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षण्मुख ध्यान श्लोकाः

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स्तोत्र
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षण्मुख ध्यान श्लोकाः

षडाननं त्रिषण्णेत्रं विद्रुमाभं द्विपादकं |
खड्गाभयगदाशक्तिखेटं दक्षिणबाहुभिः || 1 ||

वरपद्मधनुःशूलवज्रान् वामेन धारिणं |
वज्रप्रवाळवैडूर्यप्रत्युप्तमकुटान्वितं || 2 ||

पीतांबरविभूषाढ्यं दिव्यगंधानुलेपनं |
रत्नाद्याभरणैर्युक्तं प्रसन्नवदनान्वितं || 3 ||

मयूरेशसमासीनं सर्वाभरणभूषितं |
गुहं षोडशवेतानं षण्मुखं च विभावयेत् || 4 ||

– पूर्वमुख ध्यानं –
वचद्भुवं शशांकाभं एकवक्त्रं त्रिलोचनं |
चतुर्भुजसमायुक्तं वराभयसमन्वितं ||
सव्ये चान्ये दंडयुतं ऊरूहस्तं च वामके |
रुद्राक्षमालाभरणं भस्मपुंड्रांकितं क्रमात् ||
पुरश्चूडासमायुक्तं मौंजीकौपीनधारिणं |
अक्षमालासमायुक्तं पादुकाद्वयभूषितं ||
काषायवस्त्रसंयुक्तं वचद्भुवं विभावयेत् ||

– दक्षिणमुख ध्यानं –
जगद्भूतं भृंगवर्णं एकवक्त्रं वराभयं |
शक्तिशूलसमायुक्तं करंडमकुटान्वितं |
मयुरेशसमासीनं भावये च विशेषतः ||

– नैरृतिमुख ध्यानं –
विश्वभुवं च रक्ताभं एकवक्त्रं त्रिलोचनं |
वराभयकरोपेतं खड्गखेटकसंयुतं |
मयूरवाहनारूढं भावयेत्सततं मुदा ||

– पश्चिममुख ध्यानं –
शुक्लवर्णं ब्रह्मभुवं एकवक्त्रं त्रिलोचनं |
वराभयसमायुक्तं घंटानादसमन्वितं |
मयूरेशसमासीनं भावये च विशेषतः ||

– उत्तरमुख ध्यानं –
हेमवर्णं चाग्निभुवं त्रिनेत्रं चैकवक्त्रकं |
वराभयसमायुक्तं गदाध्वजसमन्वितं |
मयूरवाहनारूढं भावयेद्वह्निसंभवं ||

– ईशानमुख ध्यानं –
बृहद्भुवं च स्फटिकवर्णाभं चैकवक्त्रकं |
वराभयसमायुक्तं त्रिनेत्रं यज्ञसूत्रकं |
मयूरेशसमासीनं बृहद्भुवं विभावयेत् ||

ॐ नमो भगवते सुब्रह्मण्याय |

अर्थ

षण्मुख ध्यान श्लोक भगवान षण्मुख (कार्तिकेय) के दिव्य स्वरूप का विस्तृत वर्णन करते हैं। ये श्लोक भक्त को उनके छह मुखों, दिव्य शस्त्रों, आभूषणों और मयूर वाहन पर विराजमान उनके तेजस्वी रूप का स्पष्ट ध्यान करने में सहायता करते हैं। इन श्लोकों का मूल उद्देश्य भक्त के मन में भगवान षण्मुख की प्रत्येक दिशा में स्थित मुख की विशिष्ट शक्ति और गुणों को स्थापित करना है, जिससे वह उनकी कृपा और संरक्षण प्राप्त कर सके। यह केवल एक रूप का वर्णन नहीं, बल्कि भगवान की शक्ति, ज्ञान, सुरक्षा और करुणा को आह्वान करने का एक गहन आध्यात्मिक माध्यम है।

मुख्य ध्यान श्लोक भगवान षण्मुख को छह मुखों और अठारह नेत्रों (प्रत्येक मुख पर तीन नेत्र), विद्रुम (मूंगे) के समान रक्तवर्ण आभा, पीतांबर वस्त्र और दिव्य गंधलेप से सुशोभित दर्शाते हैं। उनके दाहिने हाथों में तलवार, अभय मुद्रा, गदा, शक्ति और ढाल जैसे शक्तिशाली शस्त्र हैं। उनके बाएँ हाथों में वरद मुद्रा, कमल, धनुष, शूल और वज्र धारण किए हुए हैं। वे वज्र, प्रवाल और वैदूर्य रत्नों से जड़े मुकुट से अलंकृत हैं, विभिन्न रत्नाभूषणों से चमकते हुए, प्रसन्न मुखमंडल के साथ मयूर पर विराजमान हैं। यह ध्यान रूप भक्त को साहस, ज्ञान और सुरक्षा प्रदान करता है, जिससे वह आंतरिक और बाहरी बाधाओं को दूर कर सके।

इसके पश्चात्, प्रत्येक दिशा के लिए षण्मुख के एक विशेष रूप का ध्यान किया जाता है, जो उनकी बहुआयामी शक्तियों को दर्शाता है: पूर्वमुख चंद्रमा की भाँति शांत और योगमय रूप में तपस्या और योग का प्रतीक है। दक्षिणमुख गहरे रंग का, दुष्ट प्रवृत्तियों का नाश करने वाला रक्षक रूप है, जो भय को दूर करता है। नैऋत्य मुख लाल रंग का, अंधकार और भय को दूर कर शक्ति प्रदान करने वाला दक्ष रूप है। पश्चिममुख शुद्ध श्वेत वर्ण का, ज्ञान, पवित्रता और शांति प्रदान करने वाला है। उत्तरमुख अग्नि के समान तेजस्वी, बल, कार्यसिद्धि और वेग प्रदान करने वाला है। ईशानमुख स्फटिक के समान निर्मल, शुद्ध चेतना और ब्रह्मज्ञान का प्रतीक है।

इन षण्मुख ध्यान श्लोकों का पाठ और ध्यान मन को शुद्ध करता है, आध्यात्मिक जागृति बढ़ाता है और भक्त को समग्र सुरक्षा प्रदान करता है। भगवान षण्मुख के छह मुख षट्चक्रों, षड्दर्शनों और मानव अस्तित्व के छह आयामों का प्रतिनिधित्व करते हैं। यह ध्यान भक्त को भौतिक और आध्यात्मिक बाधाओं से मुक्त करके ज्ञान, विवेक और आंतरिक शांति प्रदान करता है, जिससे जीवन में संतुलन और सद्भाव आता है।

लाभ (Benefits):

  • गहरा ध्यान और मानसिक शांति: इन श्लोकों का ध्यान मन को शांत करता है, एकाग्रता बढ़ाता है और ध्यान को गहरा करने में मदद करता है।
  • भय और नकारात्मक ऊर्जाओं का निवारण: षण्मुख के रक्षक रूपों का ध्यान आंतरिक भयों, बुरी शक्तियों के प्रभाव और नकारात्मक विचारों को दूर करता है।
  • ग्रह दोष निवारण और सुरक्षा: षण्मुख के छह मुखों का ध्यान ग्रह दोषों को कम करता है और अज्ञात खतरों एवं बुरी नज़र से सुरक्षा प्रदान करता है।
  • ज्ञान और आत्मविश्वास में वृद्धि: ईशान मुख जैसे ज्ञान के प्रतीकों का ध्यान विद्या, विवेक, ज्ञान और आत्मविश्वास को बढ़ाता है।
  • आध्यात्मिक बल और कार्यसिद्धि: उत्तर मुख का ध्यान शारीरिक और मानसिक साहस प्रदान करता है, किसी भी कार्य में सफलता प्राप्त करने के लिए आवश्यक शक्ति और गति देता है।
  • समग्र आध्यात्मिक प्रगति: इन श्लोकों का नियमित पाठ भक्त को आध्यात्मिक रूप से उन्नत करता है और परमात्मा के साथ गहरा संबंध स्थापित करने में मदद करता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

षण्मुख ध्यान श्लोक क्या हैं?
ये भगवान षण्मुख के छह मुखों, अस्त्रों, आभूषणों और मयूर पर विराजमान दिव्य रूप का मन में स्पष्ट ध्यान करने में मदद करने वाले स्तोत्र हैं। प्रत्येक मुख एक विशेष शक्ति का प्रतिनिधित्व करता है।
इन श्लोकों का पाठ कब करना चाहिए?
इन श्लोकों का पाठ सुबह स्नान के बाद, ध्यान करते समय या दिन के किसी भी शुभ समय पर किया जा सकता है। मंगलवार और षष्ठी तिथि पर इनका पाठ विशेष रूप से फलदायी होता है।
षण्मुख ध्यान श्लोकों का पाठ करने के क्या लाभ हैं?
इनका पाठ करने से मानसिक शांति, भय निवारण, ग्रह दोषों से सुरक्षा, ज्ञान में वृद्धि, आत्मविश्वास में बढ़ोतरी और आध्यात्मिक प्रगति प्राप्त होती है।
किसे षण्मुख ध्यान श्लोकों का पाठ करना चाहिए?
ज्ञान, साहस, सुरक्षा और आध्यात्मिक उन्नति की इच्छा रखने वाला कोई भी भक्त इन श्लोकों का पाठ कर सकता है। विशेषकर विद्यार्थी और चुनौतियों का सामना कर रहे लोगों के लिए यह अत्यंत लाभकारी है।
इन श्लोकों का कितनी बार पाठ करना चाहिए?
न्यूनतम 11, 21, 54 या 108 बार प्रतिदिन पाठ करना उत्तम माना जाता है। नियमितता और भक्ति के साथ पाठ करना महत्वपूर्ण है।
इन श्लोकों का मूल स्रोत क्या है?
ये ध्यान श्लोक हिंदू धर्म के विभिन्न पुराणों और आगम ग्रंथों से संकलित किए गए हैं, विशेष रूप से स्कंद पुराण में षण्मुख की महिमा का वर्णन मिलता है।

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