाग्विभूत्यै |
नमोऽस्तु लक्ष्म्यै जगदेकतुष्ट्यै
नमो नमः शांभवि सर्वशक्त्यै || 26 ||

अनादिमध्यांतमपांचभौतिकं
ह्यवाङ्मनोगम्यमतर्क्यवैभवम् |
अरूपमद्वंद्वमदृष्टिगोचरं
प्रभावमग्र्यं कथमंब वर्ण्यते || 27 ||

प्रसीद विश्वेश्वरि विश्ववंदिते
प्रसीद विद्येश्वरि वेदरूपिणि |
प्रसीद मायामयि मंत्रविग्रहे
प्रसीद सर्वेश्वरि सर्वरूपिणि || 28 ||

इति श्रीब्रह्मांडमहापुराणे उत्तरभागे ललितोपाख्याने त्रयोदशोऽध्याये विश्वरूप स्तोत्रं नाम श्री ललिता स्तवराजः ||

अर्थ

श्री ललिता स्तवराज, जिसे 'स्तोत्रों का राजा' कहा जाता है, एक अत्यंत शक्तिशाली और विस्तृत स्तोत्र है जिसमें सभी देवता आदि पराशक्ति श्री ललिता महादेवी की स्तुति करते हैं। यह स्तोत्र देवी के ब्रह्मांडीय स्वरूप को, सृष्टि, स्थिति और संहार की अधिष्ठात्री के रूप में चित्रित करता है। देवतागण 'जय देवी जगन्मातः, जय देवी परात्परे, जय कल्याणनिलये, जय कामकलात्मिके' कहकर देवी की महिमा का गुणगान करते हैं। यह स्तोत्र भक्तों को देवी की अनंत शक्ति और सौंदर्य का अनुभव कराता है, उन्हें आध्यात्मिक पथ पर अग्रसर करता है।

ललिता परमेश्वरी ब्रह्मस्वरूपा, नारायणस्वरूपा और श्रीकंठप्रिया के रूप में संपूर्ण जगत को आनंदित करती हैं। वे ही जन्म-मृत्यु और समस्त कर्मफलों का कारण हैं। सहस्र शीश, सहस्र नेत्र और सहस्र हस्त-चरणों वाली वह परमशक्ति अणु से भी सूक्ष्म और महान से भी महान है। इस देवी के चरण अतल लोक, घुटने वितल लोक, कटि प्रदेश रसातल लोक, कुक्षि पृथ्वी, हृदय भुवर्लोक और मुख स्वर्ग के रूप में वर्णित हैं। संपूर्ण ब्रह्मांड उनके शरीर का ही विस्तार है, जो उनकी सर्वव्यापकता को दर्शाता है।

चंद्रमा, सूर्य और अग्नि उनके नेत्र हैं; दिशाएँ उनकी भुजाएँ हैं; वायु उनकी श्वास है; और वेद उनकी वाणी हैं। सृष्टि ही उनका खेल है; चिन्मय शिव उनके सहचर हैं; सदानंद उनका आहार है; और ज्ञानियों का हृदय उनका निवास स्थान है। उनके केश बादल हैं, तारे उनके पुष्प हैं, धर्म उनके हाथ हैं, अधर्म उनके आयुध हैं। यम-नियम उनके चरणों में अर्पित किए जाने वाले पुष्प हैं। स्वाहा और स्वधा उनके स्तन हैं, प्राणायाम उनकी नासिका है, और सरस्वती उनकी जिह्वा हैं। उनका मन धारणा है, ध्यान समाधि है, और हृदय परम तत्व है।

भूत, भविष्य और वर्तमान – सब कुछ उनका ही विग्रह है। उनका रूप यज्ञमय है; उनका स्वभाव करुणा है। वे ही जगद्धात्री, मोहमयी माया हैं, और नाम-रूप के विभाजन को उत्पन्न करने वाली शक्ति हैं। अग्नि, सूर्य, चंद्रमा, वायु – ये सभी उनके आदेश से ही चलते हैं। पृथ्वी, आकाश, सूर्य – ये सभी उनकी शक्ति से ही कार्य करते हैं। सृष्टि, स्थिति और लय – सभी उनसे ही प्रारंभ होकर उन्हीं में विलीन होते हैं। वे रज, सत्व, तम गुणों का स्वरूप भी हैं, फिर भी इन तीनों गुणों से परे निर्विकार चैतन्य स्वरूपा हैं। जगत की माता, पिता, मंत्र-तंत्र रूपा, वाग्देवता स्वरूपा, लक्ष्मी स्वरूपा, शाम्भवी, सर्वशक्ति – इन सभी रूपों में उन्हें शत-शत नमन। आदि-अनादि, मध्य-रहित, पंचभूतों से परे, मन की पहुँच से दूर, वाणी से परे इस शक्ति के प्रभाव का वर्णन कौन कर सकता है? हे विश्वेश्वरी, वेदरूपिणी, मायामयी, मंत्रविग्रहिणी, सर्वरूपिणी! कृपा करो – जय जय श्री ललिताम्बा!

लाभ (Benefits):

  • आध्यात्मिक ज्ञान और मुक्ति: इस स्तोत्र का पाठ देवी के विश्वव्यापी रूप की गहरी समझ प्रदान करता है, जिससे अंततः मोक्ष या मुक्ति का मार्ग प्रशस्त होता है।
  • मनोकामना पूर्ति: ललितांबिका को सृष्टि, स्थिति और संहार का मूल मानकर स्तुति करने से भक्तों की सभी लौकिक और आध्यात्मिक इच्छाएँ पूरी होती हैं।
  • भय निवारण और सुरक्षा: महाशक्ति ललिता देवी के स्मरण से सभी प्रकार के भय दूर होते हैं और भक्तों को दिव्य सुरक्षा प्राप्त होती है।
  • मानसिक शांति और स्थिरता: देवी के अनंत गुणों और विश्वरूप का ध्यान करने से मन को अपार शांति, स्थिरता और संतोष प्राप्त होता है।
  • ऐश्वर्य और समृद्धि: इस स्तोत्र का नियमित पाठ लक्ष्मी स्वरूपा देवी की कृपा से जीवन में ऐश्वर्य, समृद्धि और सफलता लाता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

श्री ललिता स्तवराज क्या है?
श्री ललिता स्तवराज एक शक्तिशाली स्तोत्र है जिसमें देवतागण ललिता महादेवी को ब्रह्मांड की मूल शक्ति, सृष्टि, स्थिति और संहार की नियंत्रक के रूप में स्तुति करते हैं। यह देवी की अनंत महिमा और उनके विश्वरूप का वर्णन करता है।
श्री ललिता स्तवराज का पाठ कब करना चाहिए?
इस स्तोत्र का पाठ किसी भी समय किया जा सकता है, विशेष रूप से शुक्रवार, पूर्णिमा के दिन या देवी को समर्पित त्योहारों पर पाठ करना अधिक फलदायी होता है। इसे अपनी दैनिक पूजा का हिस्सा बनाना उत्तम है।
श्री ललिता स्तवराज के पाठ के प्रमुख लाभ क्या हैं?
इस स्तोत्र का पाठ करने से आध्यात्मिक ज्ञान में वृद्धि होती है, सभी मनोकामनाएँ पूरी होती हैं, भय दूर होता है और सुरक्षा मिलती है, मानसिक शांति प्राप्त होती है और जीवन में ऐश्वर्य तथा समृद्धि आती है।
इस स्तोत्र का पाठ कौन कर सकता है?
ललिता देवी में श्रद्धा रखने वाला कोई भी व्यक्ति, लिंग या आयु के भेदभाव के बिना इस स्तोत्र का पाठ कर सकता है। विशेष रूप से जो आध्यात्मिक प्रगति, मानसिक शांति और लौकिक सफलता चाहते हैं, वे इसका पाठ कर सकते हैं।
श्री ललिता स्तवराज का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
इस स्तोत्र का पाठ कम से कम एक बार या फिर तीन, ग्यारह, इक्कीस बार, जितनी आपकी क्षमता हो, उतनी बार किया जा सकता है। नियमित रूप से पाठ करना अधिक लाभकारी माना जाता है।
श्री ललिता स्तवराज का मूल क्या है?
श्री ललिता स्तवराज का उल्लेख पुराणों और आगम ग्रंथों में मिलता है। यह माना जाता है कि देवताओं ने आदि पराशक्ति की महिमा को प्रकट करने के लिए इस स्तोत्र की रचना की और ललिता देवी की स्तुति की।

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