षडानन स्तुतिः
श्रीगौरीसहितेशफालनयनादुद्भूतमग्न्याशुग-
-व्यूढं विष्णुपदीपयः शरवणे संभूतमन्यादृशं |
षोढाविग्रहसुंदरास्यममलं श्रीकृत्तिकाप्रीतये
शर्वाण्यंकविभूषणं स्फुरतु मच्चित्ते गुहाख्यं महः || 1 ||
त्रिषडकृशदृगब्जः षण्मुखांभोरुहश्रीः
द्विषडतुलभुजाढ्यः कोटिकंदर्पशोभः |
शिखिवरमधिरूढः शिक्षयन् सर्वलोकान्
कलयतु मम भव्यं कार्तिकेयो महात्मा || 2 ||
यद्रूपं निर्गुणं ते तदिह गुणमहायोगिभिर्ध्यानगम्यं
यच्चान्यद्विश्वरूपं तदनवधितया योगिभिश्चाप्यचिंत्यं |
षड्वक्त्राष्टादशाक्षाद्युपहितकरुणामूर्तिरेषैव भाति
स्वाराध्याशेषदुःखप्रशमनबहुलीलास्पदा चाप्यतुल्या || 3 ||
यच्छ्रीमत्पादपंकेरुहयुगळमहापादुके स्वस्वमूर्ध्ना
धर्तुं विष्णुप्रमुख्या अपि च सुमनसः प्रागकुर्वंस्तपांसि |
तत्तादृक्स्थूलभूतं पदकमलयुगं योगिहृद्ध्यानगम्यं
श्रीसुब्रह्मण्य साक्षात् स्फुरतु मम हृदि त्वत्कटाक्षेण नित्यं || 4 ||
यस्य श्रीशमुखामराश्च जगति क्रीडां च बाल्योद्भवां
चित्रारोपितमानुषा इव समालोक्याभवंस्तंभिताः |
लोकोपद्रवकृत्स नारदपशुर्यस्याभवद्वाहनं
सोऽस्मान् पातु निरंतरं करुणया श्रीबालषाण्मातुरः || 5 ||
येन साक्षाच्चतुर्वक्त्रः प्रणवार्थविनिर्णये |
कारागृहं प्रापितोऽभूत् सुब्रह्मण्यः स पातु मां || 6 ||
कारुण्यद्रुतपंचकृत्यनिरतस्यानंदमूर्तेर्मुखैः
श्रीशंभोः सह पंचभिश्च गिरिजावक्त्रं मिलित्वामलं |
यस्य श्रीशिवशक्त्यभिन्नवपुषो वक्त्राब्जषट्काकृतिं
धत्ते सोऽसुरवंशभूधरपविः सेनापतिः पातु नः || 7 ||
यः शक्त्या तारकोरःस्थलमतिकठिनं क्रौंचगोत्रं च भित्त्वा
हत्वा तत्सैन्यशेषं निखिलमपि च तान् वीरबाहुप्रमुख्यान् |
उद्धृत्वा युद्धरंगे सपदि च कुसुमैर्वर्षितो नाकिबृंदैः
पायादायासतोऽस्मान् स झटिति करुणाराशिरीशानसूनुः || 8 ||
यद्दूतो वीरबाहुः सपदि जलनिधिं व्योममार्गेण तीर्त्वा
जित्वा लंकां समेत्य द्रुतमथ नगरीं वीरमाहेंद्रनाम्नीं |
देवानाश्वास्य शूरप्रहितमपि बलं तत्सभां गोपुरादीन्
भित्त्वा यत्पादपद्मं पुनरपि च समेत्यानमत्तं भजेऽहं || 9 ||
यो वैकुंठादिदेवैः स्तुतपदकमलो वीरभूतादिसैन्यैः
संवीतो यो नभस्तो झटिति जलनिधिं द्योपथेनैव तीर्त्वा |
शूरद्वीपोत्तरस्यां दिशि मणिविलसद्धेमकूटाख्यपुर्यां
त्वष्टुर्निर्माणजायां कृतवसतिरभूत् पातु नः षण्मुखः सः || 10 ||
नानाभूतौघविध्वंसितनिजपृतनो निर्जितश्च द्विरावृ-
-त्त्यालब्धस्वावमाने निजपितरि ततः संगरे भानुकोपः |
मायी यत्पादभृत्यप्रवरतरमहावीरबाहुप्रणष्ट-
-प्राणोऽभूत् सोऽस्तु नित्यं विमलतरमहाश्रेयसे तारकारिः || 11 ||
येन कृच्छ्रेण निहतः सिंहवक्त्रो महाबलः |
द्विसहस्रभुजो भीमः ससैन्यस्तं गुहं भजे || 12 ||
भूरिभीषणमहायुधारव-
-क्षोभिताब्धिगणयुद्धमंडलः |
सिंहवक्त्रशिवपुत्रयो रणः
सिंहवक्त्रशिवपुत्रयोरिव || 13 ||
शूरापत्यगणेषु यस्य गणपैर्नष्टेषु सिंहाननो
दैत्यः क्रूरबलोऽसुरेंद्रसहजः सेनासहस्रैर्युतः |
युद्धे च्छिन्नभुजोत्तमांगनिकरो यद्बाहुवज्राहतो
मृत्युं प्राप स मृत्युजन्यभयतो मां पातु वल्लीश्वरः || 14 ||
अष्टोत्तरसहस्रांडप्राप्तशूरबलं महत् |
क्षणेन यः संहृतवान् स गुहः पातु मां सदा || 15 ||
अंडभित्तिपरिकंपिभीषण-
-क्रूरसैन्यपरिवारपूर्णयोः |
शूरपद्मगुहयोर्महारणः
शूरपद्मगुहयोरिवोल्बणः || 16 ||
नानारूपधरश्च निस्तुलबलो नानाविधैरायुधै-
-र्युद्धं दिक्षु विदिक्षु दर्शितमहाकायोऽंडषंडेष्वपि |
यः शक्त्याशु विभिन्नतामुपगतः शूरोऽभवद्वाहनं
केतुश्चापि नमामि यस्य शिरसा तस्यांघ्रिपंकेरुहे || 17 ||
केकिकुक्कुटरूपाभ्यां यस्य वाहनकेतुतां |
अद्यापि वहते शूरस्तं ध्यायाम्यन्वहं हृदि || 18 ||
देवैः संपूजितो यो बहुविधसुमनोवर्षिभिर्भूरिहर्षै-
-र्वृत्रारिं स्वर्गलोके विपुलतरमहावैभवैरभ्यषिंचत् |
तद्दत्तां तस्य कन्यां स्वयमपि कृपया देवयानामुदूह्य
श्रीमत्कैलासमाप द्रुतमथ लवलीं चोद्वहंस्तं भजेऽहं || 19 ||
तत्रानंतगुणाभिराममतुलं चाग्रे नमंतं सुतं
यं दृष्ट्वा निखिलप्रपंचपितरावाघ्राय मूर्ध्न्यादरात् |
स्वात्मानंदसुखातिशायि परमानंदं समाजग्मतुः
मच्चित्तभ्रमरो वसत्वनुदिनं तत्पादपद्मांतरे || 20 ||
दुष्पुत्रैर्जननी सती पतिमती कोपोद्धतैः स्वैरिणी-
-रंडासीत्यतिनिंदितापि न तथा भूयाद्यथा तत्त्वतः |
दुष्पाषंडिजनैर्दुराग्रहपरैः स्कांदं पुराणं महत्
मिथ्येत्युक्तमपि क्वचिच्च न तथा भूयात्तथा सत्यतः || 21 ||
किं तु तद्दूषणात्तेषामेव कुत्सितजन्मनां |
ऐहिकामुष्मिकमहापुरुषार्थक्षयो भवेत् || 22 ||
यत्संहिताषट्कमध्ये द्वितीया सूतसंहिता |
भाति वेदशिरोभूषा स्कांदं तत्केन वर्ण्यते || 23 ||
यस्य शंभौ परा भक्तिर्यस्मिन्नीशकृपामला |
अपांसुला यस्य माता तस्य स्कांदे भवेद्रतिः || 24 ||
षडाननस्तुतिमिमां यो जपेदनुवासरं |
धर्ममर्थं च कामं च मोक्षं चापि स विंदति || 25 ||
इति श्रीषडानन स्तुतिः |
अर्थ
षडानन स्तुति भगवान कार्तिकेय के सबसे वीर, दिव्य और सर्वोच्च रूप की प्रशंसा करने वाला एक भव्य स्तोत्र है। यह पौराणिक कथाओं, भक्ति, उनके ब्रह्मांडीय स्वरूप के वर्णन, वीरतापूर्ण कार्यों और गहरे आध्यात्मिक प्रतीकों का सुंदर मिश्रण है। यह स्तुति भक्तों के मन में साहस, स्पष्टता, सुरक्षा और आध्यात्मिक उत्थान की भावना भरती है।
यह स्तोत्र श्री गौरीसहितेश (भगवान शिव) के ललाट नेत्र से उत्पन्न अग्नि-शक्ति से षण्मुख के जन्म का वर्णन करता है। यह शक्ति विष्णुपादी (गंगा) के शरवन (सरकंडों के वन) में पोषित हुई। कवि प्रार्थना करता है कि छह मुखों वाले सुंदर रूप वाले, कृतिका देवियों द्वारा प्रेम से पोषित, और शर्वाणी (पार्वती) की गोद को सुशोभित करने वाले गुहा नामक महान तेज उनके चित्त में सदैव प्रकाशित रहें। उनका स्वरूप निर्गुण और सगुण दोनों से परे है, जो केवल योगियों द्वारा गहन ध्यान के माध्यम से ही समझा जा सकता है। छह मुखों, बारह भुजाओं और करोड़ों कामदेवों की शोभा को मात देने वाले सौंदर्य से युक्त कार्तिकेय मोर पर आरूढ़ होकर सभी लोकों को धर्म का उपदेश देते हैं। ऐसी प्रार्थना की जाती है कि ऐसे महात्मा हमारे भविष्य को उज्ज्वल करें।
यह स्तुति कार्तिकेय के दिव्य कार्यों का महिमामंडन करती है - तारकासुर, सिंहवक्त्र और शूरपद्म जैसे शक्तिशाली राक्षसों का संहार; उनकी अद्वितीय वीरता; उनकी अपार करुणा; और ब्रह्मा, विष्णु तथा अन्य देवताओं द्वारा उनके चरण-कमलों पर अर्पित दिव्य पूजा। उनके दूत वीरबाहु द्वारा आकाश मार्ग से समुद्रों को पार करने और लंका जैसे शक्तिशाली नगरों को कंपा देने वाले शौर्य का भी यह स्तोत्र स्मरण कराता है, जो कार्तिकेय द्वारा प्रदत्त असीम शक्ति को दर्शाता है। मोर और मुर्गा उनके वाहन हैं, जो गति, अहंकार पर विजय और उच्च चेतना के जागरण का प्रतीक हैं। वल्ली और देवसेना के साथ उनका विवाह दिव्य प्रेम, कृपा और धर्म का प्रतिनिधित्व करता है।
जिन श्रीमान चरण-कमलों को अपने मस्तक पर धारण करने के लिए विष्णु आदि देवताओं ने तपस्या की थी, वे स्थूल रूप वाले चरण-कमल योगियों के हृदय में ध्यान द्वारा ग्राह्य होते हैं। कवि कामना करता है कि ऐसे श्री सुब्रह्मण्य अपने कटाक्ष से उनके हृदय में नित्य प्रकाशित रहें। यह स्तोत्र कर्म के बोझ को हटाता है, आत्मा को उन्नत करता है और परम सुरक्षा प्रदान करता है। अंतिम श्लोक यह पुष्टि करते हैं कि जो लोग प्रतिदिन इस स्तोत्र का पाठ करते हैं, वे धर्म, धन, इच्छाओं की पूर्ति और मोक्ष प्राप्त करते हैं। यह चेतावनी भी दी जाती है कि स्कंद पुराण की महिमा का अपमान करने वाले पतन के भागी होते हैं।
लाभ (Benefits):
- शत्रु बाधाओं और नकारात्मक ऊर्जा का निवारण: इस स्तोत्र के निरंतर पाठ से जीवन में आने वाली शत्रु बाधाएं, दुर्भाग्य और ग्रह दोष दूर होते हैं, जिससे मार्ग सुगम बनता है।
- साहस, बल और निर्णय शक्ति में वृद्धि: भगवान सुब्रह्मण्य के शौर्य और पराक्रम की स्तुति करने से भक्तों में साहस, मानसिक शक्ति और सही निर्णय लेने की क्षमता बढ़ती है।
- परिवार और बच्चों की उन्नति: परिवार में शांति, समृद्धि, बच्चों के स्वास्थ्य, उत्तम शिक्षा और सर्वांगीण विकास के लिए यह स्तोत्र विशेष रूप से फलदायी है।
- दैनिक सुरक्षा और शांति: प्रतिदिन इस स्तोत्र का पाठ करने से दैवीय सुरक्षा मिलती है, मन को शांति प्राप्त होती है और किए गए कार्यों में सफलता प्राप्त होती है।
- आध्यात्मिक उत्थान और पापों से मुक्ति: भक्ति में स्थिरता, आत्मविश्वास बढ़ता है, दैवीय कृपा और योग बल प्राप्त होता है। यह पापों से मुक्ति में सहायक होकर मोक्ष के मार्ग को सुगम बनाता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
षडानन स्तुति क्या है?
इस स्तुति का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
षडानन स्तुति का पाठ करने के क्या लाभ हैं?
इस स्तुति का पाठ किसे करना चाहिए?
इस स्तुति को कितनी बार पाठ करना चाहिए?
इस स्तुति का उद्गम क्या है?
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