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श्री दंडपाणि पंचरत्नं

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स्तोत्र
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श्री दंडपाणि पंचरत्नं

चंडपापहरपादसेवनं
गंडशोभिवरकुंडलद्वयं |
दंडिताखिलसुरारिमंडलं
दंडपाणिमनिशं विभावये || 1 ||

कालकालतनुजं कृपालयं
बालचंद्रविलसज्जटाधरं |
चेलधूतशिशुवासरेश्वरं
दंडपाणिमनिशं विभावये || 2 ||

तारकेशसदृशाननोज्ज्वलं
तारकारिमखिलार्थदं जवात् |
तारकं निरवधेर्भवांबुधे-
-र्दंडपाणिमनिशं विभावये || 3 ||

तापहारिनिजपादसंस्तुतिं
कोपकाममुखवैरिवारकं |
प्रापकं निजपदस्य सत्वरं
दंडपाणिमनिशं विभावये || 4 ||

कामनीयकविनिर्जितांगजं
रामलक्ष्मणकरांबुजार्चितं |
कोमलांगमतिसुंदराकृतिं
दंडपाणिमनिशं विभावये || 5 ||

इति शृंगेरिजगद्गुरु श्रीसच्चिदानंदशिवाभिनवनृसिंहभारती स्वामिभिः विरचितं श्रीदंडपाणि पंचरत्नं |

अर्थ

श्री दंडपाणि पंचरत्नं — यह श्रृंगेरी जगद्गुरु श्री सच्चिदानंद शिवाभिनव नृसिंह भारती स्वामीजी द्वारा रचित पाँच श्लोकों का एक मंगल स्तोत्र है। इस स्तोत्र में, दंडपाणि स्वरूप भगवान सुब्रह्मण्य की रक्षक के रूप में, पापों का नाश करने वाले, भगवान शिव के अनुज और धर्म के पालक के रूप में स्तुति की जाती है। यह भक्तों को साहस, शांति और शुभ सिद्धि प्रदान करने वाला दिव्य स्तोत्र है।

यह स्तोत्र इस महिमा से प्रारंभ होता है कि भगवान दंडपाणि के चरणों की सेवा से संचित सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। उनके कानों में चमकते कुंडल और हाथ में धारण किया हुआ दंड उनकी दैवीय शक्ति, शौर्य और व्यवस्था के प्रतीक हैं। वे देवलोक के शत्रुओं को पराजित करने वाले देवसेनापति हैं। दूसरे श्लोक में, उन्हें भगवान शिव के पुत्र, कृपा के सागर, जटाजूट में बालचंद्र को धारण करने वाले दिव्य रूप के रूप में वर्णित किया गया है। बच्चों और भक्तों के रक्षक के रूप में, शुद्धता और दिव्यता की चमक बिखेरने वाली उनकी महान महिमा की यहाँ प्रशंसा की गई है।

इसके पश्चात्, भगवान का मुख तारकेश (भगवान शिव) के समान उज्ज्वल और प्रकाशमान है। तारकासुर का संहार करने वाले वीर के रूप में, वे भक्तों की सभी शुभ इच्छाओं को पूर्ण करने वाले दयामूर्ति के रूप में प्रकट होते हैं। उन्हें भवसागर से भक्तों को पार लगाने वाले 'तारक' के रूप में वर्णित किया गया है। चौथा श्लोक यह बताता है कि भगवान भक्तों के दोषों, कष्टों और पीड़ाओं को दूर कर उन्हें तुरंत अपने श्रीचरणों में स्थान देते हैं। क्रोध, काम, अहंकार जैसे आंतरिक शत्रुओं का नाश करने वाले धर्मपालक के रूप में वे प्रकट होते हैं।

अंतिम श्लोक में, उनकी सुंदरता, कोमलता और राम-लक्ष्मण द्वारा पूजित दिव्य रूप स्पष्ट होता है। हाथी के समान प्रताप से भी बढ़कर शक्ति धारण करने वाले, अत्यंत सुंदर आकृति वाले हैं। उनका कोमल फिर भी शक्तिशाली स्वरूप भक्ति, प्रेम और शरणागति को प्रेरित करता है। संक्षेप में, दंडपाणि पंचरत्नं भगवान सुब्रह्मण्य की शक्ति-दया, रक्षा-संरक्षण, पाप-नाश और कामना-सिद्धि जैसे गुणों को संतुलित रूप से दर्शाता है। इस स्तोत्र का पाठ जीवन में धैर्य, शांति और शुभ-सिद्धि प्रदान करता है।

लाभ (Benefits):

  • पाप-नाश और आंतरिक शुद्धि: भगवान के चरणों की सेवा से सभी पाप नष्ट होते हैं और मन शुद्ध होता है।
  • शत्रु और बाधाओं का निवारण: आंतरिक और बाहरी शत्रु तथा जीवन में आने वाली बाधाएँ दूर होती हैं।
  • बच्चों की रक्षा और पारिवारिक शांति: बच्चों को सुरक्षा मिलती है और परिवार में सुख-शांति का वास होता है।
  • आंतरिक दोषों का नाश: क्रोध, काम, लोभ, मोह जैसे दुर्गुण नष्ट होते हैं और मानसिक स्थिरता प्राप्त होती है।
  • कार्यसिद्धि और दैवीय कृपा: सभी कार्यों में सफलता मिलती है और भगवान दंडपाणि की विशेष कृपा प्राप्त होती है।
  • भवसागर से रक्षा: जीवन के संकटों से मुक्ति मिलती है और मोक्ष मार्ग पर चलने के लिए दैवीय मार्गदर्शन प्राप्त होता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

श्री दंडपाणि पंचरत्नं क्या है?
यह श्रृंगेरी जगद्गुरु श्री सच्चिदानंद शिवाभिनव नृसिंह भारती स्वामीजी द्वारा रचित भगवान सुब्रह्मण्य को समर्पित पाँच श्लोकों का एक स्तोत्र है। इसमें दंडपाणि स्वरूप भगवान सुब्रह्मण्य की महिमा का वर्णन किया गया है।
इस स्तोत्र का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
इस स्तोत्र का पाठ नियमित रूप से, विशेषकर मंगलवार या षष्ठी तिथि पर स्नान के बाद शुद्ध मन से किया जा सकता है। दैवीय कृपा प्राप्त करने के लिए प्रतिदिन पाठ करना उत्तम माना जाता है।
श्री दंडपाणि पंचरत्नं के पाठ से क्या लाभ होते हैं?
इस स्तोत्र के पाठ से पापों का नाश होता है, आंतरिक शुद्धि मिलती है, शत्रुओं और बाधाओं का निवारण होता है, बच्चों की रक्षा होती है, पारिवारिक शांति आती है और मानसिक स्थिरता प्राप्त होती है। यह भवसागर से भी रक्षा करता है।
किसे इस स्तोत्र का पाठ करना चाहिए?
भगवान सुब्रह्मण्य के भक्त, जीवन में बाधाओं का सामना कर रहे लोग, बच्चों की सुरक्षा चाहने वाले, आंतरिक दोषों को दूर करने की इच्छा रखने वाले और मानसिक शांति की तलाश करने वाले लोग इसका पाठ कर सकते हैं।
इस स्तोत्र का कितनी बार पाठ करना चाहिए?
सामान्यतः दिन में एक बार या तीन बार पाठ करना शुभ होता है। विशेष लाभ के लिए 11, 21 या 108 बार भी पाठ किया जा सकता है। सबसे महत्वपूर्ण श्रद्धा और भक्ति के साथ पाठ करना है।
इस स्तोत्र के रचयिता कौन हैं?
श्री दंडपाणि पंचरत्नं स्तोत्र की रचना श्रृंगेरी जगद्गुरु श्री सच्चिदानंद शिवाभिनव नृसिंह भारती स्वामीजी ने की है।

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