ल

श्री ललिता पंचरत्नं

संपादन: अद्यतन
स्तोत्र
0 व्यूज़

श्री ललिता पंचरत्नं

प्रातः स्मरामि ललितावदनारविंदं
बिंबाधरं पृथुलमौक्तिकशोभिनासं |
आकर्णदीर्घनयनं मणिकुंडलाढ्यं
मंदस्मितं मृगमदोज्ज्वलफालदेशं || 1 ||

प्रातर्भजामि ललिताभुजकल्पवल्लीं
रक्तांगुळीयलसदंगुळिपल्लवाढ्यां |
माणिक्यहेमवलयांगदशोभमानां
पुंड्रेक्षुचापकुसुमेषुसृणीर्दधानां || 2 ||

प्रातर्नमामि ललिताचरणारविंदं
भक्तेष्टदाननिरतं भवसिंधुपोतं |
पद्मासनादिसुरनायकपूजनीयं
पद्मांकुशध्वजसुदर्शनलांछनाढ्यं || 3 ||

प्रातः स्तुवे परशिवां ललितां भवानीं
त्रय्यंतवेद्यविभवां करुणानवद्यां |
विश्वस्य सृष्टिविलयस्थितिहेतुभूतां
विद्येश्वरीं निगमवाङ्मनसातिदूरां || 4 ||

प्रातर्वदामि ललिते तव पुण्यनाम
कामेश्वरीति कमलेति महेश्वरीति |
श्रीशांभवीति जगतां जननी परेति
वाग्देवतेति वचसा त्रिपुरेश्वरीति || 5 ||

यः श्लोकपंचकमिदं ललितांबिकायाः
सौभाग्यदं सुललितं पठति प्रभाते |
तस्मै ददाति ललिता झटिति प्रसन्ना
विद्यां श्रियं विमलसौख्यमनंतकीर्तिं || 6 ||

इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य श्रीगोविंदभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य श्रीमच्छंकरभगवतः कृतौ श्री ललिता पंचरत्नं |

अर्थ

श्री ललिता पंचरत्नं, आदि शंकराचार्य भगवत्पाद द्वारा रचित पांच रत्नों के समान श्लोकों का एक अत्यंत सुंदर स्तोत्र है। यह स्तोत्र भक्तों को भवबंधनों से मुक्त कर, श्री ललिता महात्रिपुरसुंदरी की दिव्य सुंदरता, करुणा और ज्ञानमयी शक्ति में लीन होने में सहायता करता है। प्रातःकाल में इस स्तोत्र का स्मरण करने से मन को शांति, आध्यात्मिक उन्नति और देवी का सान्निध्य प्राप्त होता है। यह केवल एक स्तोत्र नहीं, बल्कि भक्ति की गहरी अभिव्यक्ति और देवी के साथ संबंध स्थापित करने का एक दिव्य मार्ग है।

प्रथम श्लोक में, भक्त प्रातःकाल में श्री ललिता देवी के कमल-सदृश मुख का स्मरण करता है। बिंबफल जैसे लाल होंठ, मोतियों से सुशोभित नासिका, कानों तक फैले हुए लंबे नेत्र, मणि कुंडलों से अलंकृत कान, मंद मुस्कान और कस्तूरी तिलक से देदीप्यमान मस्तक देवी के मुखारविंद का वर्णन करते हैं। इस दिव्य रूप का ध्यान मन को अपार शांति और आनंद प्रदान करता है, देवी की करुणामयी दृष्टि का अनुभव करने में सहायता करता है।

दूसरे श्लोक में, भक्त ललिता देवी की भुजाओं को कल्पवृक्ष की लताओं के समान पूजता है। माणिक्य और स्वर्ण के कंगन तथा रत्नों से जड़े बाजूबंदों से अलंकृत उनकी भुजाएँ, लाल रंग की अंगुलियों से सुशोभित हैं। देवी अपने हाथों में गन्ने का धनुष, पुष्पबाण, पाश (फंदा) और अंकुश धारण करती हैं। ये सृष्टि, स्थिति और लय के कारणभूत दिव्य शक्ति और भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण करने वाली करुणा का प्रतीक हैं। ये भुजाएँ भक्तों को आश्रय प्रदान करने वाले कल्पवृक्ष के समान हैं।

तीसरे श्लोक में, भक्त ललिता देवी के चरणारविंदों को नमन करता है। ये चरण भवसागर को पार करने के लिए नौका के समान कार्य करते हैं। ब्रह्मा, विष्णु आदि समस्त देवताओं द्वारा पूजित ये पाद, पद्म, अंकुश, ध्वज और सुदर्शन जैसे दिव्य चिह्नों से सुशोभित हैं। देवी के चरणों में शरणागत होने से भक्तों की समस्त मनोकामनाएँ सिद्ध होती हैं और जीवन के दुखों से मुक्ति मिलती है।

चौथे श्लोक में, भक्त परशिव स्वरूपिणी ललिता भवानी की स्तुति करता है। वे वेदों द्वारा ज्ञात परम शक्ति हैं, करुणा का सागर हैं, सृष्टि, स्थिति और लय का मूल कारण हैं। वे वाणी और मन से परे ज्ञानेश्वरी हैं। पाँचवें श्लोक में, भक्त देवी के पवित्र नामों का उच्चारण करता है: कामेश्वरी, कमला, महेश्वरी, श्रीशांभवी, जगज्जननी, वाग्देवता, त्रिपुरेश्वरी। ये प्रत्येक नाम दिव्य शक्ति के विभिन्न रूपों का प्रतिनिधित्व करता है और भक्तों को शुभ फल प्रदान करता है।

फलश्रुति में कहा गया है कि जो कोई भी प्रतिदिन प्रातःकाल में इन पांच श्लोकों को भक्तिपूर्वक पढ़ता है, श्री ललिता देवी प्रसन्न होकर उसे तत्काल विद्या, धन, आनंद और असीम कीर्ति प्रदान करती हैं। यह स्तोत्र भक्त के जीवन में सभी शुभता लाता है और उसे आध्यात्मिक तथा भौतिक रूप से उन्नति प्राप्त करने में सहायता करता है।

लाभ (Benefits):

  • **विद्या प्राप्ति (Attainment of Knowledge):** इस स्तोत्र का पाठ करने से ज्ञान में वृद्धि होती है, छात्रों को बेहतर एकाग्रता और स्मरण शक्ति प्राप्त होती है।
  • **धन और समृद्धि (Wealth and Prosperity):** ललिता देवी की कृपा से भक्तों को धन, ऐश्वर्य और समृद्धि प्राप्त होती है।
  • **आनंद और शांति (Happiness and Peace):** देवी के प्रातःस्मरण से मन को अखंड आनंद, शांति और सुकून मिलता है।
  • **कीर्ति और सफलता (Fame and Success):** इस स्तोत्र के नियमित पाठ से समाज में सम्मान, प्रसिद्धि और कार्यों में सफलता प्राप्त होती है।
  • **भवबंधन से मुक्ति (Liberation from Worldly Bonds):** यह भवसागर को पार करने के लिए नौका के समान कार्य करता है, जिससे आध्यात्मिक मुक्ति और मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

श्री ललिता पंचरत्नं स्तोत्र क्या है?
यह आदि शंकराचार्य भगवत्पाद द्वारा रचित पांच श्लोकों का एक देवी स्तोत्र है, जो श्री ललिता महात्रिपुरसुंदरी की दिव्य सुंदरता, करुणा और शक्ति का वर्णन करता है। यह भक्तों को आध्यात्मिक और भौतिक लाभ प्रदान करता है।
इस स्तोत्र का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
इस स्तोत्र का पाठ प्रतिदिन प्रातःकाल (सुबह) स्नान के बाद शुद्ध मन से करना श्रेष्ठ माना जाता है। यह देवी के प्रातःस्मरण के लिए समर्पित है।
श्री ललिता पंचरत्नं के पाठ से क्या लाभ होते हैं?
इस स्तोत्र का पाठ करने से विद्या, धन, सुख, शांति और असीम कीर्ति प्राप्त होती है। यह भवबंधनों से मुक्ति पाने में भी सहायक है।
श्री ललिता पंचरत्नं स्तोत्र का पाठ कौन कर सकता है?
ज्ञान, धन, शांति और दिव्य अनुग्रह की कामना करने वाला कोई भी भक्त इस स्तोत्र का पाठ कर सकता है। इसमें लिंग, जाति या आयु का कोई प्रतिबंध नहीं है।
यह स्तोत्र कितनी बार पढ़ना चाहिए?
सामान्यतः प्रतिदिन सुबह एक बार इसका पाठ करना उचित माना जाता है। हालांकि, अपनी भक्ति के अनुसार अधिक बार भी पाठ किया जा सकता है।
श्री ललिता पंचरत्नं स्तोत्र की उत्पत्ति क्या है?
इस पवित्र स्तोत्र की रचना महान दार्शनिक और संत आदि शंकराचार्य भगवत्पाद ने की थी। यह उनकी अनेक भक्तिपूर्ण कृतियों में से एक है।

टिप्पणियाँ

टिप्पणी लिखने के लिए लॉगिन करें

टिप्पणियाँ लोड हो रही हैं...