श्री ललितार्या कवच स्तोत्रं
अगस्त्य उवाच |
हयग्रीव महाप्राज्ञ मम ज्ञानप्रदायक |
ललिता कवचं ब्रूहि करुणामयि चेत्तव || 1 ||
हयग्रीव उवाच |
निदानं श्रेयसामेतल्ललितावर्मसंज्ञितं |
पठतां सर्वसिद्धिस्स्यात्तदिदं भक्तितश्शृणु || 2 ||
ललिता पातु शिरो मे ललाटमंबा मधुमतीरूपा |
भ्रूयुग्मं च भवानी पुष्पशरा पातु लोचनद्वंद्वं || 3 ||
पायान्नासां बाला सुभगा दंतांश्च सुंदरी जिह्वां |
अधरोष्ठमादिशक्तिश्चक्रेशी पातु मे सदा चुबुकं || 4 ||
कामेश्वर्यवतु कर्णौ कामाक्षी पातु मे गंडयोर्युग्मं |
शृंगारनायिकाख्या वक्त्रं सिंहासनेश्वर्यवतु गळं || 5 ||
स्कंदप्रसूश्च पातु स्कंधौ बाहू च पाटलांगी मे |
पाणी च पद्मनिलया पायादनिशं नखावळिं विजया || 6 ||
कोदंडिनी च वक्षः कुक्षिं पायात्कुलाचलात्तभवा |
कल्याणीत्ववतु लग्नं कटिं च पायात्कलाधरशिखंडा || 7 ||
ऊरुद्वयं च पायादुमा मृडानी च जानुनी रक्षेत् |
जंघे च षोडशी मे पायात्पादौ च पाशसृणिहस्ता || 8 ||
प्रातः पातु परा मां मध्याह्ने पातु मां मणिगृहांतस्था |
शर्वाण्यवतु च सायं पायाद्रात्रौ च भैरवी सततं || 9 ||
भार्यां रक्षतु गौरी पायात्पुत्रांश्च बिंदुग्रहपीठा |
श्रीविद्या च यशो मे शीलं चाव्याच्चिरं महाराज्ञी || 10 ||
पवनमयि पावकमयि क्षोणीमयि व्योममयि कृपीटमयि |
श्रीमयि शशिमयि रविमयि समयमयि प्राणमयि शिवमयीत्यादि || 11 ||
काली कपालिनी शूलिनी भैरवी मातंगी पंचमी त्रिपुरे |
वाग्देवी विंध्यवासिनी बाले भुवनेशि पालय चिरं मां || 12 ||
अभिनवसिंदूराभामंब त्वां चिंतयंति ये हृदये |
उपरि निपतंति तेषामुत्पलनयना कटाक्षकल्लोलाः || 13 ||
वर्गाष्टपंक्तिकाभिर्वशिनी मुखाभिरधिकृतां भवतीं |
चिंतयतां पीतवर्णां पापोनिर्यात्य यत्नतो वदनात् || 14 ||
कनकलतावद्गौरीं कर्ण व्यालोल कुंडल द्वितयां |
प्रहसितमुखीं च भवतीं ध्यायंतोये भवंति मूर्धन्याः || 15 ||
शीर्षांभोरुहमध्ये शीतलपीयूषवर्षिणीं भवतीं |
अनुदिनमनुचिंतयतामायुष्यं भवति पुष्कलमवन्यां || 16 ||
मधुरस्मितां मदारुणनयनां मातंगकुंभवक्षोजां |
चंद्रावतंसिनीं त्वां सततं पश्यंति सुकृतिनः केचित् || 17 ||
ललितायाः स्तवरत्नं ललितपदाभिः प्रणीतमार्याभिः |
अनुदिनमनुचिंतयतां फलानिवक्तुं प्रगल्भते न शिवः || 18 ||
पूजा होमस्तर्पणं स्यान्मंत्रशक्तिप्रभावतः |
पुष्पाज्य तोयाभावेपि जपमात्रेण सिद्ध्यति || 19 ||
इति श्रीललितार्याकवचस्तोत्ररत्नं |
अर्थ
श्री ललितार्या कवच स्तोत्रम, देवी ललिता परमेश्वरी की दिव्य कृपा का आह्वान करने वाली एक अत्यंत शक्तिशाली और सुरक्षात्मक प्रार्थना है। इस कवच का उपदेश महर्षि अगस्त्य ने हयग्रीव भगवान से प्राप्त किया था। हयग्रीव, जो ज्ञान के प्रतीक हैं, ने बताया कि यह ललिता वर्म (कवच) सभी शुभ फल प्रदान करने वाला है और भक्तिपूर्वक इसका पाठ करने वाले को सभी सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं। यह केवल शारीरिक सुरक्षा ही नहीं, अपितु आध्यात्मिक और मानसिक शांति भी प्रदान करने वाला एक पूर्ण कवच है।
इस कवच में, देवी ललिता के विभिन्न रूपों को भक्त के शरीर के प्रत्येक अंग की रक्षा के लिए आमंत्रित किया गया है। मधुमती रूप में देवी हमारे सिर की रक्षा करती हैं, जबकि भवानी हमारी भौहों की रक्षा करती हैं। पुष्पशरा देवी हमारी दोनों आँखों की रक्षा करती हैं, जिससे दृष्टि संबंधी दोष दूर होते हैं। बाला, सुंदरी, चक्रेशी, कामेश्वरी, कामाक्षी और सिंहासनेश्वरी जैसे देवी के रूप शरीर के सभी अंगों, हाथों से लेकर पैरों तक, को दिव्य शक्ति से आच्छादित करते हैं और उन्हें दुष्ट शक्तियों तथा विपत्तियों से बचाते हैं। देवी का प्रत्येक रूप विशिष्ट शक्तियों से युक्त है, जो शरीर के सूक्ष्म भागों को भी सुरक्षा प्रदान करता है, जिससे भक्त पूरी तरह से देवी के कृपा कवच में रहता है।
यह कवच समय के अनुसार भी सुरक्षा का वर्णन करता है। प्रातःकाल में पराशक्ति के रूप में, मध्याह्न में मणिगृहस्था ललिता के रूप में, सायंकाल में शर्वाणी के रूप में और रात्रि में भैरवी के रूप में देवी भक्तों की निरंतर रक्षा करती हैं। यह चौबीसों घंटे की सुरक्षा भक्त के परिवार, यश, आयु और शील को देवी की असीम करुणा से आच्छादित कर सुरक्षित रखती है। यहाँ की विशेषता यह है कि देवी न केवल व्यक्ति की, बल्कि उसके जीवन के प्रत्येक पहलू, रिश्तों और सम्मान की भी रक्षा करती हैं।
देवी ललिता पंचभूतों – वायु, अग्नि, पृथ्वी, आकाश और जल तत्वों – का समेकित स्वरूप हैं। वह सूर्य, चंद्र, प्राण और शिव तत्वों का एकीकरण भी हैं। वह काली, भैरवी, मातंगी, वाग्देवी और भुवनेश्वरी के रूपों में जगत की रक्षा करती हैं। जो लोग हृदय में उनका ध्यान करते हैं, उन पर उनकी अमृतमयी कृपा दृष्टि सदैव बरसती रहती है। उनका मंदहासपूर्ण मुख, कमल के समान नेत्र और स्वर्ण कांति से चमकते कुंडल भक्तों के चित्त को शुद्ध करते हैं, जिससे आयु, ऐश्वर्य और मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस कवच का भक्तिपूर्वक पाठ करने वाले को शिव भी वर्णन न कर सकने वाले फल प्राप्त होते हैं। पूजा, होम, तर्पण के बिना भी, केवल जप मात्र से ही यह कवच सिद्धि प्रदान करता है।
लाभ (Benefits):
- समग्र शारीरिक सुरक्षा: देवी ललिता के विभिन्न रूप सिर से पैर तक शरीर के प्रत्येक अंग को बुरी शक्तियों, रोगों और दुर्घटनाओं से बचाते हैं।
- निरंतर दिव्य कृपा: देवी दिन के सभी प्रहरों (सुबह, दोपहर, शाम, रात) में भक्तों की रक्षा करती हैं, जिससे किसी भी समय होने वाली विपत्तियों से मुक्ति मिलती है।
- परिवार और जीवन की सुरक्षा: देवी अपनी करुणा से भक्तों के परिवार, यश, आयु और शील को सुरक्षित रखती हैं, जिससे जीवन में स्थिरता और समृद्धि आती है।
- आध्यात्मिक उन्नति और मोक्ष: देवी के ध्यान और कवच पाठ से मन शुद्ध होता है, आध्यात्मिक ज्ञान बढ़ता है और अंततः मोक्ष की प्राप्ति होती है।
- समस्त सिद्धियों की प्राप्ति: इस कवच के भक्तिपूर्ण पाठ से सभी प्रकार की इच्छाएँ, सिद्धियाँ और दिव्य आशीर्वाद प्राप्त होते हैं, पूजा और होम के बिना भी केवल जप से फल मिलता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
श्री ललितार्या कवच स्तोत्रं क्या है?
इस कवच का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
श्री ललितार्या कवच के पाठ से क्या प्रमुख लाभ मिलते हैं?
श्री ललितार्या कवच का पाठ कौन कर सकता है?
इस कवच का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
श्री ललितार्या कवच का मूल या पृष्ठभूमि क्या है?
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