ल

श्री ललिता मूलमंत्र कवचं

संपादन: अद्यतन
स्तोत्र
0 व्यूज़

श्री ललिता मूलमंत्र कवचं

अस्य श्रीललिता कवच स्तवरत्न मंत्रस्य, आनंदभैरव ऋषिः, अमृतविराट् छंदः, श्री महात्रिपुरसुंदरी ललितापरांबा देवता ऐं बीजं ह्रीं शक्तिः श्रीं कीलकं, मम श्री ललितांबा प्रसादसिद्ध्यर्थे श्री ललिता कवचस्तवरत्न मंत्र जपे विनियोगः |

करन्यासः |
ऐं अंगुष्ठाभ्यां नमः |
ह्रीं तर्जनीभ्यां नमः |
श्रीं मध्यमाभ्यां नमः |
श्रीं अनामिकाभ्यां नमः |
ह्रीं कनिष्ठिकाभ्यां नमः |
ऐं करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः |

अंगन्यासः |
ऐं हृदयाय नमः |
ह्रीं शिरसे स्वाहा |
श्रीं शिखायै वषट् |
श्रीं कवचाय हुं |
ह्रीं नेत्रत्रयाय वौषट् |
ऐं अस्त्राय फट् |
भूर्भुवस्सुवरोमिति दिग्बंधः |

ध्यानं –
श्रीविद्यां परिपूर्णमेरुशिखरे बिंदुत्रिकोणेस्थितां
वागीशादि समस्तभूतजननीं मंचे शिवाकारके |
कामाक्षीं करुणारसार्णवमयीं कामेश्वरांकस्थितां
कांतां चिन्मयकामकोटिनिलयां श्रीब्रह्मविद्यां भजे || 1 ||

लमित्यादि पंचपूजां कुर्यात् |
लं – पृथ्वीतत्त्वात्मिकायै श्रीललितादेव्यै गंधं समर्पयामि |
हं – आकाशतत्त्वात्मिकायै श्रीललितादेव्यै पुष्पं समर्पयामि |
यं – वायुतत्त्वात्मिकायै श्री ललितादेव्यै धूपं समर्पयामि |
रं – वह्नितत्त्वात्मिकायै श्री ललितादेव्यै दीपं समर्पयामि |
वं – अमृततत्त्वात्मिकायै श्री ललितादेव्यै अमृतनैवेद्यं समर्पयामि |

पंचपूजां कृत्वा योनिमुद्रां प्रदर्श्य |

अथ कवचं |
ककारः पातु शीर्षं मे एकारः पातु फालकं |
ईकारश्चक्षुषी पातु श्रोत्रे रक्षेल्लकारकः || 2 ||

ह्रींकारः पातु नासाग्रं वक्त्रं वाग्भवसंज्ञिकः |
हकारः पातु कंठं मे सकारः स्कंधदेशकं || 3 ||

ककारो हृदयं पातु हकारो जठरं तथा |
लकारो नाभिदेशं तु ह्रींकारः पातु गुह्यकं || 4 ||

कामकूटः सदा पातु कटिदेशं ममावतु |
सकारः पातु चोरू मे ककारः पातु जानुनी || 5 ||

लकारः पातु जंघे मे ह्रींकारः पातु गुल्फकौ |
शक्तिकूटं सदा पातु पादौ रक्षतु सर्वदा || 6 ||

मूलमंत्रकृतं चैतत्कवचं यो जपेन्नरः |
प्रत्यहं नियतः प्रातस्तस्य लोका वशंवदाः || 7 ||

उत्तरन्यासः |
करन्यासः –
ऐं अंगुष्ठाभ्यां नमः |
ह्रीं तर्जनीभ्यां नमः |
श्रीं मध्यमाभ्यां नमः |
श्रीं अनामिकाभ्यां नमः |
ह्रीं कनिष्ठिकाभ्यां नमः |
ऐं करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः |

अंगन्यासः |
ऐं हृदयाय नमः |
ह्रीं शिरसे स्वाहा |
श्रीं शिखायै वषट् |
श्रीं कवचाय हुं |
ह्रीं नेत्रत्रयाय वौषट् |
ऐं अस्त्राय फट् |
भूर्भुवस्सुवरोमिति दिग्विमोकः |

इति ब्रह्मकृत श्री ललिता मूलमंत्र कवचं |

अर्थ

श्री ललिता मूलमंत्र कवचम् श्री महा त्रिपुरासुंदरी ललिता देवी के मूलमंत्र की शक्ति से भक्तों की रक्षा करने वाला एक दिव्य कवच है। अस्य श्रीललिता कवच स्तवरत्न मंत्रस्य के आनंदभैरव ऋषि हैं, अमृतविराट छंद है, श्री महात्रिपुरासुंदरी ललितापरांबा देवता हैं, ऐं बीजं है, ह्रीं शक्तिः है और श्रीं कीलकं है। इस कवच का जप करने से श्री ललितांबा की कृपा प्राप्त होती है और सभी सिद्धियाँ मिलती हैं। करन्यास और अंगन्यास के माध्यम से, शरीर के विभिन्न हिस्सों में देवी की शक्ति का आह्वान किया जाता है, जिससे मंत्र में दिव्य ऊर्जा भर जाती है। यह केवल एक श्लोक नहीं, बल्कि भक्त के आंतरिक और बाहरी जीवन की रक्षा करने वाली एक महान शक्ति है।

कवच के प्रारंभ में, भक्त श्रीविद्या स्वरूपिणी ललिता महादेवी का ध्यान करता है। मेरु पर्वत के शिखर पर स्थित बिंदु-त्रिकोण में आसीन, वाणी और समस्त जीवों की जननी, कामेश्वर के आसन पर उनकी गोद में विराजमान, करुणा रस से परिपूर्ण, चिदानंद स्वरूपिणी कामाक्षी देवी का स्मरण किया जाता है। यह ध्यान देवी की सर्वव्यापकता और करुणामयी स्वरूप को मन में स्थापित करता है। इसके बाद, लमित्यादि पंचपूजा के माध्यम से पांच तत्वों (गंध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य) द्वारा देवी की आराधना की जाती है। यह पूजा इस बात का प्रतीक है कि देवी पंचभूतों से बनी सृष्टि का सार हैं और उनमें ही समाहित हैं।

कवच के मुख्य श्लोक (2-7) यह बताते हैं कि कैसे ललिता मूलमंत्र के प्रत्येक बीजाक्षर (क, ह, ल, ह्रीं, ऐं, श्रीं) शरीर के विभिन्न हिस्सों की रक्षा करते हैं। सिर, नेत्र, कंठ से लेकर गुह्य स्थान तक, ललिता परांबा अपनी करुणा रूपी कवच से प्रत्येक अंग को ढक लेती हैं। उदाहरण के लिए, 'क' अक्षर सिर की, 'ह' नेत्रों की, 'ल' कंठ की रक्षा करता है। यह केवल भौतिक सुरक्षा नहीं, बल्कि सूक्ष्म शरीर और चेतना की सुरक्षा का भी प्रतीक है। ये मंत्राक्षर देवी के विभिन्न शक्ति स्वरूपों का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो भक्त को हर प्रकार के नकारात्मक प्रभावों से बचाते हैं।

इस मूलमंत्र कवच का प्रतिदिन जप करने वाले भक्त को भौतिक और आध्यात्मिक दोनों लोकों में सफलता प्राप्त होती है। दैवीय कृपा से वह सभी सिद्धियाँ प्राप्त करता है। इस कवच का नियमित पाठ भय, बाधाओं और बुरी शक्तियों को दूर करता है। 'ऐं ह्रीं श्रीं' का मूलमंत्र भक्त की चेतना को ललितांबा की कृपा से जोड़ता है और जीवन में ज्ञान का प्रकाश भरता है। यह केवल एक सुरक्षा मंत्र नहीं है, बल्कि परमात्मा के साथ एकात्मता प्राप्त करने का एक मार्ग भी है, जो भक्त को परम शांति और आनंद की ओर ले जाता है।

लाभ (Benefits):

  • पूर्ण सुरक्षा: यह कवच भक्त को शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक स्तर पर पूर्ण सुरक्षा प्रदान करता है, सभी प्रकार की नकारात्मक शक्तियों और बाधाओं से बचाता है।
  • भय निवारण: नियमित पाठ से भय, चिंता और असुरक्षा की भावनाएँ दूर होती हैं, जिससे भक्त को आंतरिक शांति और साहस प्राप्त होता है।
  • स्वास्थ्य और समृद्धि: देवी की कृपा से उत्तम स्वास्थ्य, दीर्घायु और भौतिक समृद्धि प्राप्त होती है। यह जीवन के सभी क्षेत्रों में सफलता प्रदान करता है।
  • आध्यात्मिक उन्नति: यह कवच भक्त की चेतना को जागृत करता है, आध्यात्मिक प्रगति और ज्ञानोदय में सहायक होता है। यह ललितांबा के साथ गहरा संबंध स्थापित करता है।
  • सर्व सिद्धि प्राप्ति: इस कवच का भक्तिपूर्वक पाठ करने वालों को सभी मनोकामनाएँ सिद्ध होती हैं, और जीवन में परम शांति तथा संतोष का अनुभव होता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

श्री ललिता मूलमंत्र कवचम् क्या है?
यह श्री ललिता त्रिपुरासुंदरी देवी के मूलमंत्र की शक्ति से युक्त एक सुरक्षात्मक स्तोत्र है, जो भक्तों को सभी प्रकार की बाधाओं और नकारात्मक शक्तियों से बचाता है।
इस कवच का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
इस कवच का पाठ प्रतिदिन प्रातः स्नान के बाद शुद्ध मन से, देवी का ध्यान करते हुए करना उत्तम है। विशेष रूप से शुक्रवार या मंगलवार को पाठ करना अधिक फलदायी होता है।
श्री ललिता मूलमंत्र कवचम् का पाठ करने से क्या लाभ होते हैं?
इससे शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक सुरक्षा, भय निवारण, उत्तम स्वास्थ्य, धन, आध्यात्मिक उन्नति और सभी मनोकामनाओं की सिद्धि प्राप्त होती है।
इस कवच का पाठ कौन कर सकता है?
ललिता देवी के भक्त, विशेष रूप से जीवन में सुरक्षा, शांति और समृद्धि की इच्छा रखने वाला कोई भी व्यक्ति इस कवच का पाठ कर सकता है। स्त्री-पुरुष दोनों पाठ कर सकते हैं।
इस कवच का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
सामान्यतः प्रतिदिन एक या तीन बार पाठ करना उत्तम है। विशेष फल के लिए 11, 21 या 108 बार भी पाठ किया जा सकता है, लेकिन नियमितता महत्वपूर्ण है।
इस कवच का उद्गम या स्रोत क्या है?
यह श्री महा त्रिपुरासुंदरी ललिता देवी की स्तुति करने वाले प्राचीन शक्ति शास्त्र का एक हिस्सा है। आनंदभैरव ऋषि इसके दृष्टा माने जाते हैं।

टिप्पणियाँ

टिप्पणी लिखने के लिए लॉगिन करें

टिप्पणियाँ लोड हो रही हैं...