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श्री कार्तिकेय स्तोत्रं

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स्तोत्र
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श्री कार्तिकेय स्तोत्रं

कार्तिकेय करुणामृतराशे
कार्तिके यतहृदा तव पूजा |
पूर्तये भवति वांछितपंक्तेः
कीर्तये च रचिता मनुजेन || 1 ||

अत्यंतपापकर्मा
मत्तुल्यो नास्ति भूतले गुह भो |
पूरयसि यदि मदिष्टं
चित्रं लोकस्य जायते भूरि || 2 ||

कारागृहस्थितं य-
-श्चक्रे लोकेशमपि विधातारम् |
तमनुल्लंघितशासन-
-मनिशं प्रणमामि षण्मुखं मोदात् || 3 ||

नाहं मंत्रजपं ते
सेवां सपर्यां वा |
नैसर्गिक्या कृपया
मदभीष्टं पूरयाशु तद्गुह भो || 4 ||

निखिलानपि मम मंतू-
-न्सहसे नैवात्र संशयः कश्चित् |
यस्मात्सहमानसुत-
-स्त्वमसि कृपावारिधे षडास्य विभो || 5 ||

यदि मद्वाच्छितदाने
शक्तिर्नास्तीति षण्मुख ब्रूषे |
तदनृतमेव स्यात्ते
वाक्यं शक्तिं दधासि यत्पाणौ || 6 ||

मयूरस्य पत्रे प्रलंबं पदाब्जं
दधानं ककुद्येव तस्यापरं च |
सुरेंद्रस्य पुत्र्या च वल्ल्या च पार्श्व-
-द्वयं भासयंतं षडास्यं भजेऽहम् || 7 ||

विवेकं विरक्तिं शमादेश्च षट्कं
मुमुक्षां च दत्त्वा षडास्याशु मह्यम् |
विचारे च बुद्धिं दृढां देहि वल्ली-
-सुरेंद्रात्मजाश्लिष्टवर्ष्मन्नमस्ते || 8 ||

सुरेशानपुत्रीपुलिंदेशकन्या-
-समाश्लिष्टपार्श्वं कृपावारिराशिम् |
मयूराचलाग्रे सदा वासशीलं
सदानंददं नौमि षड्वक्त्रमीशम् || 9 ||

स्वभक्तैर्महाभक्तितः पक्वदेहा-
-न्समानीय दूरात्पुरा स्थापितान्यः |
क्षणात्कुक्कुटादीन्पुनः प्राणयुक्ता-
-न्करोति स्म तं भावयेऽहं षडास्यम् || 10 ||

रवजितपरपुष्टरव
स्वरधिपपुत्रीमनोऽब्जशिशुभानो |
पुरतो भव मम शीघ्रं
पुरहरमोदाब्धिपूर्णिमाचंद्र || 11 ||

शतमखमुखसुरपूजित
नतमतिदानप्रचंडपदसेव |
श्रितजनदुःखविभेद-
-व्रतधृतकंकण नमोऽस्तु गुह तुभ्यम् || 12 ||

वृष्टिं प्रयच्छ षण्मुख
मय्यपि पापे कृपां विधायाशु |
सुकृतिषु करुणाकरणे
का वा श्लाघा भवेत्तव भो || 13 ||

महीजलाद्यष्टतनोः पुराणां
हरस्य पुत्र प्रणतार्तिहारिन् |
प्रपन्नतापस्य निवारणाय
प्रयच्छ वृष्टिं गुह षण्मुखाशु || 14 ||

पादाब्जनम्राखिलदेवताले
सुदामसंभूषितकंबुकंठ |
सौदामनीकोटिनिभांगकांते
प्रयच्छ वृष्टिं गुह षण्मुखाशु || 15 ||

शिखिस्थिताभ्यां रमणीमणिभ्यां
पार्श्वस्थिताभ्यां परिसेव्यमानम् |
स्वयं शिखिस्थं करुणासमुद्रं
सदा षडास्यं हृदि भावयेऽहम् || 16 ||

भूयाद्भूत्यै महत्यै भवतनुजननश्चूर्णितक्रौंचशैलो
लीलासृष्टांडकोटिः कमलभवमुखस्तूयमानात्मकीर्तिः |
वल्लीदेवेंद्रपुत्रीहृदयसरसिजप्रातरादित्यपुंजः
कारुण्यापारवारांनिधिरगतनयामोदवाराशिचंद्रः || 17 ||

इति श्रीशृंगेरिजगद्गुरु श्रीसच्चिदानंद शिवाभिनवनृसिंहभारती स्वामिभिः विरचितं श्री कार्तिकेय स्तोत्रम् |

अर्थ

श्री कार्तिकेय स्तोत्रं भगवान शिव और पार्वती के पुत्र, श्री कार्तिकेय को समर्पित एक भक्तिपूर्ण प्रार्थना है। उन्हें स्कंद, षण्मुख, कुमार, सुब्रह्मण्य और मुरुगन जैसे विभिन्न नामों से भी जाना जाता है। यह स्तोत्र भक्त की गहरी आस्था, विनम्रता और भगवान कार्तिकेय की असीम करुणा पर निर्भरता को दर्शाता है। भक्त अपने पापों को स्वीकार करते हुए, अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए भगवान की दया की याचना करता है। इस स्तोत्र का पाठ करके, भक्त भगवान की महिमा का गुणगान करता है और अपनी सभी इच्छाओं को पूरा करने के लिए उनकी दिव्य शक्ति पर विश्वास करता है।

कार्तिकेय ज्ञान शक्ति और विजय के प्रतीक हैं। वे अज्ञान को नष्ट करने वाले और दिव्य ज्ञान प्रदान करने वाले हैं। इस स्तोत्र के माध्यम से, भक्त न केवल भौतिक इच्छाओं की पूर्ति के लिए, बल्कि विवेक, वैराग्य, शम, दम और मोक्ष जैसे आध्यात्मिक गुणों के लिए भी प्रार्थना करता है। यह स्तोत्र भगवान की अपार शक्ति, करुणा और उनके आदेशों को कोई भी नहीं तोड़ सकता, इस बात पर जोर देता है। यह भगवान के प्रति पूर्ण समर्पण के महत्व को प्रतिपादित करता है और यह स्पष्ट करता है कि उनकी करुणा के योग्य होने के लिए किसी पुण्य की आवश्यकता नहीं है; उनकी दया सार्वभौमिक और असीमित है।

स्तोत्र का प्रत्येक पद भगवान कार्तिकेय के विभिन्न गुणों और महिमा को उजागर करता है। भक्त अपने पापों को स्वीकार करता है, खुद को सबसे बड़ा पापी कहता है, फिर भी दृढ़ता से विश्वास करता है कि भगवान की करुणा से उसकी इच्छाएं पूरी होंगी। भक्त घोषणा करता है कि सृष्टिकर्ता ब्रह्मा को भी कारागार में डालने वाले शक्तिशाली कार्तिकेय के आदेश का कोई उल्लंघन नहीं कर सकता। भक्त प्रार्थना करता है कि वह कोई मंत्र जप या बड़ी पूजा नहीं करता, लेकिन भगवान अपनी स्वाभाविक करुणा से उसकी इच्छा पूरी करें। भक्त दृढ़ता से मानता है कि हिमवान के पुत्र कार्तिकेय, करुणा के सागर हैं और उनकी सभी इच्छाओं को पूरा करने की शक्ति रखते हैं। भक्त कार्तिकेय के रूप का ध्यान करता है - मोर पर कमल जैसे चरण रखे हुए, वल्ली और देवसेना के साथ चमकते हुए, और छह मुखों वाले भगवान का रूप।

विवेक, वैराग्य, शम (मन की शांति), दम (इंद्रियों पर नियंत्रण), उत्साह (आध्यात्मिक उत्साह) और मुमुक्षुत्व (मोक्ष की इच्छा) जैसे आध्यात्मिक गुणों को प्रदान करने और बुद्धि को दृढ़ करने के लिए प्रार्थना की जाती है। वल्ली और देवसेना के साथ मोर पर विराजमान करुणा के सागर कार्तिकेय को नमन किया जाता है। भक्त प्रशंसा करता है कि आप वह महात्मा हैं जिन्होंने दूर से लाए गए मृत प्राणियों में भी जीवन भर दिया, यह आपकी अपार करुणा का प्रमाण है। चंद्रमा के समान तेजस्वी भगवान से प्रार्थना की जाती है कि वे सामने आकर मन को प्रकाशित करें। इंद्र और अन्य देवताओं द्वारा पूजित कार्तिकेय को नमन किया जाता है, जिनके चरण सभी दुखों का नाश करते हैं। अंत में, स्तोत्र कार्तिकेय की महिमा का गुणगान करता है - वे कृपा के सागर हैं, युवा रूप में ही शक्ति प्रदान करने वाले हैं, करोड़ों रचनाएं करने वाले महाशक्तिशाली हैं, वल्ली और देवसेना के हृदय को आनंदित करने वाले हैं, और जगत को आनंद देने वाले हैं।

लाभ (Benefits):

  • इच्छा पूर्ति: इस स्तोत्र का ईमानदारी से पाठ करने से भक्त की सभी न्यायोचित इच्छाएँ और प्रार्थनाएँ पूरी होती हैं, जिससे जीवन में संतुष्टि आती है।
  • ज्ञान और विवेक में वृद्धि: भगवान कार्तिकेय ज्ञान के अधिष्ठाता देव होने के कारण, इस स्तोत्र का पाठ बुद्धि, विवेक, निर्णय लेने की क्षमता और आध्यात्मिक समझ को बढ़ाता है।
  • दुखों और बाधाओं का निवारण: जीवन की कठिनाइयों, बाधाओं, नकारात्मक शक्तियों और दुखों से मुक्ति मिलती है, मन को शांति और स्थिरता प्राप्त होती है।
  • रक्षा और साहस: यह स्तोत्र भक्त को शत्रुओं, नकारात्मक प्रभावों से सुरक्षा प्रदान करता है और जीवन की चुनौतियों का सामना करने के लिए साहस, आत्मविश्वास और आंतरिक शक्ति को बढ़ाता है।
  • आध्यात्मिक उन्नति: वैराग्य, शम, दम और मोक्ष जैसे आध्यात्मिक गुणों को विकसित करने में सहायता करता है, जिससे जीवन में आध्यात्मिक प्रगति और अंततः मोक्ष की प्राप्ति संभव होती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

श्री कार्तिकेय स्तोत्रं क्या है?
श्री कार्तिकेय स्तोत्रं भगवान शिव के पुत्र कार्तिकेय को समर्पित एक भक्तिपूर्ण स्तोत्र है। यह भक्त की विनम्र प्रार्थनाओं, इच्छाओं और भगवान की असीम करुणा का वर्णन करता है।
श्री कार्तिकेय स्तोत्रं का पाठ कब करना चाहिए?
इस स्तोत्र का पाठ किसी भी समय किया जा सकता है, लेकिन मंगलवार, षष्ठी तिथियों (विशेषकर स्कंद षष्ठी), या कार्तिकेय को समर्पित अन्य शुभ दिनों में पाठ करना अधिक लाभकारी होता है। सुबह स्नान के बाद शुद्ध मन से पाठ करना उत्तम है।
श्री कार्तिकेय स्तोत्रं का पाठ करने के क्या लाभ हैं?
इस स्तोत्र का पाठ करने से इच्छा पूर्ति, ज्ञान और विवेक में वृद्धि, दुखों और बाधाओं का निवारण, रक्षा, साहस और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है। यह मन को शांति और आत्मविश्वास प्रदान करता है।
श्री कार्तिकेय स्तोत्रं का पाठ किसे करना चाहिए?
जो कोई भी अपनी इच्छाओं को पूरा करना चाहते हैं, ज्ञान और विवेक प्राप्त करना चाहते हैं, बाधाओं को दूर करना चाहते हैं या आध्यात्मिक प्रगति प्राप्त करना चाहते हैं, ऐसे सभी भक्त इस स्तोत्र का पाठ कर सकते हैं।
इस स्तोत्र का कितनी बार पाठ करना चाहिए?
इस स्तोत्र का प्रतिदिन कम से कम एक बार या 3, 5, 11, 108 बार पाठ किया जा सकता है। महत्वपूर्ण बात यह है कि इसे भक्ति और श्रद्धा के साथ पढ़ा जाए।
श्री कार्तिकेय स्तोत्रं का मूल क्या है?
श्री कार्तिकेय स्तोत्रं का सटीक मूल स्पष्ट नहीं है, लेकिन यह प्राचीन हिंदू धर्मग्रंथों में पाए जाने वाले कई स्तोत्रों में से एक है। ऐसा माना जाता है कि इसकी रचना भगवान कार्तिकेय के भक्तों द्वारा की गई थी।

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