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श्री कुमार स्तुतिः (विप्र कृतं)

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स्तोत्र
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श्री कुमार स्तुतिः (विप्र कृतं)

विप्र उवाच |
शृणु स्वामिन्वचो मेऽद्य कष्टं मे विनिवारय |
सर्वब्रह्मांडनाथस्त्वमतस्ते शरणं गतः || 1 ||

अजमेधाध्वरं कर्तुमारंभं कृतवानहं |
सोऽजो गतो गृहान्मे हि त्रोटयित्वा स्वबंधनं || 2 ||

न जाने स गतः कुत्राऽन्वेषणं तत्कृतं बहु |
न प्राप्तोऽतस्स बलवान् भंगो भवति मे क्रतोः || 3 ||

त्वयि नाथे सति विभो यज्ञभंगः कथं भवेत् |
विचार्यैवाऽखिलेशान काम पूर्णं कुरुष्व मे || 4 ||

त्वां विहाय शरण्यं कं यायां शिवसुत प्रभो |
सर्वब्रह्मांडनाथं हि सर्वामरसुसेवितं || 5 ||

दीनबंधुर्दयासिंधुः सुसेव्या भक्तवत्सलः |
हरिब्रह्मादिदेवैश्च सुस्तुतः परमेश्वरः || 6 ||

पार्वतीनंदनः स्कंदः परमेकः परंतपः |
परमात्मात्मदः स्वामी सतां च शरणार्थिनां || 7 ||

दीनानाथ महेश शंकरसुत त्रैलोक्यनाथ प्रभो
मायाधीश समागतोऽस्मि शरणं मां पाहि विप्रप्रिय |
त्वं सर्वप्रभुप्रियः खिलविदब्रह्मादिदेवैस्तुत-
-स्त्वं मायाकृतिरात्मभक्तसुखदो रक्षापरो मायिकः || 8 ||

भक्तप्राणगुणाकरस्त्रिगुणतो भिन्नोऽसि शंभुप्रियः
शंभुः शंभुसुतः प्रसन्नसुखदः सच्चित्स्वरूपो महान् |
सर्वज्ञस्त्रिपुरघ्नशंकरसुतः सत्प्रेमवश्यः सदा
षड्वक्त्रः प्रियसाधुरानतप्रियः सर्वेश्वरः शंकरः |
साधुद्रोहकरघ्न शंकरगुरो ब्रह्मांडनाथो प्रभुः
सर्वेषाममरादिसेवितपदो मां पाहि सेवाप्रिय || 9 ||

वैरिभयंकर शंकर जनशरणस्य
वंदे तव पदपद्मं सुखकरणस्य |
विज्ञप्तिं मम कर्णे स्कंद निधेहि
निजभक्तिं जनचेतसि सदा विधेहि || 10 ||

करोति किं तस्य बली विपक्षो
-दक्षोऽपि पक्षोभयापार्श्वगुप्तः |
किंतक्षकोप्यामिषभक्षको वा
त्वं रक्षको यस्य सदक्षमानः || 11 ||

विबुधगुरुरपि त्वां स्तोतुमीशो न हि स्या-
-त्कथय कथमहं स्यां मंदबुद्धिर्वरार्च्यः |
शुचिरशुचिरनार्यो यादृशस्तादृशो वा
पदकमल परागं स्कंद ते प्रार्थयामि || 12 ||

हे सर्वेश्वर भक्तवत्सल कृपासिंधो त्वदीयोऽस्म्यहं
भृत्यः स्वस्य न सेवकस्य गणपस्यागः शतं सत्प्रभो |
भक्तिं क्वापि कृतां मनागपि विभो जानासि भृत्यार्तिहा
त्वत्तो नास्त्यपरोऽविता न भगवन् मत्तो नरः पामरः || 13 ||

कल्याणकर्ता कलिकल्मषघ्नः
कुबेरबंधुः करुणार्द्रचित्तः |
त्रिषट्कनेत्रो रसवक्त्रशोभी
यज्ञं प्रपूर्णं कुरु मे गुह त्वं || 14 ||

रक्षकस्त्वं त्रिलोकस्य शरणागतवत्सलः |
यज्ञकर्ता यज्ञभर्ता हरसे विघ्नकारिणां || 15 ||

विघ्नवारण साधूनां सर्गकारण सर्वतः |
पूर्णं कुरु ममेशान सुतयज्ञ नमोऽस्तु ते || 16 ||

सर्वत्राता स्कंद हि त्वं सर्वज्ञाता त्वमेव हि |
सर्वेश्वरस्त्वमीशानो निवेशसकलाऽवनः || 17 ||

संगीतज्ञस्त्वमेवासि वेदविज्ञः परः प्रभुः |
सर्वस्थाता विधाता त्वं देवदेवः सतां गतिः || 18 ||

भवानीनंदनः शंभुतनयो वयुनः स्वराट् |
ध्याता ध्येयः पितॄणां हि पिता योनिः सदात्मनां || 19 ||

इति श्रीशिवमहापुराणे रुद्रसंहितायां कुमारखंडे षष्ठोऽध्याये श्रीकुमारस्तुतिः |

अर्थ

श्री कुमार स्तुतिः (विप्र कृतं) भगवान सुब्रह्मण्य स्वामी को समर्पित एक अत्यंत ही शक्तिशाली और भक्तिमय स्तोत्र है। इस स्तोत्र की उत्पत्ति एक प्राचीन कथा से जुड़ी है, जिसमें एक विप्र (ब्राह्मण) को अपने अनुष्ठान में एक बड़ी बाधा का सामना करना पड़ा था। विप्र ने अजमेध यज्ञ (बकरे की बलि का यज्ञ) प्रारंभ किया था, परंतु यज्ञ के लिए आवश्यक बकरा (अज) अपनी रस्सी तोड़कर भाग गया। इससे यज्ञ के भंग होने की आशंका से चिंतित होकर, और अपने सभी प्रयास विफल होने पर, विप्र ने भगवान कुमारस्वामी की शरण ली।

विप्र ने अपनी पीड़ा और असहायता को भगवान स्कंद के सामने व्यक्त करते हुए प्रार्थना की, “हे प्रभु! मेरी व्यथा को सुनिए और उसे दूर कीजिए। आप समस्त ब्रह्मांड के स्वामी हैं, इसलिए मैं आपकी शरण में आया हूँ।” वह बकरे के लापता होने के कारण यज्ञ के अधूरे रह जाने के भय को प्रकट करता है। वह पूछता है, “जब आप रक्षक के रूप में विद्यमान हैं, तो यज्ञ कैसे भंग हो सकता है? हे अखिलेश्वर, मेरी इस इच्छा को पूर्ण कीजिए।” वह यह भी कहता है कि स्कंद को छोड़कर वह किसका आश्रय ले, क्योंकि स्कंद ही सभी लोकों के स्वामी और समस्त देवताओं द्वारा पूजित हैं।

इस स्तोत्र में, विप्र भगवान कुमारस्वामी की महिमा का अत्यंत भक्तिपूर्वक गुणगान करता है। वह स्कंद को दीनबंधु (दीनों का मित्र), दयासिंधु (करुणा का सागर), और भक्तवत्सल (भक्तों से प्रेम करने वाले) के रूप में वर्णित करता है। वह कहता है कि ब्रह्मा, विष्णु आदि देवताओं द्वारा भी आप परमेश्वर स्तुत हैं। “हे पार्वती के पुत्र, स्कंद! आप सज्जनों और शरणागतों को आश्रय देने वाले परमात्मा हैं। हे त्रिलोकनाथ, शंकर के पुत्र! मैं आपकी शरण में आया हूँ, मेरी रक्षा कीजिए। आप माया के अधिपति और भक्तों के रक्षक हैं,” वह प्रार्थना करता है। वह स्कंद को सर्वज्ञ (सब कुछ जानने वाला), त्रिपुरासुर का संहारक, षण्मुख (छह मुखों वाला), भक्ति से आसानी से प्रसन्न होने वाला, सद्भक्तों का रक्षक, और सज्जनों को आनंदित करने वाला बताता है। ये सभी विशेषण स्कंद के दिव्य गुणों और उनकी सर्वोच्च शक्ति को उजागर करते हैं।

विप्र अपनी प्रार्थना जारी रखते हुए कहता है, “हे शंकर के पुत्र! आपके चरण कमल भय को नष्ट करते हैं। मेरी प्रार्थना सुनिए और मेरे हृदय में अटूट भक्ति स्थापित कीजिए। आपकी सुरक्षा में रहने वाले व्यक्ति को कोई भी शक्तिशाली शत्रु, यहाँ तक कि तक्षक जैसे विषैले सर्प भी, कुछ भी हानि नहीं पहुँचा सकते।” वह विनम्रता से कहता है कि जब ब्रह्मादि देवता भी आपकी महिमा का पूर्ण रूप से वर्णन नहीं कर सकते, तो मैं एक मनुष्य होकर कैसे कर सकता हूँ, परंतु मैं केवल आपके चरण धूलि की कामना करता हूँ।

अंत में, वह प्रार्थना करता है, “मैं आपका सेवक हूँ। मुझमें त्रुटियाँ होने पर भी, मुझे स्वीकार कीजिए। आप ही अपने भक्तों की रक्षा करते हैं। हे गुह! आप कल्याणकारी हैं, दोषों को दूर करने वाले हैं, और दया से परिपूर्ण हैं। मेरे यज्ञ को पूर्ण कीजिए।” वह विश्वास व्यक्त करता है कि तीनों लोकों के रक्षक आप ही यज्ञों को पूर्ण करते हैं और विघ्नों को दूर करते हैं। इस प्रकार, यह स्तोत्र भगवान सुब्रह्मण्य की शरणगति के महत्व और भक्तों के कष्टों को दूर करने की उनकी असीम करुणा को दर्शाता है।

लाभ (Benefits):

  • संकट और बाधा निवारण: इस स्तोत्र के नियमित पाठ से जीवन की सभी प्रकार की बाधाएँ, संकट और विघ्न दूर होते हैं। जैसे विप्र के यज्ञ की बाधा दूर हुई, वैसे ही भक्तों की समस्याएँ भी हल होती हैं।
  • शत्रु भय से मुक्ति और सुरक्षा: स्तोत्र के भक्तिपूर्ण पाठ से शत्रुओं से होने वाली परेशानियाँ और भय दूर होता है, तथा भगवान कुमारस्वामी की दिव्य सुरक्षा प्राप्त होती है। कोई भी शक्तिशाली शत्रु हानि नहीं पहुँचा सकता।
  • अटूट भक्ति और आध्यात्मिक उन्नति: भगवान सुब्रह्मण्य पर अटूट भक्ति और श्रद्धा विकसित होती है, जो आध्यात्मिक उत्थान और मन की शांति में सहायक है। हृदय में दैवीय प्रेम स्थापित होता है।
  • शुभ कार्यों की सिद्धि: कोई भी शुभ कार्य, यज्ञ, धार्मिक अनुष्ठान या व्यक्तिगत लक्ष्य निर्विघ्न और सफलतापूर्वक पूर्ण होते हैं। यह स्तोत्र ऐसे कार्यों में सफलता दिलाने में अत्यंत सहायक है।
  • ज्ञान, बुद्धि और विवेक की प्राप्ति: चूंकि कुमारस्वामी ज्ञान और बुद्धि के देवता हैं, इस स्तोत्र का पाठ ज्ञानार्जन, बौद्धिक क्षमता और विवेक को बढ़ाता है, जिससे सही निर्णय लेने में मदद मिलती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

श्री कुमार स्तुति (विप्र कृतं) क्या है?
यह एक ब्राह्मण (विप्र) द्वारा भगवान सुब्रह्मण्य स्वामी को समर्पित एक भक्तिपूर्ण स्तोत्र है, जिसे उसने अपने यज्ञ में आई बाधा को दूर करने के लिए प्रार्थना करते हुए रचा था। यह कुमारस्वामी की महिमा और भक्तों के प्रति उनके प्रेम का वर्णन करता है।
श्री कुमार स्तुति का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
इस स्तोत्र का पाठ प्रतिदिन सुबह स्नान के बाद, शुद्ध मन से भगवान सुब्रह्मण्य के चित्र या विग्रह के सामने किया जा सकता है। विशेष रूप से मंगलवार या षष्ठी तिथि पर इसका पाठ करना अधिक फलदायी माना जाता है।
इस स्तोत्र के पाठ के प्रमुख लाभ क्या हैं?
इस स्तोत्र का पाठ करने से जीवन के संकट, बाधाएँ और विघ्न दूर होते हैं। शत्रु भय समाप्त होता है, सुरक्षा प्राप्त होती है, अटूट भक्ति उत्पन्न होती है, और सभी शुभ कार्य सफलतापूर्वक पूर्ण होते हैं।
कौन इस स्तोत्र का पाठ कर सकता है?
कोई भी व्यक्ति, बिना किसी जाति, पंथ या लिंग भेद के, जो भगवान सुब्रह्मण्य में श्रद्धा और भक्ति रखता है, इस स्तोत्र का पाठ कर सकता है। विशेष रूप से जीवन में बाधाओं का सामना कर रहे लोग या शुभ कार्य करने वाले इसका पाठ कर सकते हैं।
श्री कुमार स्तुति का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
इस स्तोत्र का पाठ प्रतिदिन कम से कम 11 या 21 बार किया जा सकता है। विशेष फल के लिए 108 बार या अपनी श्रद्धा के अनुसार अधिक बार भी पाठ किया जा सकता है। निरंतर पाठ से उत्तम परिणाम प्राप्त होते हैं।
इस स्तोत्र का मूल या उद्गम क्या है?
श्री कुमार स्तुति (विप्र कृतं) स्तोत्र की उत्पत्ति पुराणों में वर्णित एक घटना से हुई है। जब एक ब्राह्मण को अपने यज्ञ में बाधा का सामना करना पड़ा, तो उसने भगवान कुमारस्वामी से भक्तिपूर्वक प्रार्थना की और उनकी कृपा प्राप्त की, उसी संदर्भ में यह स्तोत्र रचा गया।

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