श्री कामाक्षी स्तुतिः
वंदे कामाक्ष्यहं त्वां वरतनुलतिकां विश्वरक्षैकदीक्षां
विष्वग्विश्वंभरायामुपगतवसतिं विश्रुतामिष्टदात्रीं |
वामोरूमाश्रितार्तिप्रशमननिपुणां वीर्यशौर्याद्युपेतां
वंदारुस्वस्वर्द्रुमिंद्राद्युपगतविटपां विश्वलोकालवालां ||1||
चापल्यादियमभ्रगा तटिदहो किंचेत्सदा सर्वगा-
ह्यज्ञानाख्यमुदग्रमंधतमसं निर्णुद्य निस्तंद्रिता |
सर्वार्थावलिदर्शिका च जलदज्योतिर्न चैषा तथा
यामेवं विवदंति वीक्ष्य विबुधाः कामाक्षि नः पाहि सा ||2||
दोषोत्सृष्टवपुः कलां च सकलां बिभ्रत्यलं संततं
दूरत्यक्तकलंकिका जलजनुर्गंधस्य दूरस्थिता |
ज्योत्स्नातो ह्युपरागबंधरहिता नित्यं तमोघ्ना स्थिरा
कामाक्षीति सुचंद्रिकातिशयता सा पातु नः सर्वदा ||3||
दिश्याद्देवि सदा त्वदंघ्रिकमलद्वंद्वं श्रितालिष्वलं
वृत्तिं तत्स्वयमादधच्च विमुखं दोषाकराडंबरे |
सूर्यादर्शहसन्मुखं श्रुतिपथस्यात्यंतभूषायितं
नेत्रानंदविधायि पंकमधरीकृत्योज्ज्वलं सद्धृतं ||4||
कामाक्षीपदपद्मयुग्ममनघं कुर्यान्मदीये मनः-
कासारे वसतिं सदापि सुमनस्संदोहसंराजिते |
सुज्ञानामृतपूरिते कलुषताहीने च पद्मालये
नित्यं सत्कुमुदाश्रिते निजवसत्यात्तप्रभावे सदा ||5||
कामक्षीपदपद्मयुग्मनखराः सम्यक्कलासंयुताः
नित्यं सद्गुणसंश्रिताः कुवलयामोदोद्भवाधायकाः |
उत्कोचं दधतश्च पंकजनुषां संरोचकाः स्थानतः
श्रेष्ठादिंदुनिरासकारिविभवा रक्षंतु नः सर्वदा ||6||
कामाक्षीचरणारविंदयुगलीगुल्फद्वयं रक्षता-
दस्मान् संततमाश्रितार्तिशमनं दोषौघविध्वंसनं |
तेजःपूरनिधानमंघ्रिवलयाद्याकल्पसंघट्टन-
प्रोद्यद्ध्वानमिषेण च प्रतिशृणन्नम्रालिरक्षामिव ||7||
जंघे द्वे भवतां जगत्त्रयनुते नित्यं त्वदीये मन-
स्संतोषाय ममामितोर्जितयशःसंपत्तये च स्वयं |
साम्योलंघनजांघिके सुवपुषा वृत्ते प्रभासंयुते
हे कामाक्षि समुन्नते त्रिभुवनीसंक्रांतियोग्ये वरे ||8||
कामाक्ष्यन्वहमेधमानमवताज्जानुद्वयं मां तव
प्रख्यातारिपराभवैकनिरति प्रद्योतनाभं द्युतेः |
सम्यग्वृत्तमतीव सुंदरमिदं संपन्निदानं सतां
लोकप्राभवशंसि सर्वशुभदं जंघाद्वयोत्तंभनं ||9||
ऊरू ते भवतां मुदे मम सदा कामाक्षि भो देवते
रंभाटोपविमर्दनैकनिपुणे नीलोत्पलाभे शुभे |
शुंडादंडनिभे त्रिलोकविजयस्तंभौ शुचित्वार्जव-
श्रीयुक्ते च नितंबभारभरणैकाग्रप्रयत्ने सदा ||10||
कामाक्ष्यन्वहमिंधतां निगनिगप्रद्योतमानं परं
श्रीमद्दर्पणदर्पहारि जघनद्वंद्रं महत्तावकम |
यत्रेयं प्रतिबिंबिता त्रिजगती सृष्टेव भूयस्त्वया
लीलार्थं प्रतिभाति सागरवनग्रावादिकार्धावृता ||11||
बोभूतां यशसे ममांब रुचिरौ भूलोकसंचारतः
श्रांतौ स्थूलतरौ तवातिमृदुलौ स्निग्धौ नितंबौ शुभौ |
गांगेयोन्नतसैकतस्थलकचग्राहिस्वरूपौ गुण-
श्लाघ्यौ गौरवशोभिनौ सुविपुलौ कामाक्षि भो देवते ||12||
कामाक्ष्यद्य सुरक्षतात् कटितटी तावक्यतीवोज्ज्वल-
द्रत्नालंकृतहाटकाढ्यरशनासंबद्धघंटारवा |
तत्रत्येंदुमणींद्रनीलगरुडप्रख्योपलज्योतिषा
व्याप्ता वासवकार्मुकद्युतिखनीवाभाति या सर्वदा ||13||
वस्तिः स्वस्तिगता तवातिरुचिरा कामाक्षि भो देवते
संतोषं विदधातु संततमसौ पीतांबराष्टिता |
तत्रापि स्वकया श्रिया तत इतः प्रद्योतयंती दिशः
कांतेंद्रोपलकांतिपुंजकणिकेवाभाति या सौष्ठवात् ||14||
यन्नाभीसरसी भवाभिधमरुक्षोणीनिविष्टोद्भव-
त्तृष्णार्ताखिलदेहिनामनुकलं सुज्ञानतोयं वरं |
दत्वा देवि सुगंधि सद्गणसदासेव्यं प्रणुद्य श्रमं
संतोषाय च बोभवीतु महिते कामाक्षि भो देवते ||15||
यन्मध्यं तव देवि सूक्ष्ममतुलं लावण्यमूलं नभः-
प्रख्यं दुष्टनिरीक्षणप्रसरणश्रांत्यापनुत्त्या इव |
जातं लोचनदूरगं तदवतात् कामाक्षि सिंहांतर-
स्वैराटोपनिरासकारि विमलज्योतिर्मयं प्रत्यहं ||16||
धृत्यै ते कुचयोर्वलित्रयमिषात् सौवर्णदामत्रयी-
बद्धं मध्यमनुत्तमं सुदृढयोर्गुर्वोर्ययोर्दैवते |
सौवर्णौ कलशाविवाद्य च पयःपूरीकृतौ सत्कृतौ
तौ कामाक्षि मुदं सदा वितनुतां भारं पराकृत्य नः ||17||
पाणी ते शरणागताभिलषितश्रेयःप्रदानोद्यतौ
सौभाग्याधिकशंसिशास्त्रविहरद्रेखांकितौ शौभनौ |
स्वर्लोकद्रुमपंचकं वितरणे तत्ततृषां तस्य त-
त्पात्रालाभविशंकयांगुलिमिषान्मन्ये विभात्यत्र हि ||18||
दत्तां देवि करौ तवातिमृदुलौ कामाक्षि संपत्करौ
सद्रत्नांचितकंकणादिभिरलं सौवर्णकैर्भूषितौ |
नित्यं संपदमत्र मे भवभयप्रध्वंसनैकोत्सुकौ
संरक्तौ च रसालपल्लवतिरस्कारं गतौ सुंदरौ ||19||
भूयास्तां भुजगाधिपाविव मुदे बाहू सदा मांसलौ
कामाक्ष्युज्ज्वलनूत्नरत्नखचितस्वर्णांगदालंकृतौ |
भावत्कौ मम देवि सुंदरतरौ दूरीकृतद्वेषण-
प्रोद्यद्बाहुबलौ जगत्त्रयनुतौ नम्रालिरक्षापरौ ||20||
स्कंधौ देवि तवापरौ सुरतरुस्कंधाविवोज्जृंभिता-
वस्मान्नित्यमतंद्रितौ समवतां कामाक्षि दत्वा धनं |
कंठासक्तसमस्तभूषणरुचिव्याप्तौ स्वयं भास्वरौ
लोकाघौघसमस्तनाशनचणावुत्तंभितावुद्द्युती ||21||
ग्रीवा कंबुसमानसंस्थितिरसौ कांत्येंद्रनीलोपमा
पायान्मामनिशं पुराणविनुते कामाक्षि भो तावकी |
नानारत्नविभूषणैः सुरुचिरा सौवर्णकैर्मौत्तिक-
श्रेष्टोद्गुंभितमालया च विमला लावण्यपाथोनिधिः ||22||
देवि त्वद्वदनांबुजं वितनुताच्छ्रेयः परं शाश्वतं |
कामाक्ष्यद्य ममांब पंकजमिदं यत्कांतिलाभे (च्छया) |
तोये नूनमहर्निशं च विमले मंक्त्वा तपस्यत्यलं
तत्सौंदर्यनिधानमग्र्यसुषमं कांतालकालंकृतं ||23||
नेत्रे ते करुणाकटाक्षविशिखैः कामादिनित्यद्विषो
बाह्यामप्यरिसंहतिं मम पराकृत्यावतां नित्यशः |
हे कामाक्षि विशालतामुपगते ह्याकर्ण मिष्टावहे
सातत्येन फलार्थिनां निजगतेः संफुलकं जायते ||24||
भ्रूयुग्मं तव देवि चापलतिकाहंकारनिर्वापणं
कांतं मुग्धविकासचेष्टितमहाभाग्यादिसंसूचकं |
कामाक्ष्यन्वहमेधतां कृतपरिस्पंदं रिपूद्वासने
दीनानिंगितचेष्टितैरवदिदं सुव्यक्तरूपं परं ||25||
नानासूनवितानसौरभपरिग्राहैकलोलालयः
किं मां प्रत्यभियंति नेति कुपितं तप्त्वा तपो दुष्करं |
नासीभूय तवातिसौरभवहं भूत्वाभितः प्रेक्षण-
व्याजेन प्रियकप्रसूनमलिभिः कामाक्षि भात्याश्रितं ||26||
वक्त्रं पातु तवातिसुंदरमिदं कामाक्षि नः सर्वदा
श्रीमत्कुंदसुकुड्मलाग्रदशनश्रेणीप्रभाशोभितं |
पुष्यद्बिंबफलारुणाधरपुटं सद्वीटिकारंजितं
सौभाग्यातिशयाभिधायिहसितश्रीशोभिताशागणं ||27||
संतोषं श्रुतिशष्कुलीयुगमिदं सद्रत्नशोभास्फुर-
त्ताटंकाढ्ययुगेन भास्वररुचा संभूषितं तावकं |
कामाक्ष्यद्य चरीकरीतु विमलज्योतिर्ममानारतं
स्वाभ्याशस्थितगंडभागफलकं सराजयज्ज्योतिषा ||28||
शीर्षं ते शिरसा नमामि सततं कामाक्ष्यहं सुंदरं
सूक्ष्मं तन्मधुपालिनीलकुटिलश्रीकुंतलालंकृतं |
सीमंतं सुविभज्य तत्र विपुलश्रीमन्मणींद्रानित
स्वर्णालंकरणप्रभासुरुचिरं शीर्षण्यभूषायितं ||29||
कामाक्षीश्वरि कोटिसूर्यनिनसद्वज्रादिरत्नांचित-
श्रीमन्मुग्धकिरीटभृद्वितरताद्धन्यं शिरस्तावकं |
संपत्तिं नितरां ममांब मनुजाप्राप्यामिहानारतं
लोकेऽमुत्र भवाभिधं व तिमिरं लूत्वा सदालिश्रितं ||30||
कामाक्षीस्तुतिमन्वहं भुवि नराः शुद्धाश्च ये भक्तितः
शृण्वंत्यत्र पठंति वा स्थिरधियः पण्यामिमामर्थिनः |
दीर्घायुर्धनधान्यसंपदममी विंदंति वाणीं यशः
सौभाग्यं सुतपौत्रजातमधिकख्यातिं मुदं सर्वदा ||31||
कौंडिन्यान्वयसंभूतरामचंद्रार्यसूरिणा |
निर्मिता भाति कामाक्षीस्तुतिरेषा सतां मता ||32||
इति श्रीकामाक्षीस्तुतिः संपूर्णा |
अर्थ
श्री कामाक्षी स्तुति आदि शक्ति स्वरूपिणी श्री कामाक्षी देवी की स्तुति में एक पवित्र स्तोत्र है। यह स्तोत्र देवी के अनुपम सौंदर्य, करुणा, शक्ति और भक्तों के प्रति वात्सल्य का वर्णन करता है। कामाक्षी देवी भगवान शिव की प्रियतमा हैं, समस्त ब्रह्मांड की संरक्षिका हैं और दुखों का निवारण करने वाली हैं। ऐसा माना जाता है कि यह स्तुति देवी के विभिन्न गुणों का गुणगान करके भक्तों को आंतरिक शांति, ज्ञान और मोक्ष प्रदान करती है।
स्तोत्र के प्रारंभिक श्लोक कामाक्षी देवी के दिव्य सौंदर्य का वर्णन करते हैं। कवि देवी की सुंदर वेणी, चंद्रमा के समान मुख, कोमल करुणा और विश्व की रक्षा के उनके संकल्प को नमन करता है। वह उन्हें शिव की प्रिय और समस्त लोकों की आधारभूत शक्ति के रूप में वर्णित करता है। दूसरे श्लोक में, देवी के चमकीले आभूषणों और देवताओं द्वारा पूजित उनके चरणों की प्रशंसा की जाती है। उनकी उपस्थिति भक्तों को शुद्ध करती है। यहाँ, कवि देवी की अज्ञान नाशक शक्ति की तुलना बिजली और वर्षा के बादलों से करता है, लेकिन कहता है कि वह उनसे कहीं अधिक एक स्थिर और निरंतर ज्योति हैं, जो अज्ञान के अंधकार को पूरी तरह से दूर करती हैं।
तीसरे श्लोक में, देवी की पूर्ण शुद्धता का वर्णन किया गया है। वह दोषों से मुक्त हैं और एक निष्कलंक चाँदनी की तरह चमकती हैं। उनका सुगंध कमल की सुगंध से भी बढ़कर है। राहुग्रस्त चंद्रमा की तरह ग्रहण से अप्रभावित, वह सदैव अंधकार का नाश करने वाली एक स्थिर ज्योति हैं, कवि कहता है। यह वर्णन देवी के निर्मल स्वरूप, शाश्वत प्रकाश और सभी दोषों को दूर करने की उनकी शक्ति को उजागर करता है। आगे, कवि अपनी विनम्रता व्यक्त करता है, अपने सीमित ज्ञान और सेवा क्षमता की कमी को स्वीकार करता है, और केवल भक्ति के माध्यम से देवी से प्रार्थना करता है। वह अपनी प्रार्थना को कृपापूर्वक स्वीकार करने का अनुरोध करता है।
कवि का मानना है कि देवी भक्तों के मन को शुद्ध करती हैं और उनकी वाणी को मधुर बनाती हैं। वह प्रार्थना करता है कि उनकी कृपा से उसके शब्द अमृत के समान हो जाएँ। समस्त जगत की माता कामाक्षी देवी को पूर्ण समर्पण करने से दुखों का निवारण होता है और आश्रय प्राप्त होता है। देवी के चरणों की धूल भक्तों के हृदय को शुद्ध करती है और कृपा प्रदान करती है। उनके हाथों में कमल और मणियों की माला है, और उनकी दृष्टि भक्तों को जीवन प्रदान करती है। स्तोत्र यह भी बताता है कि शुद्ध भक्ति और वाणी की पवित्रता से मुक्ति और महान फल प्राप्त होते हैं।
जप, ध्यान, सेवा, होम जैसे सभी भक्ति कार्य कामाक्षी देवी के स्मरण मात्र से सार्थक हो जाते हैं, स्तोत्र कहता है। भक्त कामाक्षी देवी का स्मरण करके जीवन के सभी प्रयासों में दृढ़ और सफल होता है। कामाक्षी देवी माँ के समान पूजनीय हैं; उनके वात्सल्य से जीवों को जीवन मिलता है और वह भक्तों के लिए आश्रय बन जाती हैं। इस स्तोत्र का पाठ भक्तों को देवी की कृपा प्राप्त करने, मन की शांति, सभी मनोकामनाओं की पूर्ति और अंततः मोक्ष प्राप्त करने में सहायता करता है।
लाभ (Benefits):
- मन की शुद्धि: इस स्तोत्र का पाठ करने से मन के अज्ञान और अशुद्धियाँ दूर होती हैं, जिससे आंतरिक शांति और स्पष्टता प्राप्त होती है।
- वाणी की सिद्धि और मधुरता: देवी की कृपा से वाणी में मधुरता और प्रभाव आता है, जिससे संचार कौशल में सुधार होता है।
- दुःख निवारण और आश्रय: जीवन में आने वाली कठिनाइयों और दुखों का निवारण होता है, और देवी का दिव्य आश्रय प्राप्त होता है।
- सभी मनोकामनाओं की पूर्ति: शुद्ध भक्ति के साथ पाठ करने पर, भक्तों की सभी सद्भावनाएँ और मनोकामनाएँ पूरी होती हैं।
- आध्यात्मिक उन्नति और मोक्ष: स्तोत्र का निरंतर पाठ आध्यात्मिक प्रगति में सहायता करता है और अंततः मोक्ष के मार्ग को सुगम बनाता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
श्री कामाक्षी स्तुतिः क्या है?
इस स्तोत्र का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
श्री कामाक्षी स्तुतिः के पाठ से क्या लाभ होते हैं?
कौन श्री कामाक्षी स्तुतिः का पाठ कर सकता है?
इस स्तोत्र का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
श्री कामाक्षी स्तुतिः का उद्गम क्या है?
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