श्री कामाक्षी स्तवः
कंडूलगंडविगळन्मदवारिधारा-
गंडूषपंडितमधुव्रतमंडिताय |
शुंडालबंधुरमुखाय तुषारभानु-
खंडावतंसकलिताय नमः शिवाय ||1||
रसाळतलभूषितं रजनिबंधुना भूषितं
समग्रमनुकंपया सविधसेवितं कंपया |
नमत्सुमनसं पदे नमत संततं संपदे
गिरीशमधिकांचि तं गिरिसुताकुचांकांचितं ||2||
जयंति श्रीमंतो जडिमहिमसंहारमिहिरा
मनीषामाकंदप्रसवनववासंतदिवसाः |
गिरां नाथे! नानारसभणितियोषाभिसरण-
प्रदोषा निर्दोषास्तव चरण सन्नामविधयः ||3||
क एष प्रस्तावस्तव नवनसन्नाहपदवी -
दवीयो देवीदं धिषणधिषणानैपुणमपि |
तदास्तामुद्योगः स्तुतिवचसि याचे पुनरिदं
समस्तोऽत्र स्तोत्रीभवतु मम संजल्पनविधिः ||4||
सदा याचं याचं कथितबहुवाचं जनमिमं
प्रति क्रोधो वेधोरमणि! करणीयो न कलया |
न योगप्रावीण्यं न च बहुविधस्तोत्रपटिमा
न वा सेवादाक्ष्यं किमिह विदधे याचनमृते ||5||
जतुद्रावं देवि! द्रवतु जवतश्चित्तजडिमा
शरत्पद्मोन्मीलं मम विललमुन्मीलतु मनः |
मुखाद्वीची वाचां त्रिदिवविगळन्निर्जरधुनी-
तरंगाळीगाळं गळतु मधुनिष्यंदमधुरा ||6||
जगन्नाथे ! जाल्मं निबिडजडिभग्रंथिजटिलं
जनं दीनं मैनं जननि ! मनुथाः स्मान्यशरणं |
प्रमीळाप्रभ्लानं पदयुगळनाळीकविगळ-
न्मधूळीपाळीभिर्मम सरजसं क्षाळय मनः ||7||
जगन्मातर्जातप्रथिमनि मनीषाजडिमनि
स्तृणाने खिंदानः किमिव मनवै किं वितनवै |
प्रसीदासीदात्मन्यखिलदुरितोत्सादिनि ! दिने
दिने दीनेऽदीने! मयि वितर कारुण्यकणिकां ||8||
करे वामे वामे ! कमलमृदुळे पुस्तकधरं
परस्मिन् साक्षस्रक्स्फटिकनिभमत्रासवरदं |
भवत्वंतः साक्षादकृपणकृपाकंदळमिळत्-
कटाक्षव्यापारं वपुरुपनिषज्जीवितमिदं ||9||
कृपाकोपाटोपस्फुरितपदपंचास्यदळिताद्
धनस्वांतध्वांतप्रकरकरिसंदोहशिरसः |
समुन्मुक्ता मुक्तामणय इव शुद्धा भणितयोस
भवद्भक्तास्येभ्यो भगवति! विसर्पंति परितः ||10||
ममांतर्वाणि ! त्वं हर तिमिरमित्यर्थनविधां
विधास्यन् यस्तस्मै पदयुगळमात्रं कथयते |
असौ शास्त्रज्ञत्वं वरयितुमुपक्रांत इति तद्
ददानः सद्यस्ते जयति सदयासंभ्रमरसः ||11||
असौ सेवा दावे रुदितमियमिज्या जललिपि-
र्गजस्नानं ध्यानं तदपि स जपो भस्मनि हुतं |
प्रणामो नामष प्रकृतिजळमूकांघ्रिपतनं
यदंबालंब्येत प्रतिदिनमनुद्दिश्य भवतीं ||12||
सजीवो मा जीवन् भवति बत मा जाग्रदपि मा
विजानन् मा ध्यायन् जनजननि ! तस्यास्त्वजननिः |
न यस्त्वामाशास्ते न विनमति न स्तौति मनुते
न नोपास्ते नाध्येत्यवति न वृणीते न च सकृत् ||13||
गळद्दभ्भां शुभ्भत्पृथुलकुचकुंभां हृतशशि-
प्रभाडभ्भां संभावितलिखितगुभ्फाजपपटां |
मनस्तंभारभ्भप्रथुमनि(?) भजे त्वां कृतकृपा-
परीरभ्भाम्मंभोरुहसदनसंभोगकलिकां ||14||
भवत्या नित्योत्तंसितसितसुधातिविगळत्-
सुधासारस्रोतोविसर इव हृत्पंकजजुषः |
नृणां त्वद्ध्यातॄणां नववदननाळीककुहर-
प्रणाळीनाळेन क्षरति कवितासौरभभरः ||15||
गतिस्विन्नां वन्यस्तबकनिवहन्यासविलसत्-
कचां केचित् काचावलिखचितनीचेतरकुचां |
हृदि त्वामीक्षंते कपटमृगयोः पत्रपटली-
दुकूलां कालारेरनुपदचरीं काननचरीं ||16||
धरे ! दुर्गां स्वर्गा धिपविमतवर्गापहरणीं
महारंहस्सिंहप्रवरपरिविन्यस्तचरणां |
करे वल्गत्खड्गप्रविहितजगत्त्राणविभवां
भवार्तिव्यावृत्त्यै भगवति ! भजंते हि भवतीं ||17||
इदं स्यादेतत् स्यान्मम पुनरदः स्यादिति सदा
श्रुतं वा दृष्टं वा सकलमुपयाचे न भवतीं |
सकृन्मह्यं मुह्यन्मलिनमनसे मातरमलां
त्वदीये दीयेत द्युतिमति पदे भारति! रतिं ||18||
अथो या वा सा वा भव भवरमेशांबुजभुवा-
मपीड्ये ! पीड्येऽहं जनजननि ! जाड्येन न यथा |
तथा भ्रूयाद् भूयानिह तव विभूतिस्तवविधिः
कथंकारं कर्तुं कविभिरपि शक्येत सकलः ||19||
इति कामाक्षीस्तवः संपूर्णः |
अर्थ
श्री कामाक्षी स्तव, आदिशक्ति माँ कामाक्षी को समर्पित एक अत्यंत शक्तिशाली और भक्तिपूर्ण स्तोत्र है। कांचीपुरम में निवास करने वाली देवी कामाक्षी अपने भक्तों को ज्ञान, धन, शांति और मोक्ष प्रदान करने वाली जगन्माता हैं। यह स्तोत्र भक्त के विनम्र भाव, अटूट श्रद्धा और देवी की असीम करुणा को दर्शाता है। इस स्तोत्र का पाठ करने से भक्त देवी के दिव्य सौंदर्य, महिमा और उनके आशीर्वाद को प्राप्त कर सकते हैं।
स्तोत्र की शुरुआत में, देवी के दिव्य सौंदर्य का वर्णन किया गया है। नीलमणि के समान चमकती हुई केशराशि, चंद्रकला से सुशोभित मस्तक और गजराज की करुणा के समान कोमल मुखमंडल कामाक्षी देवी के आकर्षक रूप को चित्रित करता है। यह मधुर रूप सुगंधित दिव्य कांति बिखेरता है, मानो मधुमक्खियों का झुंड उनके चारों ओर उड़ते हुए भक्तिपूर्वक उनकी पूजा कर रहा हो। उनकी करुणा एक सागर के समान गहरी है और उनका रूप चंद्रमा की चांदनी के समान उज्ज्वल है। ब्रह्मा, विष्णु और महेश जैसे देवताओं द्वारा पूजित, भगवान शिव को अत्यंत प्रिय गिरिजा, अपने चरण-धूलि से भक्तों के मन को पवित्र करती हैं।
कामाक्षी देवी के चरणों का स्मरण करने वालों को वाक्पटुता और ज्ञान प्राप्त होता है। उनके चरण वाणी, ज्ञान, कला और काव्य सौंदर्य के स्रोत हैं। कवि अपनी विनम्रता व्यक्त करते हुए कहते हैं, “मेरे शब्दों में शक्ति कम है, मेरा ज्ञान सीमित है, फिर भी आपकी महिमा का स्तुति करने की तीव्र इच्छा मुझमें अशांत है। कृपया मेरे इस प्रयास को स्वीकार करें।” योग शक्ति के बिना, शास्त्र ज्ञान के बिना, पूजा विधियों में निपुणता के बिना, केवल देवी की करुणा की याचना करना ही उनकी प्रार्थना है, ऐसा कहकर भक्त पूर्ण समर्पण का भाव व्यक्त करता है।
भक्त अपने अंतरंग की शुद्धि के लिए प्रार्थना करता है – “मेरे चित्त की मलिनता दूर हो जाए। मेरी वाणी नदी के समान प्रवाहित होकर दिव्य मधुरता प्राप्त करे। मेरा मन आपके चरण-धूलि से पवित्र हो जाए।” जगन्माता कामाक्षी की शरण में आकर, वह अपने दुखों को दूर करने और अपने मन को देवी के चरण-धूलि से शुद्ध करने की प्रार्थना करता है। संसार के पापों से भरा होने पर भी, कवि प्रतिदिन देवी की करुणा का एक कण प्रदान करने की याचना करता है। कामाक्षी देवी अपने बाएं हाथ में कमल और दाहिने हाथ में स्फटिक माला धारण किए हुए, परम करुणा से भरी दृष्टि से, उपनिषदों के प्राण-स्वरूपिणी के रूप में भक्त के समक्ष प्रकट होती हैं। भक्त जो भी शब्द जपता है, वह मोतियों के समान शुद्ध होता है; कामाक्षी की कृपा से वाक्-पवित्रता और ज्ञान का प्रकाश फैलता है।
लाभ (Benefits):
- वाक् सिद्धि और ज्ञान प्राप्ति: स्तोत्र के नियमित पाठ से वाणी स्पष्ट, मधुर और प्रभावशाली बनती है। ज्ञान में वृद्धि होती है और काव्य रचना की क्षमता बढ़ती है।
- मन की शुद्धि: देवी के चरणों का स्मरण करने से मन के अज्ञान, दुर्गुण दूर होते हैं और आंतरिक शांति तथा पवित्रता प्राप्त होती है।
- दुःख निवारण और सुरक्षा: कामाक्षी देवी की करुणा से भक्तों के सभी दुःख, कष्ट दूर होते हैं और अनिष्टों से रक्षा मिलती है।
- धन और समृद्धि: देवी के आशीर्वाद से भक्तों के जीवन में ऐश्वर्य, समृद्धि और सभी शुभ फल प्राप्त होते हैं।
- मोक्ष प्राप्ति: अटूट भक्ति और पूर्ण समर्पण से देवी की कृपा प्राप्त कर, अंततः मोक्ष का मार्ग सुगम होता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
श्री कामाक्षी स्तव क्या है?
श्री कामाक्षी स्तव का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
श्री कामाक्षी स्तव के पाठ के प्रमुख लाभ क्या हैं?
श्री कामाक्षी स्तव का पाठ किसे करना चाहिए?
इस स्तोत्र का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
श्री कामाक्षी स्तव का मूल या पृष्ठभूमि क्या है?
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