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श्री किराताष्टकं

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स्तोत्र
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श्री किराताष्टकं
 
ॐ अस्य श्रीकिरातशस्तुर्महामंत्रस्य रेमंत ऋषिः देवी गायत्री छंदः श्री किरात शास्ता देवता, ह्रां बीजं, ह्रीं शक्तिः, ह्रूं कीलकं, श्री किरात शस्तु प्रसाद सिद्ध्यर्थे जपे विनियोगः |

करन्यासः
ॐ ह्रां अंगुष्ठाभ्यां नमः |
ॐ ह्रीं तर्जनीभ्यां नमः |
ॐ ह्रूं मध्यमाभ्यां नमः |
ॐ ह्रैं अनामिकाभ्यां नमः |
ॐ ह्रौं कनिष्ठिकाभ्यां नमः |
ॐ ह्रः करतल करपृष्ठाभ्यां नमः |

अंगन्यासः
ॐ ह्रां हृदयाय नमः |
ॐ ह्रीं शिरसे स्वाहा |
ॐ ह्रूं शिखायै वषट् |
ॐ ह्रैं कवचाय हुम् |
ॐ ह्रौं नेत्रत्रयाय वौषट् |
ॐ ह्रः अस्त्राय फट् |
भूर्भुवस्सुवरोमिति दिग्बंधः |

ध्यानम्:
ॐ कोदंडं सशरं भुजेन भुजगेंद्रभोगा भासावहन्
वामेनच्छुरिकां विभक्षलने पक्षेण दक्षेण च |
कांत्या निर्जित नीरदः पुरभिदः क्रीडन्किराताकृते
पुत्रोस्माकमनल्प निर्मलया च निर्मातु शर्मानिशम् ||

स्तोत्रं:
प्रत्यर्थिव्रातवक्षःस्थलरुधिरसुरापानमत्ता पृषत्कं
चापे संधाय तिष्ठन् हृदयसरसिजे मामके तापहं तम् |
पिंछोत्तंसः शरण्यः पशुपतितनयो नीरदाभः प्रसन्नो
देवः पायादपायाच्छबरवपुरसौ सावधानः सदा नः || 1 ||

आखेटाय वनेचरस्य गिरिजासक्तस्य शंभोः सुतः
त्रातुं यो भुवनं पुरा समजनि ख्यातः किराताकृतिः |
कोदंडक्षुरिकाधरो घनरवः पिंछावतंसोज्ज्वलः
स त्वं मामव सर्वदा रिपुगणत्रस्तं दयावारिधे || 2 ||

यो मां पीडयति प्रसह्य सततं देहीत्यनन्याश्रयं
भित्वा तस्य रिपोरुरः क्षुरिकया शाताग्रया दुर्मतेः |
देव त्वत्करपंकजोल्लसितया श्रीमन्किराताकृतेः
तत्प्राणान्वितरांतकाय भगवन् कालारिपुत्रांजसा || 3 ||

विद्धो मर्मसु दुर्वचोभिरसतां संतप्तशल्योपमैः
दृप्तानां द्विषतामशांतमनसां खिन्नोऽस्मि यावद्भृशम् |
तावत्त्वं क्षुरिकाशरासनधरश्चित्ते ममाविर्भवन्
स्वामिन् देव किरातरूप शमय प्रत्यर्थिगर्वं क्षणात् || 4 ||

हर्तुं वित्तमधर्मतो मम रताश्चोराश्च ये दुर्जना-
-स्तेषां मर्मसु ताडयाशु विशिखैस्त्वत्कार्मुकान्निःसृतैः ||

शास्तारं द्विषतां किरातवपुषं सर्वार्थदं त्वामृते
पश्याम्यत्र पुरारिपुत्र शरणं नान्यं प्रपन्नोऽम्यहम् || 5 ||

यक्षप्रेतपिशाचभूतनिवहा दुःखप्रदा भीषणाः
बाधंते नरशोणितोत्सुकधियो ये मां रिपुप्रेरिताः |
चापज्यानिनदैस्त्वमीश सकलान् संहृत्य दुष्टग्रहान्
गौरीशात्मज दैवतेश्वर किराताकार संरक्ष माम् || 6 ||

दोग्धुं ये निरतास्त्वमद्य पदपद्मैकांतभक्ताय मे
मायाच्छन्नकलेबराश्रुविषदानाद्यैः सदा कर्मभिः |
वश्यस्तंभनमारणादिकुशलप्रारंभदक्षानरीन्
दुष्टान् संहर देवदेव शबराकार त्रिलोकेश्वर || 7 ||

तन्वा वा मनसा गिरापि सततं दोषं चिकीर्षत्यलं
त्वत्पादप्रणतस्य निरपराधस्यापि ये मानवाः |
सर्वान् संहर तान् गिरीशसुत मे तापत्रयौघानपि
त्वामेकं शबराकृते भयहरं नाथं प्रपन्नोऽस्म्यहम् || 8 ||

क्लिष्टो राजभटैस्तदापि परिभूतोऽहं कुलैर्वैरिभिः
-श्चान्यैर्घोरतरैर्विपज्जलनिधौ मग्नोऽस्मि दुःखातुरम् |
हा हा किंकरवै विभो शबरवेषं त्वामभीष्टार्थदं
वंदेऽहं परदैवतं कुरु कृपानाथार्तबंधो मयि || 9 ||

स्तोत्रं यः प्रजपेत् प्रशांतकरणैर्नित्यं किराताष्टकं
स क्षिप्रं वशगान् करोति नृपतीनाबद्धवैरानपि |
संहृत्यात्मविरोधिनः खिलजनान् दुष्टग्रहानप्यसौ
यात्यंते यमदूतभीतिरहितो दिव्यां गतिं शाश्वतीम् || 10 ||

इति किराताष्टकम् संपूर्णं ||

अर्थ

श्री किराताष्टकं भगवान श्री किरात शास्ता को समर्पित एक अत्यंत शक्तिशाली और भक्तिपूर्ण स्तोत्र है। किरात शास्ता भगवान अय्यप्पा स्वामी का एक रूप हैं, जो शिव और विष्णु के मोहिनी अवतार के पुत्र होने के कारण अपार शक्ति और सुरक्षात्मक गुणों से युक्त हैं। यह अष्टकम् मुख्य रूप से भक्तों को समग्र सुरक्षा, शत्रुओं पर विजय, उत्तम स्वास्थ्य और मानसिक शांति प्रदान करने के उद्देश्य से रचा गया है। इस स्तोत्र का प्रत्येक भाग भगवान के दिव्य गुणों और आशीर्वाद का आह्वान करता है।

स्तोत्र का आरंभ महामंत्र के विनियोग से होता है, जहाँ ऋषि, छंद, देवता, बीज, शक्ति और कीलक का स्पष्ट उल्लेख किया गया है। 'रेमंत ऋषिः, देवी गायत्री छंदः, श्री किरात शास्ता देवता' का उल्लेख इस मंत्र की प्राचीनता और दैवीय संबंध को दर्शाता है। इसके बाद करन्यास और अंगन्यास का विवरण दिया गया है, जो मंत्र जप से पहले शरीर को शुद्ध करने और दैवीकरण करने में सहायक होते हैं, जिससे मंत्र की शक्ति भक्त के शरीर में स्थापित हो सके। यह केवल शब्दों का उच्चारण नहीं, बल्कि दिव्य शक्ति के साथ पूर्ण रूप से एकाकार होने की प्रक्रिया है।

ध्यान श्लोक में किरात शास्ता के दिव्य स्वरूप का अत्यंत सुंदर वर्णन किया गया है। 'कोदंडं सशरं भुजेन भुजगेंद्रभोगा भासावहन वामेनाच्छुरिकां विभक्षलने पक्षेण दक्षेण च' – अर्थात्, जो अपनी भुजा पर धनुष और बाण धारण किए हुए हैं, अपने बाएँ हाथ में कटार पकड़े हुए हैं, सर्प के समान चमकते हुए शरीर वाले, अपनी कांति से वर्षा के बादलों को भी जीतने वाले, भगवान शिव के पुत्र किरात रूपी शास्ता हमें सदैव निर्मल कल्याण प्रदान करें। यह ध्यान भगवान के विजयी और सुरक्षात्मक रूप को हमारे मन में स्थापित करने में मदद करता है, जिससे उनकी शक्ति हमें घेर लेती है।

इस स्तोत्र का नियमित पाठ न केवल बाहरी शत्रुओं से, बल्कि आंतरिक बाधाओं, नकारात्मक विचारों और बुरी शक्तियों से भी रक्षा प्रदान करता है। यह भक्त के मन में साहस, आत्मविश्वास और दृढ़ता भरता है। किरात शास्ता न्याय और धर्म के संरक्षक होने के कारण, उनके स्तोत्र का पाठ करने से जीवन में सत्य और सदाचार के मार्ग पर चलने की प्रेरणा मिलती है। यह अष्टकम् भक्त के जीवन में समृद्धि, शांति और संतोष लाने में सहायक है।

लाभ (Benefits):

  • समग्र सुरक्षा: इस स्तोत्र का पाठ करने से सभी प्रकार के बाहरी और आंतरिक शत्रुओं, बाधाओं और बुरी शक्तियों से रक्षा प्राप्त होती है।
  • शत्रुओं पर विजय: जीवन में आने वाली चुनौतियों और प्रतिस्पर्धाओं में विजय प्राप्त करने के लिए आत्मविश्वास और साहस प्रदान करता है।
  • स्वास्थ्य और कल्याण: भगवान किरात शास्ता के आशीर्वाद से शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य बेहतर होता है, तथा सभी प्रकार का कल्याण प्राप्त होता है।
  • नकारात्मक शक्तियों का निवारण: नकारात्मक प्रभावों और बुरी नज़र से मुक्ति पाने में मदद करता है, सकारात्मक वातावरण का निर्माण करता है।
  • मानसिक शांति और संतोष: नियमित पाठ से मन में स्थिरता, शांति और आंतरिक संतोष स्थापित होता है, चिंता और भय दूर होते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

श्री किराताष्टकं क्या है?
श्री किराताष्टकं भगवान किरात शास्ता (अय्यप्पा स्वामी का एक रूप) की स्तुति में रचित आठ श्लोकों का एक स्तोत्र है। यह भक्तों को सुरक्षा, विजय और समृद्धि प्रदान करता है।
इस स्तोत्र का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
इस स्तोत्र का पाठ किसी भी समय किया जा सकता है, लेकिन सुबह स्नान के बाद और शाम को दीपक जलाने के बाद पाठ करना अधिक शुभ माना जाता है। इसे शुद्ध मन और भक्ति के साथ पढ़ना चाहिए।
श्री किराताष्टकं के पाठ से क्या प्रमुख लाभ मिलते हैं?
इस स्तोत्र का पाठ शत्रुओं से रक्षा, बाधाओं का निवारण, उत्तम स्वास्थ्य, मानसिक शांति और जीवन में सफलता प्रदान करता है। यह नकारात्मक शक्तियों से मुक्ति दिलाने में सहायक है।
श्री किराताष्टकं का पाठ कौन कर सकता है?
भगवान किरात शास्ता के भक्त, विशेष रूप से जो सुरक्षा, चुनौतियों से मुक्ति और आध्यात्मिक प्रगति चाहते हैं, वे इस स्तोत्र का पाठ कर सकते हैं। इसे कोई भी व्यक्ति बिना किसी भेदभाव के पढ़ सकता है।
इस स्तोत्र का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
प्रतिदिन कम से कम एक बार या 11, 21, 108 बार पाठ किया जा सकता है। संकटों के निवारण के लिए संकल्पपूर्वक एक निश्चित संख्या में पाठ किया जा सकता है। नियमित पाठ अधिक प्रभावी होता है।
श्री किराताष्टकं का उद्गम या पृष्ठभूमि क्या है?
श्री किराताष्टकं भगवान अय्यप्पा स्वामी के किरात रूप की स्तुति करता है। किरात रूप शिव और विष्णु के मोहिनी रूप के संयोग से उत्पन्न शास्ता के विजयी और सुरक्षात्मक स्वरूप का प्रतिनिधित्व करता है।

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