श्री अहोबल नृसिंह स्तोत्रं
लक्ष्मीकटाक्षसरसीरुहराजहंसं
पक्षींद्रशैलभवनं भवनाशमीशं |
गोक्षीरसार घनसारपटीरवर्णं
वंदे कृपानिधिमहोबलनारसिंहं || 1 ||
आद्यंतशून्यमजमव्ययमप्रमेयं
आदित्यचंद्रशिखिलोचनमादिदेवं |
अब्जामुखाब्जमदलोलुपमत्तभृंगं
वंदे कृपानिधिमहोबलनारसिंहं || 2 ||
कोटीरकोटिघटितोज्ज्वलकांतिकांतं
केयूरहारमणिकुंडलमंडितांगं |
चूडाग्ररंजितसुधाकरपूर्णबिंबं
वंदे कृपानिधिमहोबलनारसिंहं || 3 ||
वराहवामननृसिंहसुभाग्यमीशं
क्रीडाविलोलहृदयं विबुधेंद्रवंद्यं |
हंसात्मकं परमहंसमनोविहारं
वंदे कृपानिधिमहोबलनारसिंहं || 4 ||
मंदाकिनीजननहेतुपदारविंदं
बृंदारकालयविनोदनमुज्ज्वलांगं |
मंदारपुष्पतुलसीरचितांघ्रिपद्मं
वंदे कृपानिधिमहोबलनारसिंहं || 5 ||
तारुण्यकृष्णतुलसीदळधामरम्यं
धात्रीरमाभिरमणं महनीयरूपं |
मंत्राधिराजमथदानवमानभृंगं
वंदे कृपानिधिमहोबलनारसिंहं || 6 ||
इति श्री अहोबल नृसिंह स्तोत्रं ||
अर्थ
श्री अहोबल नृसिंह स्तोत्र भगवान नृसिंह को समर्पित एक अत्यंत शक्तिशाली और भक्तिपूर्ण स्तोत्र है। अहोबिल आंध्र प्रदेश में एक प्रसिद्ध तीर्थस्थल है, जहाँ भगवान नृसिंह नौ विभिन्न रूपों में निवास करते हैं। यह स्तोत्र अहोबल नृसिंह के दिव्य सौंदर्य, पराक्रम, करुणा और भक्तों के प्रति वात्सल्य का वर्णन करता है। प्रत्येक श्लोक भक्त के पूर्ण समर्पण के भाव को दर्शाता है, जिसमें 'वंदे कृपानिधिमहोबल नारसिंघम' वाक्य उनकी कृपा के महत्व पर जोर देता है।
नृसिंह अवतार भगवान विष्णु का उग्र रूप है, जो धर्म की रक्षा और भक्तों को दुष्ट शक्तियों से बचाने के लिए प्रकट हुए थे। इस स्तोत्र का पाठ करने से भक्त अपने भय, दुःख, ऋण और ग्रह दोषों से मुक्ति पाते हैं। नृसिंह को यहाँ विशेष रूप से 'कृपानिधि' (करुणा का सागर) कहा गया है, जिसका अर्थ है कि वे अपने भक्तों पर असीम करुणा बरसाते हैं। यह स्तोत्र भगवान के विभिन्न गुणों का स्मरण कराकर भक्तों को आंतरिक शांति, शक्ति और दैवीय कृपा प्रदान करता है, जीवन की सभी बाधाओं को दूर करने में सहायता करता है।
प्रत्येक श्लोक नृसिंह स्वामी के भव्य रूप और गुणों का विस्तृत वर्णन करता है। पहला श्लोक भगवान नृसिंह को लक्ष्मी देवी के कटाक्ष रूपी सरोवर में विचरण करने वाले राजहंस के रूप में, गरुड़ पर्वत पर निवास करने वाले, जन्म-मरण के चक्र का नाश करने वाले, दूध के समान श्वेत कांति से तेजस्वी उस कृपानिधि के रूप में वर्णित करता है। दूसरा श्लोक उन्हें आदि और अंत से रहित, अजन्मा, अविनाशी और अप्रमेय बताता है, जिनके नेत्र सूर्य, चंद्रमा और अग्नि के समान तेजस्वी हैं। पद्मिनी लक्ष्मी के मुखकमल पर मकरंद पीने वाले भृंग के समान आनंदित रहने वाले उनके प्रेममय स्वरूप को भी यह श्लोक दर्शाता है।
तीसरा श्लोक नृसिंह के दिव्य सौंदर्य को उजागर करता है – करोड़ों मुकुटों से जड़ी हुई उज्ज्वल कांति से शोभायमान, केयूर (बाजूबंद), हार और मणि-कुंडल से अलंकृत अंगों वाले, चंद्रमा के पूर्ण बिंब के समान सुंदर मुकुट से सुशोभित दिव्य रूप वाले। चौथा श्लोक उन्हें वराह, वामन और नृसिंह जैसे दिव्य अवतारों को धारण करने वाले, देवताओं द्वारा पूजित, भक्तों के हृदय में आनंद से क्रीड़ा करने वाले, परमहंस स्वरूप परमेश्वर के रूप में प्रस्तुत करता है। पाँचवाँ श्लोक उनके चरणकमलों को मंदाकिनी (गंगा) नदी के उद्गम का कारण बताता है, और उन्हें तुलसी तथा मंदार पुष्पों से अलंकृत पवित्र रूप वाला बताता है। अंत में, छठा श्लोक उन्हें ताजे तुलसी के पत्तों के समान श्याम कांति वाले, लक्ष्मी देवी को आकर्षित करने वाले महोन्नत रूप वाले, समस्त मंत्रों के अधिपति, और दुष्ट दानवों के अहंकार को नष्ट करने वाले के रूप में महिमामंडित करता है।
प्रयोजन (Benefits):
- भय और दुःख से मुक्ति: इस स्तोत्र का नियमित पाठ करने से भक्त अपने भय, चिंता और जीवन के दुःखों से छुटकारा पाते हैं। भगवान नृसिंह अपने भक्तों को अभय प्रदान करते हैं।
- ऋण और ग्रह दोषों का निवारण: आर्थिक समस्याओं और ग्रह दोषों से पीड़ित लोग इस स्तोत्र का पाठ करने से उत्तम समाधान पाते हैं, क्योंकि नृसिंह बाधाओं को दूर करने वाले शक्तिशाली देवता हैं।
- आंतरिक शांति और शक्ति: नृसिंह के दिव्य रूप का ध्यान करने और स्तोत्र का पाठ करने से मन को शांति मिलती है और आंतरिक शक्ति बढ़ती है। यह आत्मविश्वास में भी वृद्धि करता है।
- दैवीय कृपा और सुरक्षा: इस स्तोत्र का निरंतर पाठ भगवान नृसिंह की पूर्ण कृपा और सुरक्षा प्रदान करता है, सभी बुरी शक्तियों और नकारात्मक प्रभावों से बचाता है।
- मनोकामना पूर्ति: भक्तिभाव से इस स्तोत्र का पाठ करने वालों की मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं और जीवन में समृद्धि, सफलता प्राप्त होती है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
श्री अहोबल नृसिंह स्तोत्रं क्या है?
इस स्तोत्र का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
श्री अहोबल नृसिंह स्तोत्रं का पाठ करने के क्या लाभ हैं?
इस स्तोत्र का पाठ कौन कर सकता है?
इस स्तोत्र का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
श्री अहोबल नृसिंह स्तोत्र का मूल क्या है?
टिप्पणियाँ
टिप्पणी लिखने के लिए लॉगिन करें
टिप्पणियाँ लोड हो रही हैं...
