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श्री घटिकाचल योगनृसिंह मंगळं

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स्तोत्रनरसिंह स्वामी
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श्री घटिकाचल योगनृसिंह मंगळं

घटिकाचलशृंगाग्र विमानोदरवासिने |
निखिलामरसेव्याय नरसिंहाय मंगळं || 1 ||

उदीचीरंगनिवसत् सुमनस्तोमसूक्तिभिः |
नित्याभिवृद्धयशसे नरसिंहाय मंगळं || 2 ||

सुधावल्लीपरिष्वंगसुरभीकृतवक्षसे |
घटिकाद्रिनिवासाय श्रीनृसिंहाय मंगळं || 3 ||

सर्वारिष्टविनाशाय सर्वेष्टफलदायिने |
घटिकाद्रिनिवासाय श्रीनृसिंहाय मंगळं || 4 ||

महागुरुमनःपद्ममध्यनित्यनिवासिने |
भक्तोचिताय भवतात् मंगळं शाश्वतीः समाः || 5 ||

श्रीमत्यै विष्णुचित्तार्यमनोनंदन हेतवे |
नंदनंदनसुंदर्यै गोदायै नित्यमंगळं || 6 ||

श्रीमन्महाभूतपुरे श्रीमत्केशवयज्वनः |
कांतिमत्यां प्रसूताय यतिराजाय मंगळं || 7 ||

पादुके यतिराजस्य कथयंति यदाख्यया |
तस्य दाशरथेः पादौ शिरसा धारयाम्यहं || 8 ||

श्रीमते रम्यजामातृमुनींद्राय महात्मने |
श्रीरंगवासिने भूयात् नित्यश्रीः नित्यमंगळं || 9 ||

सौम्यजामातृयोगींद्र चरणांबुजषट्पदं |
देवराजगुरुं वंदे दिव्यज्ञानप्रदं शुभं || 10 ||

वाधूलश्रीनिवासार्यतनयं विनयाधिकं |
प्रज्ञानिधिं प्रपद्येऽहं श्रीनिवासमहागुरुं || 11 ||

चंडमारुतवेदांतविजयादिस्वसूक्तिभिः |
वेदांतरक्षकायास्तु महाचार्याय मंगळं || 12 ||

इति श्री घटिकाचल योगनृसिंह मंगळ स्तोत्रं |

अर्थ

श्री घटिकाचल योगनृसिंह मंगलं स्तोत्रम तमिलनाडु के शोलिंगर (प्राचीन घटिकाचल) में स्थित श्री योगनृसिंह स्वामी को समर्पित एक दिव्य मंगलाचरण है। यह केवल भगवान को ही नहीं, बल्कि उनकी कृपा प्राप्त आचार्य परंपरा के महानुभावों को भी मंगला अर्पण करता है। यह स्तोत्र भगवान की महिमा, उनके संरक्षण और गुरु परंपरा के महत्व को भक्तिपूर्वक मनाता है, भक्तों को आध्यात्मिक शांति और समृद्धि प्रदान करता है।

इस स्तोत्र के प्रारंभिक श्लोक श्री योगनृसिंह स्वामी के दिव्य स्वरूप और महिमा का वर्णन करते हैं। घटिकाचल के शिखर पर स्थित विमान में निवास करने वाले, देवताओं द्वारा निरंतर पूजे जाने वाले, सभी अनिष्टों का नाश कर सभी मनोवांछित फल प्रदान करने वाले नृसिंह स्वामी को मंगल की कामना की जाती है। लक्ष्मी देवी (सुधावल्ली) के आलिंगन से सुगंधित वक्षस्थल वाले घटिकाद्रि निवासी श्री नृसिंह, ऋषि-मुनियों और देवताओं द्वारा स्तुत होते हैं, और उनकी यश की निरंतर वृद्धि की प्रार्थना की जाती है। यह भगवान की सर्वोच्चता, उनके सौम्य रूप और भक्तों के प्रति उनकी करुणा को उजागर करता है।

स्तोत्र का अगला भाग श्री वैष्णव संप्रदाय की अद्वितीय गुरु परंपरा को मंगल अर्पित करता है। महान गुरुओं (महान यतियों) के हृदय कमल में सदा निवास करने वाले भगवान को शाश्वत मंगल की प्रार्थना की जाती है। विष्णुचित्तार्य (पेरियाल्वार) के मन को आनंद देने वाली, नंदनंदनसुंदरी कही जाने वाली श्री गोदा देवी (आंडाळ) को नित्य मंगल की कामना की जाती है। इसके बाद, श्रीमन महाभूतपुर में श्रीमत केशवयजवन के वंश में जन्मे, श्री वैष्णव धर्म को पुनर्जीवित करने वाले महान यतिराज, श्री रामानुजाचार्य को मंगल समर्पित किया जाता है। यतिराज की पादुकाओं की महिमा का वर्णन करने वाले महाकवि श्री वेदांत देशिक (दाशरथि) के चरणों को श्रद्धापूर्वक नमन किया जाता है, उनके चरणों को हृदय में धारण किया जाता है।

आगे बढ़ते हुए, श्रीरंगम क्षेत्र में निवास करने वाले, भक्तों को ज्ञान और कृपा प्रदान करने वाले श्रीमत रम्यजामातृ मुनींद्र (मणवाल मामुनिगल) को नित्य मंगल की कामना की जाती है। सौम्यजामातृ योगींद्र के चरण कमलों में भ्रमर के समान सदा सेवा करने वाले, दिव्य ज्ञान प्रदान करने वाले श्री देवराज गुरु को नमस्कार अर्पित किया जाता है। इसी प्रकार, वाधूल श्रीनिवासाचार्य के पुत्र, विनय संपन्न, ज्ञाननिधि श्रीनिवास महागुरु को आश्रय लिया जाता है। चंडमारुत और वेदांत विजय जैसे ग्रंथों की रचना कर, वेदांत धर्म की रक्षा करने वाले महाचार्य को मंगल की प्रार्थना की जाती है। यह स्तोत्र भगवान के साथ-साथ आचार्यों का भी स्मरण करके, ज्ञान परंपरा के महत्व को दर्शाता है और यह प्रतिपादित करता है कि भक्त गुरुओं के मार्गदर्शन से मोक्ष प्राप्त कर सकते हैं।

लाभ (Benefits):

  • समस्त अनिष्टों का निवारण: इस स्तोत्र का पाठ जीवन में आने वाली सभी बाधाओं, कठिनाइयों और नकारात्मक शक्तियों को दूर करने में सहायक होता है, भक्तों को सुरक्षा प्रदान करता है।
  • इष्ट फलों की प्राप्ति: श्री नृसिंह स्वामी भक्तों की सभी सद्भावनापूर्ण इच्छाओं को पूर्ण करने वाले देवता हैं, अतः इस मंगल स्तोत्र का पाठ करने से सभी मनोवांछित फल प्राप्त होते हैं।
  • आध्यात्मिक ज्ञान में वृद्धि: आचार्य परंपरा का स्मरण करने से भक्तों में आध्यात्मिक ज्ञान, विवेक और सत्य की समझ बढ़ती है। गुरुओं की कृपा से मोक्ष मार्ग सुगम होता है।
  • शांति और समृद्धि: इस स्तोत्र का नियमित पाठ मन को शांति, सुकून और जीवन में समृद्धि प्रदान करता है। नकारात्मक ऊर्जाएँ दूर होकर सकारात्मक वातावरण का निर्माण होता है।
  • गुरु कृपा की प्राप्ति: गुरु परंपरा का स्मरण करने से भक्त गुरुओं का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। यह आध्यात्मिक प्रगति के लिए अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि गुरुओं के मार्गदर्शन के बिना ज्ञान प्राप्ति कठिन है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

श्री घटिकाचल योगनृसिंह मंगलं स्तोत्र क्या है?
यह तमिलनाडु के शोलिंगर में स्थित श्री योगनृसिंह स्वामी और श्री वैष्णव आचार्य परंपरा को समर्पित एक पवित्र मंगलाचरण स्तोत्र है। यह भगवान और गुरुओं की महिमा का गुणगान करता है।
इस स्तोत्र का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
इस स्तोत्र का पाठ प्रतिदिन सुबह या शाम स्नान के बाद, शुद्ध मन से, भगवान और गुरुओं का ध्यान करते हुए किया जा सकता है। मंगलवार और शनिवार को इसका पाठ विशेष फलदायी माना जाता है।
श्री घटिकाचल योगनृसिंह मंगलं का पाठ करने के क्या लाभ हैं?
इसका पाठ करने से सभी अनिष्टों का निवारण होता है, मनोवांछित फल प्राप्त होते हैं, आध्यात्मिक ज्ञान में वृद्धि होती है, मन को शांति और समृद्धि मिलती है, तथा गुरु कृपा प्राप्त होती है।
कौन इस स्तोत्र का पाठ कर सकता है?
भगवान नृसिंह और श्री वैष्णव आचार्यों में श्रद्धा रखने वाला कोई भी व्यक्ति, विशेष रूप से जो जीवन में बाधाओं का सामना कर रहे हैं या आध्यात्मिक प्रगति की इच्छा रखते हैं, इसका पाठ कर सकते हैं।
इस स्तोत्र का कितनी बार पाठ करना चाहिए?
उत्तम परिणामों के लिए, प्रतिदिन कम से कम 11 या 21 बार पाठ किया जा सकता है। श्रद्धा और निष्ठा से पाठ करना महत्वपूर्ण है।
इस स्तोत्र का मूल या इतिहास क्या है?
यह स्तोत्र घटिकाचल (शोलिंगर) क्षेत्र के योगनृसिंह स्वामी की महिमा और श्री वैष्णव गुरु परंपरा के महत्व को दर्शाता है, जो प्राचीन भक्ति साहित्य का एक हिस्सा है। इसके रचयिता का स्पष्ट उल्लेख नहीं है, पर यह परंपरा का अभिन्न अंग है।

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