स्कंदोत्पत्ति (रामायण बालकांडे)
तप्यमाने तपो देवे देवाः सर्षिगणाः पुरा |
सेनापतिमभीप्संतः पितामहमुपागमन् || 1 ||
ततोऽब्रुवन् सुराः सर्वे भगवंतं पितामहं |
प्रणिपत्य शुभं वाक्यं सेंद्राः साग्निपुरोगमाः || 2 ||
यो नः सेनापतिर्देव दत्तो भगवता पुरा |
तपः परममास्थाय तप्यते स्म सहोमया || 3 ||
यदत्रानंतरं कार्यं लोकानां हितकाम्यया |
संविधत्स्व विधानज्ञ त्वं हि नः परमा गतिः || 4 ||
देवतानां वचः श्रुत्वा सर्वलोकपितामहः |
सांत्वयन्मधुरैर्वाक्यैस्त्रिदशानिदमब्रवीत् || 5 ||
शैलपुत्र्या यदुक्तं तन्न प्रजाः संतु पत्निषु | [स्यथ]
तस्या वचनमक्लिष्टं सत्यमेव न संशयः || 6 ||
इयमाकाशगा गंगा यस्यां पुत्रं हुताशनः |
जनयिष्यति देवानां सेनापतिमरिंदमं || 7 ||
ज्येष्ठा शैलेंद्रदुहिता मानयिष्यति तत्सुतं |
उमायास्तद्बहुमतं भविष्यति न संशयः || 8 ||
तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य कृतार्था रघुनंदन |
प्रणिपत्य सुराः सर्वे पितामहमपूजयन् || 9 ||
ते गत्वा पर्वतं राम कैलासं धातुमंडितं |
अग्निं नियोजयामासुः पुत्रार्थं सर्वदेवताः || 10 ||
देवकार्यमिदं देव संविधत्स्व हुताशन |
शैलपुत्र्यां महातेजो गंगायां तेज उत्सृज || 11 ||
देवतानां प्रतिज्ञाय गंगामभ्येत्य पावकः |
गर्भं धारय वै देवि देवतानामिदं प्रियं || 12 ||
अग्नेस्तु वचनं श्रुत्वा दिव्यं रूपमधारयत् |
दृष्ट्वा तन्महिमानां स समंतादवकीर्यत || 13 ||
समंततस्तदा देवीमभ्यषिंचत पावकः |
सर्वस्रोतांसि पूर्णानि गंगाया रघुनंदन || 14 ||
तमुवाच ततो गंगा सर्वदेवपुरोगमं |
अशक्ता धारणे देव तव तेजः समुद्धतं || 15 ||
दह्यमानाग्निना तेन संप्रव्यथितचेतना |
अथाब्रवीदिदं गंगां सर्वदेवहुताशनः || 16 ||
इह हैमवते पादे गर्भोऽयं सन्निवेश्यतां |
श्रुत्वा त्वग्निवचो गंगा तं गर्भमतिभास्वरं || 17 ||
उत्ससर्ज महातेजाः स्रोतोभ्यो हि तदानघ |
यदस्या निर्गतं तस्मात्तप्तजांबूनदप्रभं || 18 ||
कांचनं धरणीं प्राप्तं हिरण्यममलं शुभं |
ताम्रं कार्ष्णायसं चैव तैक्ष्ण्यदेवाभ्यजायत || 19 ||
मलं तस्याभवत्तत्र त्रपु सीसकमेव च |
तदेतद्धरणीं प्राप्य नानाधातुरवर्धत || 20 ||
निक्षिप्तमात्रे गर्भे तु तेजोभिरभिरंजितं |
सर्वं पर्वतसन्नद्धं सौवर्णमभवद्वनं || 21 ||
जातरूपमिति ख्यातं तदाप्रभृति राघव |
सुवर्णं पुरुषव्याघ्र हुताशनसमप्रभं || 22 ||
तृणवृक्षलतागुल्मं सर्वं भवति कांचनं |
तं कुमारं ततो जातं सेंद्राः सहमरुद्गणाः || 23 ||
क्षीरसंभावनार्थाय कृत्तिकाः समयोजयन् |
ताः क्षीरं जातमात्रस्य कृत्वा समयमुत्तमं || 24 ||
ददुः पुत्रोऽयमस्माकं सर्वासामिति निश्चिताः |
ततस्तु देवताः सर्वाः कार्तिकेय इति ब्रुवन् || 25 ||
पुत्रस्त्रैलोक्यविख्यातो भविष्यति न संशयः |
तेषां तद्वचनं श्रुत्वा स्कन्नं गर्भपरिस्रवे || 26 ||
स्नापयन् परया लक्ष्म्या दीप्यमानं यथानलं |
स्कंद इत्यब्रुवन् देवाः स्कन्नं गर्भपरिस्रवात् || 27 ||
कार्तिकेयं महाभागं काकुत्स्थ ज्वलनोपमं |
प्रादुर्भूतं ततः क्षीरं कृत्तिकानामनुत्तमं || 28 ||
षण्णां षडाननो भूत्वा जग्राह स्तनजं पयः |
गृहीत्वा क्षीरमेकाह्ना सुकुमारवपुस्तदा || 29 ||
अजयत्स्वेन वीर्येण दैत्यसैन्यगणान्विभुः |
सुरसेनागणपतिं ततस्तममलद्युतिं || 30 ||
अभ्यषिंचन् सुरगणाः समेत्याग्निपुरोगमाः |
एष ते राम गंगाया विस्तरोऽभिहितो मया || 31 ||
कुमारसंभवश्चैव धन्यः पुण्यस्तथैव च |
भक्तश्च यः कार्तिकेये काकुत्स्थ भुवि मानवः |
आयुष्मान् पुत्रपौत्रैश्च स्कंदसालोक्यतां व्रजेत् || 32 ||
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकांडे कुमारोत्पत्तिर्नाम सप्तत्रिंशः सर्गः || 37 ||
अर्थ
"स्कंदोत्पत्ति" स्तोत्र वाल्मीकि रामायण के बालकाण्ड में वर्णित भगवान कार्तिकेय के दिव्य जन्म की पवित्र गाथा है। यह असुर तारकासुर के संहार हेतु देवताओं द्वारा सेनापति की प्रार्थना, अग्नि और गंगा के दिव्य तेज से स्कंद के प्राकट्य और उनके द्वारा किए गए लोकरक्षण के महान कार्य को विस्तार से बताता है। यह कथा न केवल स्कंद के जन्म का विवरण देती है, बल्कि दैवीय सहयोग, त्याग और लोक कल्याण की भावना को भी उजागर करती है। यह हमें सिखाती है कि कैसे ब्रह्मांडीय शक्तियाँ एक साथ मिलकर धर्म की स्थापना के लिए कार्य करती हैं।
प्राचीन काल में, तारकासुर नामक एक शक्तिशाली असुर ने देवताओं और तीनों लोकों को अत्यंत पीड़ित कर रखा था। उससे मुक्ति पाने के लिए, सभी देवता ऋषि-मुनियों सहित ब्रह्माजी के पास गए और उनसे एक ऐसे सेनापति की याचना की जो तारकासुर का वध कर सके। तब ब्रह्माजी ने उन्हें बताया कि शैलपुत्री उमादेवी (पार्वती) के कहे अनुसार, देवताओं को अपनी पत्नियों से संतान प्राप्त नहीं होगी, बल्कि अग्निरूप में शिव का तेज गंगा में स्थापित होगा, और उसी से एक महान सेनापति का जन्म होगा। यह दैवीय योजना का प्रारंभिक चरण था, जो दर्शाता है कि कैसे ब्रह्मांडीय संतुलन बनाए रखने के लिए सर्वोच्च शक्तियों का हस्तक्षेप होता है।
ब्रह्माजी के निर्देशानुसार, अग्निदेव ने अपना असीम तेज गंगा देवी में स्थापित किया। परंतु अग्नि का वह तेज इतना प्रचंड और असह्य था कि गंगा देवी उसे धारण नहीं कर पायीं। उस दिव्याग्नि के भार को सहन करने में असमर्थ होकर, गंगा ने उस तेज को हिमालय पर्वत की तलहटी में छोड़ दिया। वह दिव्य तेज जैसे ही पृथ्वी पर गिरा, उससे स्वर्ण, रजत, ताम्र, सीसा, लौह आदि अनेक प्रकार की धातुएँ उत्पन्न हुईं। इस प्रकार अग्नि के पवित्र तेज से ये सभी खनिज पृथ्वी पर अक्षय संपदा के रूप में प्रकट हुए। इसी तेज से स्वर्णिम कांति से युक्त एक तेजस्वी बालक का प्राकट्य हुआ, जिसे स्कंद के नाम से जाना गया। यह घटना प्रकृति और दैवीय ऊर्जा के अद्भुत समन्वय को दर्शाती है।
हिमालय की तलहटी में प्रकट हुए उस बालक का पालन-पोषण कृत्तिकाओं (छह नक्षत्र देवियाँ) ने छह माताओं की तरह किया। उन्होंने अपने अमृतमय दूध से बालक को सींचा और पाला। छह माताओं के पोषण के कारण, बालक के छह मुख हो गए और वह 'षडानन' या 'षण्मुख' के नाम से प्रसिद्ध हुआ। तत्पश्चात, अग्निदेव को आगे करके समस्त देवताओं ने उस बालक का अभिषेक किया और उसे 'कार्तिकेय', 'स्कंद', और 'षडानन' जैसे दिव्य नाम प्रदान किए। इस प्रकार, स्कंद को दैवीय आशीर्वाद और पोषण प्राप्त हुआ, जिससे वे अपनी भविष्य की भूमिका के लिए तैयार हुए।
इस प्रकार दैवीय शक्ति से अवतरित स्कंद देवताओं के सेनापति बने। उन्होंने अपने अद्वितीय पराक्रम और तेज से तारकासुर का संहार किया और तीनों लोकों में शांति स्थापित की। यह कथा दैवीय सृष्टि, अग्नि और गंगा की भूमिका, शक्ति और पराक्रम के अवतार, और देवताओं के सामूहिक आशीर्वाद के महत्व को दर्शाती है। स्कंदोत्पत्ति की कथा केवल एक पौराणिक आख्यान नहीं, बल्कि आसुरी शक्तियों के विनाश और धर्म की स्थापना के दैवीय संकल्प का प्रतीक है। इस कथा का पाठ करने से भक्तों को साहस, शक्ति और विजय प्राप्त होती है, और उन्हें भगवान कार्तिकेय की कृपा का अनुभव होता है।
लाभ (Benefits):
- दीर्घायुष्य की प्राप्ति: इस पवित्र कथा का श्रद्धापूर्वक पाठ करने से भक्त भगवान स्कंद के आशीर्वाद से दीर्घायु प्राप्त करते हैं।
- पुत्र-पौत्र की समृद्धि: संतान प्राप्ति की इच्छा रखने वाले भक्तों को इस कथा के पाठ से पुत्र और पौत्रों की प्राप्ति होती है, जिससे वंश की वृद्धि होती है।
- शत्रु विजय और कष्ट निवारण: भगवान स्कंद के शौर्य और पराक्रम का स्मरण करने से भक्तों को अपने जीवन में आने वाले शत्रुओं और बाधाओं पर विजय प्राप्त करने की शक्ति मिलती है।
- स्वास्थ्य और धन लाभ: जिस प्रकार दिव्य तेज से धातुएँ उत्पन्न हुईं, उसी प्रकार इस कथा का पाठ उत्तम स्वास्थ्य, समृद्धि और जीवन में धन-संपदा को आकर्षित करता है।
- स्कंदलोक की प्राप्ति: जो भक्त श्रद्धा और भक्ति के साथ इस कथा का पाठ करते हैं, उन्हें मरणोपरांत स्कंदलोक में स्थान प्राप्त होता है, जो मोक्ष और परम आनंद का प्रतीक है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
स्कंदोत्पत्ति स्तोत्र क्या है?
स्कंदोत्पत्ति स्तोत्र का पाठ कब करना चाहिए?
स्कंदोत्पत्ति स्तोत्र का पाठ करने से क्या लाभ मिलते हैं?
इस स्तोत्र का पाठ कौन कर सकता है?
स्कंदोत्पत्ति स्तोत्र का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
स्कंदोत्पत्ति कथा का मूल स्रोत क्या है?
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