शरवणभव देवसेनेश षट्कं
करतलराजच्छक्ते स्वरदपराभूतकुंदसुमगर्व |
सुरवरनिषेवितांघ्रे शरवणभव पाहि देवसेनेश || 1 ||
तटिदाभदेहकांते कटिविलसत्पीतवर्णकौशेय |
पाटितशूरासुर भो शरवणभव पाहि देवसेनेश || 2 ||
नीलग्रीवतनूद्भव बालदिनेशानकोटिनिभदेह |
कालप्रतिभटमोदद शरवणभव पाहि देवसेनेश || 3 ||
पदजितपंकज पंकजभवपंकजनेत्रमुख्यसुरवंद्य |
पदवीं प्रापय महतीं शरवणभव पाहि देवसेनेश || 4 ||
तारकदैत्यनिवारक तारापतिगर्वहारिषड्वक्त्र |
तारक भवांबुराशेः शरवणभव पाहि देवसेनेश || 5 ||
पर्वतसुतामनोऽंबुजसद्यःसंजातवासरेशतते |
सर्वश्रुतिगीतविभो शरवणभव पाहि देवसेनेश || 6 ||
इति शृंगेरिजगद्गुरु श्रीसच्चिदानंदशिवाभिनवनृसिंहभारती स्वामिभिः विरचितं श्री शरवणभव देवसेनेश षट्कं |
अर्थ
शरवणभव देवसेनेश षट्कं श्रृंगेरी जगद्गुरु श्री सच्चिदानंद शिवाभिनव नृसिंह भारती स्वामी द्वारा रचित छह श्लोकों का एक मधुर और शक्तिशाली स्तोत्र है। इस पवित्र स्तोत्र में भगवान सुब्रह्मण्य की स्तुति "शरवणभव" और "देवसेनेश" रूपों में की जाती है। यह स्तोत्र भगवान की दिव्य सुंदरता, उनकी रक्षात्मक शक्ति, दैवीय विजय और भक्तों के प्रति उनकी असीम करुणा का भव्य वर्णन करता है। यह भगवान कार्तिकेय की महिमा का गुणगान करने वाली एक प्रभावशाली प्रार्थना है।
यह षट्कं केवल एक भजन नहीं, बल्कि भगवान सुब्रह्मण्य की दिव्य शक्ति और ज्ञान का प्रतीक है। तारकासुर जैसे दुष्टों का संहार करके, भगवान अज्ञान और अहंकार का नाश करते हुए धर्म की स्थापना करने वाली परम शक्ति का प्रतिनिधित्व करते हैं। इस स्तोत्र का पाठ भक्तों को आंतरिक साहस, मन की शुद्धि और आध्यात्मिक प्रगति प्रदान करता है। प्रत्येक श्लोक भगवान के अद्भुत गुणों की प्रशंसा करता है और भक्तों को दिव्य मार्ग की ओर अग्रसर करता है, जिससे जीवन के सभी अवरोध दूर होते हैं।
स्तोत्र के आरंभ में, भगवान के हाथ में सुशोभित शक्तिशाली शक्ति आयुध (वेल) की स्तुति की जाती है। उन्हें देवताओं द्वारा पूजित, लोकरक्षक और अपनी दिव्य कृपा से भक्तों की रक्षा करने वाला बताया गया है। "करतलराजच्छक्ते" शब्द भगवान के हाथ में शक्ति के महत्व को दर्शाता है। भगवान का तेजस्वी स्वरूप, पीतांबर धारण और दिव्य मयूर वाहन उनकी दैवीय माधुर्य और शुद्धता को प्रतिबिंबित करता है। दूसरे श्लोक में शिव से उत्पन्न हुए भगवान को करोड़ों सूर्यों के समान तेजस्वी बताया गया है। "नीलग्रीवतनुद्भव" का अर्थ है नीलकंठ शिव से जन्मा हुआ। काल का महाबल भी भगवान की आनंदमय शक्ति के सामने नतमस्तक होता है, जो भगवान की सर्वोच्च शक्ति को दर्शाता है।
"पदजितपंकज" अर्थात कमल को जीतने वाले चरणों वाले भगवान के चरणों की पूजा ब्रह्मा, विष्णु और अन्य देवता करते हैं। यह देवसेनेश भक्तों को मोक्ष का मार्ग दिखाते हैं और उन्हें उच्च आध्यात्मिक अवस्थाओं तक पहुंचाते हैं। "पदवीं प्रापय महतीं" भक्तों को श्रेष्ठ पदवी प्रदान करने की प्रार्थना है। तारकासुर के अत्याचार का अंत करके, संसार में शांति और धर्म को पुनर्स्थापित करने वाले वीर के रूप में भगवान की स्तुति की जाती है। उन्हें संसार सागर की बाधाओं को दूर करने वाला और भक्तों को भवसागर से पार लगाने वाला बताया गया है।
"तारकदैत्यनिवारक" तारकासुर का संहार करने वाले भगवान की पराक्रम को दर्शाता है। पंचभूतों के सार से उत्पन्न होकर, शर वन में पले-बढ़े "शरवणभव" नाम भगवान के दिव्य जन्म की याद दिलाता है। अंतिम श्लोक में, पार्वती देवी के प्रिय पुत्र, देवसेना के पति और वेदों द्वारा प्रशंसित दिव्य स्वरूप के रूप में भगवान की आराधना की जाती है। "सर्वश्रुतिगीतविभो" पद वेदों द्वारा गाए गए महान प्रभु को इंगित करता है। भगवान की उपस्थिति शुभता, ज्ञान और दिव्य सुरक्षा प्रदान करती है, जो भक्तों के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाती है।
लाभ (Benefits):
- भय, बाधाएं, शत्रु-पीड़ाएं दूर होती हैं: इस स्तोत्र के नियमित पाठ से मन के भय दूर होते हैं, जीवन की चुनौतियों का सामना करने का साहस आता है और शत्रुओं के कष्टों से मुक्ति मिलती है।
- परिवार की रक्षा, स्वास्थ्य, साहस मिलता है: भगवान सुब्रह्मण्य परिवार की रक्षा करते हैं, उत्तम स्वास्थ्य प्रदान करते हैं और किसी भी परिस्थिति में स्थिर रहने का साहस देते हैं।
- कार्यसिद्धि, अपेक्षित परिणाम, मानसिक शांति: भगवान की कृपा से किए गए कार्यों में सफलता मिलती है, अपेक्षित परिणाम प्राप्त होते हैं और मन को शांति व सुकून मिलता है।
- तारकासुर संहार के तत्व से नकारात्मकता का नाश: जैसे तारकासुर का संहार हुआ, वैसे ही हमारे भीतर और आसपास की नकारात्मक शक्तियाँ, दुष्ट प्रभाव नष्ट होकर सकारात्मक वातावरण बनता है।
- भगवान की कृपा, दैवीय सान्निध्य में वृद्धि: इस स्तोत्र का पाठ भगवान सुब्रह्मण्य की विशेष कृपा दृष्टि प्राप्त करने में सहायक होता है, जिससे दैवीय सान्निध्य का अनुभव बढ़ता है।
- भक्तों को सद्गति, शुभ मार्ग, आध्यात्मिक बल: भगवान शरवणभव भक्तों को सन्मार्ग दिखाते हैं, शुभ फल प्रदान करते हैं और आध्यात्मिक रूप से बलशाली बनने में सहायता करते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
शरवणभव देवसेनेश षट्कं क्या है?
इस स्तोत्र का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
शरवणभव देवसेनेश षट्कं के पाठ से क्या लाभ होते हैं?
यह स्तोत्र किसे पढ़ना चाहिए?
इस स्तोत्र का कितनी बार पाठ करना चाहिए?
इस स्तोत्र की उत्पत्ति या रचयिता कौन हैं?
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