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श्री ललिता पंचविंशतिनाम स्तोत्रं

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स्तोत्र
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श्री ललिता पंचविंशतिनाम स्तोत्रं

अगस्त्य उवाच |
वाजिवक्त्र महाबुद्धे पंचविंशतिनामभिः |
ललितापरमेशान्या देहि कर्णरसायनं || 1 ||

हयग्रीव उवाच |
सिंहासनेशी ललिता महाराज्ञी परांकुशा |
चापिनी त्रिपुरा चैव महात्रिपुरसुंदरी || 2 ||

सुंदरी चक्रनाथा च साम्राजी चक्रिणी तथा |
चक्रेश्वरी महादेवी कामेशी परमेश्वरी || 3 ||

कामराजप्रिया कामकोटिका चक्रवर्तिनी |
महाविद्या शिवानंगवल्लभा सर्वपाटला || 4 ||

कुलनाथाऽऽम्नायनाथा सर्वाम्नायनिवासिनी |
शृंगारनायिका चेति पंचविंशतिनामभिः || 5 ||

स्तुवंति ये महाभागां ललितां परमेश्वरीं |
ते प्राप्नुवंति सौभाग्यमष्टौसिद्धीर्महद्यशः || 6 ||

इति श्रीब्रह्मांडपुराणे ललितोपाख्याने अष्टादशोऽध्याये श्रीललिता पंचविंशतिनाम स्तोत्रं |

अर्थ

श्री ललिता पंचविंशतिनाम स्तोत्रम्, ब्रह्मांड पुराण के ललिताख्यान में वर्णित एक अत्यंत पवित्र स्तोत्र है। यह स्तोत्र महर्षि अगस्त्य द्वारा ज्ञानमूर्ति हयग्रीव भगवान से प्रार्थना के साथ आरम्भ होता है। अगस्त्य ऋषि कहते हैं, 'हे वाजीवक्त्र महाबुद्धिमान, कृपया मुझे ललिता परमेश्वरी के 25 नाम बताएँ जो मेरे कानों के लिए अमृत के समान मधुर हों।' ये 25 नाम भगवती ललिता महात्रिपुरसुंदरी की दिव्य शक्ति, सौंदर्य और करुणा को प्रकट करते हैं।

हयग्रीव भगवान ललिता देवी के पावन नामों का वर्णन करते हैं। वे सिंहासनेशी हैं – सभी लोकों की महारानी; ललिता – सौंदर्य और लालित्य की साक्षात् मूर्ति; महाराज्ञी – सम्पूर्ण ब्रह्मांड की सर्वोच्च रानी; और परांकुशा – प्रेम, नियंत्रण और दया की शक्तियों का संगम। वे चापिनी – धर्म की रक्षक धनुर्धारिणी; त्रिपुरा – तीनों लोकों की स्वामिनी; और महात्रिपुरसुंदरी – सौंदर्य और शक्ति की पराकाष्ठा हैं। ये नाम देवी की सर्वव्यापकता, सर्वशक्तिमत्ता और समस्त सृष्टि पर उनके नियंत्रण को उद्घोषित करते हैं।

आगे, वे चक्रनाथा, सम्राज्ञी, चक्रिणी, महादेवी, कामेशी और परमेश्वरी हैं – जो सम्पूर्ण ब्रह्मांड को संचालित करने वाली परम दिव्य शक्ति हैं। वे कामराजप्रिया, कामकोटिका, महाविद्या, शिवानंगवल्लभा और सर्वपाटाला हैं – जो ज्ञान, आनंद और रचनात्मक शक्तियों का प्रतीक हैं। ललिता देवी कुलनाथा, आम्नायनाथा और श्रृंगारनायिका भी हैं – जो सभी तंत्रों का मूल, आध्यात्मिक ज्ञान की अधिष्ठात्री और प्रेम स्वरूपा होकर समस्त जीवों पर अनुग्रह करती हैं। प्रत्येक नाम माँ के अनंत गुणों, महिमा और भक्तों के प्रति उनके वात्सल्य को दर्शाता है।

इन 25 नामों का पाठ भक्तों के लिए देवी की कृपा प्राप्त करने का एक अत्यंत सरल मार्ग है। ये नाम केवल शब्द नहीं, बल्कि देवी की दिव्य शक्ति का आह्वान करने वाले मंत्र हैं। इस स्तोत्र का भक्तिपूर्वक पाठ करने से मन को शांति, जीवन में समृद्धि और आध्यात्मिक प्रगति प्राप्त होती है। यह स्तोत्र भक्त के चित्त को देवी की महिमा में लीन कर देता है, जिससे दैवी अनुग्रह सहजता से प्राप्त होता है।

लाभ (Benefits):

  • अष्टसिद्धियों की प्राप्ति: इस स्तोत्र का पाठ करने से भक्तों को अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व नामक आठ दिव्य सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं।
  • महान यश और कीर्ति: जो भक्त ललिता देवी के इन 25 नामों का भक्तिपूर्वक पाठ करते हैं, वे समाज में महान सम्मान, कीर्ति और सफलता प्राप्त करते हैं।
  • सौभाग्य और समृद्धि: देवी की कृपा से जीवन में सभी प्रकार के सौभाग्य, आर्थिक समृद्धि और आनंद का वास होता है।
  • आध्यात्मिक उन्नति: इस स्तोत्र का पाठ भक्तों के मन को शुद्ध करता है, आध्यात्मिक चेतना को बढ़ाता है और दिव्य सान्निध्य प्राप्त करने में सहायता करता है।
  • मन की शांति और संतोष: मानसिक तनाव दूर होते हैं, आंतरिक शांति और संतोष प्राप्त होता है, जिससे जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

श्री ललिता पंचविंशतिनाम स्तोत्रं क्या है?
यह ललिता परमेश्वरी के 25 पवित्र नामों की स्तुति करने वाला एक स्तोत्र है, जिसका वर्णन ब्रह्मांड पुराण में महर्षि अगस्त्य और भगवान हयग्रीव के संवाद के रूप में मिलता है। यह देवी के सौंदर्य, शक्ति और करुणा को दर्शाता है।
इस स्तोत्र का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
इस स्तोत्र का पाठ प्रतिदिन सुबह या शाम को स्नान के बाद शुद्ध मन से करना चाहिए। मंगलवार, शुक्रवार या पूर्णिमा के दिन इसका पाठ विशेष रूप से फलदायी माना जाता है।
श्री ललिता पंचविंशतिनाम स्तोत्र पाठ के मुख्य लाभ क्या हैं?
इस स्तोत्र का पाठ करने से अष्टसिद्धि, महान यश, सौभाग्य और समृद्धि प्राप्त होती है। यह आध्यात्मिक उन्नति और मानसिक शांति भी प्रदान करता है।
इस स्तोत्र का पाठ किसे करना चाहिए?
ललिता देवी के भक्त, आध्यात्मिक प्रगति चाहने वाले, और जीवन में सौभाग्य व शांति की कामना करने वाले किसी भी लिंग, आयु या जाति के व्यक्ति इस स्तोत्र का पाठ कर सकते हैं।
इस स्तोत्र का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
सामान्यतः, प्रतिदिन कम से कम एक बार या 11, 21, 108 बार पाठ करना शुभ माना जाता है। यह व्यक्ति की भक्ति और समय की उपलब्धता पर निर्भर करता है।
इस स्तोत्र का उद्गम या स्रोत क्या है?
यह स्तोत्र श्री ब्रह्मांड पुराण के ललिताख्यान के अठारहवें अध्याय में महर्षि अगस्त्य द्वारा भगवान हयग्रीव से की गई प्रार्थना के रूप में वर्णित है।

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