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श्री कामाक्षी स्तोत्रं (ब्रह्म कृतं)

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स्तोत्र
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श्री कामाक्षी स्तोत्रं (ब्रह्म कृतं)

ब्रह्मोवाच |
जय देवि जगन्मातर्जय त्रिपुरसुंदरि |
जय श्रीनाथसहजे जय श्रीसर्वमंगले || 1 ||

जय श्रीकरुणाराशे जय शृंगारनायिके |
जयजयेधिकसिद्धेशि जय योगींद्रवंदिते || 2 ||

जय जय जगदंब नित्यरूपे
जय जय सन्नुतलोकसौख्यदात्रि |
जय जय हिमशैलकीर्तनीये
जय जय शंकरकामवामनेत्रि || 3 ||

जगज्जन्मस्थितिध्वंसपिधानानुग्रहान्मुहुः |
या करोति स्वसंकल्पात्तस्यै देव्यै नमो नमः || 4 ||

वर्णाश्रमाणां सांकर्यकारिणः पापिनो जनान् |
निहंत्याद्यातितीक्ष्णास्त्रैस्तस्यै देव्यै नमो नमः || 5 ||

नागमैश्च न वेदैश्च न शास्त्रैर्न च योगिभिः |
वेद्या या च स्वसंवेद्या तस्यै देव्यै नमो नमः || 6 ||

रहस्याम्नायवेदांतैस्तत्त्वविद्भिर्मुनीश्वरैः |
परं ब्रह्मेति या ख्याता तस्यै देव्यै नमो नमः || 7 ||

हृदयस्थापि सर्वेषां या न केनापि दृश्यते |
सूक्ष्मविज्ञानरूपायै तस्यै देव्यै नमो नमः || 8 ||

ब्रह्मा विष्णुश्च रुद्रश्च ईश्वरश्च सदाशिवः |
यद्ध्यानैकपरा नित्यं तस्यै देव्यै नमो नमः || 9 ||

यच्चरणभक्ता इंद्राद्या यदाज्ञामेव बिभ्रति |
साम्राज्यसंपदीशायै तस्यै देव्यै नमो नमः || 10 ||

वेदा निःश्वसितं यस्या वीक्षितं भूतपंचकं |
स्मितं चराचरं विश्वं तस्यै देव्यै नमो नमः || 11 ||

सहस्रशीर्षा भोगींद्रो धरित्रीं तु यदाज्ञया |
धत्ते सर्वजनाधारां तस्यै देव्यै नमो नमः || 12 ||

ज्वलत्यग्निस्तपत्यर्को वातो वाति यदाज्ञया |
ज्ञानशक्तिस्वरूपायै तस्यै देव्यै नमो नमः || 13 ||

पंचविंशतितत्त्वानि मायाकंचुकपंचकं |
यन्मयं मुनयः प्राहुस्तस्यै देव्यै नमो नमः || 14 ||

शिवशक्तीश्वराश्चैव शुद्धबोधः सदाशिवः |
यदुन्मेषविभेदाः स्युस्तस्यै देव्यै नमो नमः || 15 ||

गुरुर्मंत्रो देवता च तथा प्राणाश्च पंचधा |
या विराजति चिद्रूपा तस्यै देव्यै नमो नमः || 16 ||

सर्वात्मनामंतरात्मा परमानंदरूपिणी |
श्रीविद्येति स्मृता या तु तस्यै देव्यै नमो नमः || 17 ||

दर्शनानि च सर्वाणि यदंगानि विदुर्बुधाः |
तत्तन्नियमयूपायै तस्यै देव्यै नमो नमः || 18 ||

या भाति सर्वलोकेषु मणिमंत्रौषधात्मना |
तत्त्वोपदेशरूपायै तस्यै देव्यै नमो नमः || 19 ||

देशकालपदार्थात्मा यद्यद्वस्तु यथा तथा |
तत्तद्रूपेण या भाति तस्यै देव्यै नमो नमः || 20 ||

हे प्रतिभटाकारा कल्याणगुणशालिनी |
विश्वोत्तीर्णेति चाख्याता तस्यै देव्यै नमो नमः || 21 ||

इति स्तुत्वा महादेवीं धाता लोकपितामहः |
भूयो भूयो नमस्कृत्य सहसा शरणं गतः || 22 ||

इति श्रीब्रह्मांडमहापुराणे उत्तरभागे ललितोपाख्याने एकोनचत्वारिंशोऽध्याये ब्रह्मकृत श्री कामाक्षी स्तोत्रं |

अर्थ

श्री कामाक्षी स्तोत्रं (ब्रह्म कृतं) एक अत्यंत पवित्र और शक्तिशाली स्तोत्र है, जिसकी रचना स्वयं सृष्टिकर्ता ब्रह्माजी ने जगन्माता कामाक्षी देवी की स्तुति में की थी। कामाक्षी देवी आदिशक्ति का स्वरूप हैं, जो जगत की माता, त्रिपुरसुंदरी और भगवान शिव की प्रिय पत्नी हैं। यह स्तोत्र देवी की अनंत महिमा, करुणा और सार्वभौमिकता का वर्णन करता है, और भक्तों को सभी प्रकार के सौभाग्य प्रदान करता है।

यह स्तोत्र ब्रह्माजी द्वारा जगन्माता कामाक्षी को 'जय देवि जगन्मातर् जय त्रिपुरसुंदरी' कहकर स्तुति करने के साथ प्रारंभ होता है। वे उन्हें श्रीनाथ की सहचरी और सभी मंगल प्रदान करने वाली देवी घोषित करते हैं। कामाक्षी देवी करुणा का सागर हैं, श्रृंगार की नायिका हैं, और सिद्धों तथा योगेश्वर द्वारा वंदित हैं। वे सभी लोकों को सुख प्रदान करने वाली नित्यरूपिणी हैं, हिमालय पर्वत के समान कीर्तिवान हैं, और भगवान शंकर के मन को मोहने वाली सुंदरी हैं। देवी अपने संकल्प मात्र से ही इस जगत की उत्पत्ति, स्थिति और संहार को नियंत्रित करने की शक्ति रखती हैं। वे ही इन सभी कार्यों का मूल कारण हैं।

कामाक्षी देवी वर्णाश्रम धर्म की रक्षक हैं और पापियों को अपने तीक्ष्ण अस्त्रों से नष्ट करती हैं। वे वेदों, आगमों, शास्त्रों या योगियों द्वारा पूरी तरह से समझी नहीं जा सकतीं, फिर भी वे आत्मज्ञान से ही ज्ञात होती हैं। रहस्यमय वेदांत और तत्वज्ञानी मुनीश्वर उन्हें परम ब्रह्म के रूप में प्रतिष्ठित करते हैं। वे सभी के हृदय में सूक्ष्म रूप से निवास करती हैं, लेकिन अज्ञानी उन्हें देख नहीं पाते। ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, ईश्वर और सदाशिव द्वारा भी ध्यान की जाने वाली परम तत्व वे ही हैं। भक्तों के चरणों और भक्तिभाव से अर्पित सेवाओं के कारण वे राज्य, धन और सभी भोग प्रदान करने वाली देवी हैं।

वेदों के सहज स्वरूपिणी देवी भूत पंचक (पंचमहाभूतों) का सूक्ष्मता से निरीक्षण करके सौम्य वेदना (ज्ञान) प्रदान करती हैं। वे अत्यधिक संपत्ति की स्वामिनी हैं, भक्तों को भोजन, भोग और समृद्धि प्रदान कर उनका पालन-पोषण करती हैं। उनका तेजोमय स्वरूप ज्ञान शक्ति के रूप में प्रकाशित होता है। मायाकंचुक में निहित पच्चीस तत्वों (पंचविंशति तत्त्वों) का प्रधान रूप वे ही हैं, ऐसा यह स्तोत्र कहता है। इस स्तोत्र का पाठ करने से भक्तों को मानसिक शांति, आध्यात्मिक उन्नति और ऐहिक समृद्धि प्राप्त होती है।

प्रयोजन (Benefits):

  • सभी मनोकामनाओं की पूर्ति: इस स्तोत्र का नियमित पाठ करने से भक्तों की सभी अच्छी इच्छाएं और मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। कामाक्षी देवी भक्तों की कामनाओं को पूरा करने वाली हैं।
  • बुरी शक्तियों का निवारण: देवी पापियों और बुरी शक्तियों का नाश करने वाली हैं, इसलिए इस स्तोत्र का पाठ नकारात्मक ऊर्जाओं और बाधाओं से सुरक्षा प्रदान करता है।
  • आध्यात्मिक ज्ञान और शांति: कामाक्षी देवी परम ब्रह्म स्वरूपिणी और सूक्ष्म विज्ञान का रूप हैं, अतः इसका पाठ करने से आध्यात्मिक समझ, मानसिक शांति और आत्मज्ञान प्राप्त होता है।
  • धन और समृद्धि: देवी भक्तों को राज्य, धन, भोजन और सभी प्रकार के भोग प्रदान करने वाली हैं, जिससे आर्थिक समृद्धि और भौतिक सुखों की प्राप्ति होती है।
  • सभी मंगल की प्राप्ति: देवी 'सर्वमंगले' हैं, इसलिए इस स्तोत्र का पाठ जीवन में सभी शुभता लाता है और अमंगल को दूर करता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

श्री कामाक्षी स्तोत्रं (ब्रह्म कृतं) क्या है?
यह एक अत्यंत शक्तिशाली और पवित्र स्तोत्र है, जिसकी रचना स्वयं सृष्टिकर्ता ब्रह्माजी ने जगन्माता कामाक्षी देवी की स्तुति के लिए की थी। यह देवी की अनंत महिमा, करुणा और सार्वभौमिकता का वर्णन करता है।
इस स्तोत्र का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
इस स्तोत्र का पाठ प्रतिदिन सुबह या शाम को स्नान करने के बाद, शुद्ध मन और भक्ति के साथ करना चाहिए। देवी की मूर्ति या चित्र के सामने दीपक जलाकर पाठ करना अधिक शुभ माना जाता है।
श्री कामाक्षी स्तोत्रं का पाठ करने के क्या लाभ हैं?
इस स्तोत्र का पाठ करने से सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं, बुरी शक्तियां दूर होती हैं, आध्यात्मिक ज्ञान और मानसिक शांति मिलती है, तथा धन और समृद्धि प्राप्त होती है।
श्री कामाक्षी स्तोत्र का पाठ कौन कर सकता है?
कामाक्षी देवी के भक्त, आध्यात्मिक उन्नति चाहने वाले, भौतिक सुख और समृद्धि की इच्छा रखने वाले, तथा जीवन में सभी प्रकार के मंगल की कामना करने वाले इस स्तोत्र का पाठ कर सकते हैं।
इस स्तोत्र का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
सामान्यतः, इस स्तोत्र का पाठ प्रतिदिन एक या तीन बार करना उत्तम होता है। विशेष अवसरों पर या किसी संकल्प के साथ 11, 21, या 108 बार भी पाठ किया जा सकता है।
श्री कामाक्षी स्तोत्र का उद्गम क्या है?
यह स्तोत्र ब्रह्माजी द्वारा रचित माना जाता है। यह पुराणों और आगमों में कामाक्षी देवी की महिमा का वर्णन करने वाले अंश के रूप में पाया जाता है।

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