दक्षिणा मूर्ति स्तोत्रं
शांतिपाठः
ॐ यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वं
यो वै वेदांश्च प्रहिणोति तस्मै |
तंहदेवमात्म बुद्धिप्रकाशं
मुमुक्षुर्वै शरणमहं प्रपद्ये ||
ध्यानं
ॐ मौनव्याख्या प्रकटितपरब्रह्मतत्वंयुवानं
वर्शिष्ठांतेवसदृषिगणैरावृतं ब्रह्मनिष्ठैः |
आचार्येंद्रं करकलित चिन्मुद्रमानंदमूर्तिं
स्वात्मरामं मुदितवदनं दक्षिणामूर्तिमीडे ||
वटविटपिसमीपे भूमिभागे निषण्णं
सकलमुनिजनानां ज्ञानदातारमारात् |
त्रिभुवनगुरुमीशं दक्षिणामूर्तिदेवं
जननमरणदुःखच्छेद दक्षं नमामि ||
चित्रं वटतरोर्मूले वृद्धाः शिष्याः गुरुर्युवा |
गुरोस्तु मौनव्याख्यानं शिष्यास्तुच्छिन्नसंशयाः ||
ॐ नमः प्रणवार्थाय शुद्धज्ञानैकमूर्तये |
निर्मलाय प्रशांताय दक्षिणामूर्तये नमः ||
गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः |
गुरुस्साक्षात् परं ब्रह्मा तस्मै श्री गुरवे नमः ||
निधये सर्वविद्यानां भिषजे भवरोगिणाम् |
गुरवे सर्वलोकानां दक्षिणामूर्तये नमः ||
चिदोघनाय महेशाय वटमूलनिवासिने |
सच्चिदानंद रूपाय दक्षिणामूर्तये नमः ||
ईश्वरो गुरुरात्मेति मूर्तिभेद विभागिने |
व्योमवद्-व्याप्तदेहाय दक्षिणामूर्तये नमः ||
अंगुष्ठतर्जनी योगमुद्रा व्याजेनयोगिनाम् |
शृत्यर्थं ब्रह्मजीवैक्यं दर्शयन्योगता शिवः ||
ॐ शांतिः शांतिः शांतिः ||
स्तोत्रं
विश्वंदर्पण दृश्यमान नगरी तुल्यं निजांतर्गतं
पश्यन्नात्मनि मायया बहिरिवोद्भूतं यथानिद्रया |
यस्साक्षात्कुरुते प्रभोधसमये स्वात्मानमे वाद्वयं
तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्री दक्षिणामूर्तये || 1 ||
बीजस्यांतति वांकुरो जगदितं प्राङ्नर्विकल्पं पुनः
मायाकल्पित देशकालकलना वैचित्र्यचित्रीकृतम् |
मायावीव विजृंभयत्यपि महायोगीव यः स्वेच्छया
तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्री दक्षिणामूर्तये || 2 ||
यस्यैव स्फुरणं सदात्मकमसत्कल्पार्थकं भासते
साक्षात्तत्वमसीति वेदवचसा यो बोधयत्याश्रितान् |
यस्साक्षात्करणाद्भवेन्न पुरनावृत्तिर्भवांभोनिधौ
तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्री दक्षिणामूर्तये || 3 ||
नानाच्छिद्र घटोदर स्थित महादीप प्रभाभास्वरं
ज्ञानं यस्य तु चक्षुरादिकरण द्वारा बहिः स्पंदते |
जानामीति तमेव भांतमनुभात्येतत्समस्तं जगत्
तस्मै श्री गुरुमूर्तये नम इदं श्री दक्षिणामूर्तये || 4 ||
देहं प्राणमपींद्रियाण्यपि चलां बुद्धिं च शून्यं विदुः
स्त्री बालांध जडोपमास्त्वहमिति भ्रांताभृशं वादिनः |
मायाशक्ति विलासकल्पित महाव्यामोह संहारिणे
तस्मै श्री गुरुमूर्तये नम इदं श्री दक्षिणामूर्तये || 5 ||
राहुग्रस्त दिवाकरेंदु सदृशो माया समाच्छादनात्
सन्मात्रः करणोप संहरणतो योऽभूत्सुषुप्तः पुमान् |
प्रागस्वाप्समिति प्रभोदसमये यः प्रत्यभिज्ञायते
तस्मै श्री गुरुमूर्तये नम इदं श्री दक्षिणामूर्तये || 6 ||
बाल्यादिष्वपि जाग्रदादिषु तथा सर्वास्ववस्थास्वपि
व्यावृत्ता स्वनु वर्तमान महमित्यंतः स्फुरंतं सदा |
स्वात्मानं प्रकटीकरोति भजतां यो मुद्रया भद्रया
तस्मै श्री गुरुमूर्तये नम इदं श्री दक्षिणामूर्तये || 7 ||
विश्वं पश्यति कार्यकारणतया स्वस्वामिसंबंधतः
शिष्यचार्यतया तथैव पितृ पुत्राद्यात्मना भेदतः |
स्वप्ने जाग्रति वा य एष पुरुषो माया परिभ्रामितः
तस्मै श्री गुरुमूर्तये नम इदं श्री दक्षिणामूर्तये || 8 ||
भूरंभांस्यनलोऽनिलोंबर महर्नाथो हिमांशुः पुमान्
इत्याभाति चराचरात्मकमिदं यस्यैव मूर्त्यष्टकम् |
नान्यत्किंचन विद्यते विमृशतां यस्मात्परस्माद्विभो
तस्मै गुरुमूर्तये नम इदं श्री दक्षिणामूर्तये || 9 ||
सर्वात्मत्वमिति स्फुटीकृतमिदं यस्मादमुष्मिन् स्तवे
तेनास्व श्रवणात्तदर्थ मननाद्ध्यानाच्च संकीर्तनात् |
सर्वात्मत्वमहाविभूति सहितं स्यादीश्वरत्वं स्वतः
सिद्ध्येत्तत्पुनरष्टधा परिणतं चैश्वर्य मव्याहतम् || 10 ||
|| इति श्रीमच्छंकराचार्यविरचितं दक्षिणामुर्तिस्तोत्रं संपूर्णम् ||
अर्थ
श्री दक्षिणामूर्ति स्तोत्रम भगवान शिव के दक्षिणामूर्ति स्वरूप को समर्पित एक अत्यंत ही गहन और आध्यात्मिक स्तोत्र है। आदि शंकराचार्य द्वारा रचित यह स्तोत्र अद्वैत वेदांत के सार को अत्यंत सुंदर और संक्षिप्त रूप में प्रस्तुत करता है। दक्षिणामूर्ति को परम गुरु के रूप में पूजा जाता है, जो मौन के माध्यम से ही परब्रह्म तत्व का उपदेश देते हैं। यह स्तोत्र बाहरी अनुष्ठानों की बजाय आंतरिक अनुभव और आत्मज्ञान के महत्व पर बल देता है। इस स्तोत्र का पाठ अज्ञान को दूर कर आध्यात्मिक ज्ञानोदय की ओर मार्गदर्शन करता है।
स्तोत्र की शुरुआत में शांतिपाठ आता है, जिसमें उस परमेश्वर की शरण ली जाती है जिसने ब्रह्मा को उत्पन्न किया और उन्हें वेद प्रदान किए, तथा जो हमारी आत्म-बुद्धि को प्रकाशित करता है। इसके बाद के ध्यान श्लोक दक्षिणामूर्ति के दिव्य स्वरूप का वर्णन करते हैं। ये श्लोक एक युवा गुरु दक्षिणामूर्ति का चित्रण करते हैं, जो वटवृक्ष के नीचे बैठे हैं और अपने से कहीं अधिक वृद्ध तथा ब्रह्मनिष्ठ ऋषियों को मौन के माध्यम से परब्रह्म तत्व का उपदेश दे रहे हैं। वे अपने हाथ में चिनमुद्रा धारण किए हुए, आनंद की मूर्ति और प्रसन्नवदन दिखाई देते हैं। उनके मौन व्याख्यान से ही शिष्यों के सभी संदेह दूर हो जाते हैं, यह इस स्तोत्र का एक अद्भुत पहलू है, जो दर्शाता है कि मौन ही ज्ञान के संचार का सबसे शक्तिशाली माध्यम है।
यह स्तोत्र दक्षिणामूर्ति को सभी मुनियों को ज्ञान प्रदान करने वाला, तीनों लोकों का गुरु, और जन्म-मृत्यु के दुख के चक्र को समाप्त करने में कुशल के रूप में स्तुति करता है। 'ॐ नमः प्रणवार्थाय' श्लोक कहता है कि दक्षिणामूर्ति प्रणव (ॐ) के अर्थ स्वरूप, शुद्ध ज्ञान की एकमात्र मूर्ति, निर्मल और शांत हैं। 'गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः' श्लोक गुरु के परम महत्व को प्रतिपादित करता है, यह घोषणा करता है कि गुरु ही ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर और साक्षात् परब्रह्म हैं, और ऐसे गुरु को नमस्कार करता है। अंत में, गुरु को सभी विद्याओं का खजाना और संसार रूपी रोग का वैद्य बताया गया है, और ऐसे लोकगुरु की शरण लेने का आह्वान किया गया है।
कुल मिलाकर, श्री दक्षिणामूर्ति स्तोत्रम केवल एक देव स्तोत्र नहीं है, बल्कि यह आत्मज्ञान के लिए एक मार्गदर्शिका है। यह अहंकार का त्याग कर, आंतरिक मौन में परम सत्य को जानने का मार्ग दिखाता है। इस स्तोत्र का नियमित पाठ मन को शुद्ध करता है, आध्यात्मिक प्रगति के लिए मंच तैयार करता है, और भक्त को परम शांति की ओर ले जाता है। यह ज्ञान प्राप्ति और मोक्ष के लिए एक उत्कृष्ट साधन है।
लाभ (Benefits):
- ज्ञान में वृद्धि: इस स्तोत्र के पाठ से आध्यात्मिक ज्ञान, आत्मज्ञान और ब्रह्मज्ञान की समझ बढ़ती है। यह जीवन के सत्य को जानने में मदद करता है।
- संदेहों का निवारण: जैसे दक्षिणामूर्ति मौन से ही शिष्यों के संदेह दूर करते हैं, वैसे ही इस स्तोत्र का नियमित पाठ जीवन और आध्यात्मिक मार्ग की बाधाओं तथा संदेहो को दूर करता है।
- गुरु कृपा की प्राप्ति: परम गुरु स्वरूप दक्षिणामूर्ति की कृपा प्राप्त करने का यह एक उत्कृष्ट माध्यम है। यह सद्गुरु के मार्गदर्शन और आशीर्वाद को प्राप्त करने में सहायक होता है।
- मन की शांति और एकाग्रता: स्तोत्र का गहरा अर्थ और भक्तिपूर्ण पाठ मन को अपार शांति, स्थिरता और एकाग्रता प्रदान करता है। यह आंतरिक भ्रमों को दूर करता है।
- बंधनों से मुक्ति: चूंकि दक्षिणामूर्ति जन्म-मृत्यु के दुख को समाप्त करने में कुशल हैं, यह स्तोत्र सांसारिक बंधनों से मुक्ति पाने और मोक्ष के मार्ग पर आगे बढ़ने में सहायक होता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
श्री दक्षिणामूर्ति स्तोत्र क्या है?
इस स्तोत्र का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
श्री दक्षिणामूर्ति स्तोत्र के पाठ के प्रमुख लाभ क्या हैं?
इस स्तोत्र का पाठ किसे करना चाहिए?
इस स्तोत्र का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
श्री दक्षिणामूर्ति स्तोत्र का उद्गम क्या है?
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