शरवणभव मंत्राक्षर षट्कं
शक्तिस्वरूपाय शरोद्भवाय
शक्रार्चितायाथ शचीस्तुताय |
शमाय शंभुप्रणवार्थदाय
शकाररूपाय नमो गुहाय || 1 ||
रणन्मणिप्रोज्ज्वलमेखलाय
रमासनाथप्रणवार्थदाय |
रतीशपूज्याय रविप्रभाय
रकाररूपाय नमो गुहाय || 2 ||
वराय वर्णाश्रमरक्षकाय
वरत्रिशूलाभयमंडिताय |
वलारिकन्यासुकृतालयाय
वकाररूपाय नमो गुहाय || 3 ||
नगेंद्रकन्येश्वरतत्त्वदाय
नगाधिरूढाय नगार्चिताय |
नगासुरघ्नाय नगालयाय
नकाररूपाय नमो गुहाय || 4 ||
भवाय भर्गाय भवात्मजाय
भस्मायमानाद्भुतविग्रहाय |
भक्तेष्टकामप्रदकल्पकाय
भकाररूपाय नमो गुहाय || 5 ||
वल्लीवलारातिसुतार्चिताय
वरांगरागांचितविग्रहाय |
वल्लीकरांभोरुहमर्दिताय
वकाररूपाय नमो गुहाय || 6 ||
इति श्रीशरवणभवमंत्राक्षरषट्कं |
अर्थ
शरवणभव मंत्राक्षर षट्कम् भगवान सुब्रह्मण्य स्वामी के छह दिव्य अक्षरों 'श-र-व-ण-भ-व' पर आधारित छह श्लोकों का एक स्तोत्र है। इस स्तोत्र का प्रत्येक अक्षर सुब्रह्मण्य स्वामी के परम तत्व का प्रतिनिधित्व करता है, जो उनकी शक्ति, ज्ञान, सुरक्षा और आशीर्वाद का संक्षिप्त लेकिन प्रभावशाली ढंग से स्तुति करता है। यह स्तोत्र भक्तों को मानसिक शांति और आध्यात्मिक उन्नति प्रदान करता है। यह केवल एक स्तोत्र नहीं, बल्कि भगवान मुरुगन के षडाक्षरी मंत्र के सार को समाहित करने वाली एक शक्तिशाली प्रार्थना है।
इस षट्कम् का प्रत्येक अक्षर भगवान सुब्रह्मण्य के एक विशेष दिव्य स्वरूप को प्रकट करता है। 'श' अक्षर शक्ति और शुभता को, 'र' अक्षर तेज और ज्ञान को, 'व' अक्षर वरदान और संरक्षण को, 'ण' अक्षर नागदेवताओं की पूजा और दुष्ट शक्तियों के विनाश को, 'भ' अक्षर संसार के बंधनों से मुक्ति और भक्तों की इच्छाओं की पूर्ति को, और अंतिम 'व' अक्षर वल्ली देवी के प्रेम और मोक्ष प्रदान करने वाले स्वरूप को दर्शाता है। यह मंत्राक्षर षट्कम् हमारे मन, शरीर और आत्मा को शुद्ध करके, दिव्य शक्ति के साथ संबंध स्थापित करने में मदद करता है।
पहला श्लोक 'श' अक्षर से प्रारंभ होता है और भगवान को शक्ति स्वरूप, शरवन में जन्मे हुए, इंद्र और शची द्वारा पूजित, शांति प्रदान करने वाले और भगवान शिव के प्रणव (ॐ) के अर्थ को देने वाले के रूप में वर्णित करता है। दूसरा श्लोक 'र' अक्षर के साथ, भगवान को चमकती हुई रत्नजड़ित करधनी से सुशोभित, लक्ष्मीपति विष्णु और ब्रह्मा को प्रणव का अर्थ देने वाले, कामदेव द्वारा भी पूजित और सूर्य के समान तेजस्वी के रूप में चित्रित करता है। तीसरा श्लोक 'व' अक्षर से, भगवान को वरदान देने वाले, वर्णाश्रम धर्म के रक्षक, शुभ त्रिशूल और अभय मुद्रा से अलंकृत, और इंद्र की पुत्री देवसेना के पुण्य का आश्रय (या देवसेना के पति) के रूप में प्रशंसा करता है।
चौथा श्लोक 'ण' अक्षर के माध्यम से, भगवान को पर्वतराज की पुत्री पार्वती के पति शिव के तत्व को देने वाले, पर्वत पर आरूढ़ (मयूर पर), पर्वतों द्वारा पूजित, क्रौंच पर्वत जैसे असुरों का नाश करने वाले और पर्वतों में निवास करने वाले के रूप में स्तुति करता है। पांचवा श्लोक 'भ' अक्षर से, भगवान को संसार के बंधनों से मुक्ति देने वाले (भव), पापों का नाश करने वाले (भर्ग), शिव के पुत्र, कामदेव को भस्म करने वाले अद्भुत विग्रह वाले, और भक्तों की सभी इच्छाओं को पूरा करने वाले कल्पवृक्ष के समान वर्णित करता है। अंतिम श्लोक फिर से 'व' अक्षर के साथ, भगवान को वल्ली और इंद्र की पुत्री देवसेना द्वारा पूजित, सुगंधित द्रव्यों से सुशोभित दिव्य रूप वाले, और वल्ली देवी के कमल जैसे हाथों से स्पर्श किए गए के रूप में स्तुति करता है।
इस प्रकार, शरवणभव मंत्राक्षर षट्कम् भगवान सुब्रह्मण्य स्वामी के षडाक्षरी मंत्र के प्रत्येक अक्षर के माध्यम से उनकी सर्वव्यापी शक्ति, ज्ञान, करुणा और सुरक्षात्मक गुणों को प्रकट करता है। इस स्तोत्र का पाठ भक्तों को आध्यात्मिक जागृति, आंतरिक शांति और दिव्य अनुग्रह प्रदान करता है। यह केवल शब्दों का संग्रह नहीं, बल्कि भगवान सुब्रह्मण्य के दिव्य सानिध्य का अनुभव करने का एक मार्ग है।
लाभ (Benefits):
- मानसिक शांति और साहस: इस स्तोत्र का नियमित पाठ मन को शांति, स्थिरता और किसी भी चुनौती का सामना करने का साहस प्रदान करता है। यह चिंता और तनाव को कम करने में सहायक है।
- शत्रुओं और बाधाओं का निवारण: भगवान सुब्रह्मण्य के शौर्य गुण के कारण, यह जीवन में आने वाली बाधाओं, नकारात्मक ऊर्जाओं और शत्रुओं के प्रभावों को दूर करने में सहायता करता है, और विजय दिलाता है।
- कार्यसिद्धि और सफलता: शुभ कार्यों और नए प्रयासों में सफलता प्राप्त करने तथा इच्छाओं की पूर्ति के लिए भगवान का आशीर्वाद प्राप्त करने में यह सहायक है, जिससे इच्छित कार्य पूर्ण होते हैं।
- स्वास्थ्य और सुरक्षा: यह शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य में सुधार करता है, बुरी शक्तियों और दुर्घटनाओं से सुरक्षा प्रदान करता है। यह परिवार की सुरक्षा के लिए भी लाभकारी है।
- आध्यात्मिक उन्नति: भक्ति को बढ़ाता है, आत्मबल को मजबूत करता है और आध्यात्मिक मार्ग पर प्रगति के लिए प्रेरणा देता है, जिससे भक्त दिव्य सानिध्य का अनुभव कर पाते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
शरवणभव मंत्राक्षर षट्कम् क्या है?
इस स्तोत्र का पाठ कब करना चाहिए?
इस स्तोत्र के पाठ से क्या प्रमुख लाभ मिलते हैं?
इस स्तोत्र का पाठ कौन कर सकता है?
इस स्तोत्र का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
इस स्तोत्र की उत्पत्ति क्या है?
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