माघ गुप्त नवरात्रि: कात्यायनी पूजा
छठे दिन की देवी: माँ कात्यायनी
माघ गुप्त नवरात्रि के छठे दिन माँ कात्यायनी की पूजा होती है। कथा के अनुसार महर्षि कात्यायन ने देवी को पुत्री रूप में पाने के लिए तप किया, और जब महिषासुर का अत्याचार बढ़ा तो ब्रह्मा, विष्णु और महेश के तेज से प्रकट देवी ने उनके आश्रम में जन्म लिया। ऋषि ने सबसे पहले उनकी पूजा की, इसलिए वे कात्यायनी कहलाईं। इन्हीं ने महिषासुर का वध किया, इसलिए वे महिषासुरमर्दिनी भी हैं। चार भुजाओं वाली माँ सिंह पर सवार हैं और हाथों में तलवार और कमल है।
किस तिथि को
माघ शुक्ल षष्ठी को। अगर तिथि क्षय के कारण किसी साल दो पूजाएँ एक दिन आ जाएँ, तो ऊपर पंचांग में दी तिथि मानें।
पूजा और भोग
माँ को लाल फूल, विशेषकर गुड़हल, सिंदूर, अक्षत और हल्दी चढ़ाएँ। परंपरा में माँ कात्यायनी को शहद का भोग लगाया जाता है। योग परंपरा में यह दिन आज्ञा चक्र से जोड़ा जाता है।
विवाह की कामना और ब्रज की परंपरा
भागवत में वर्णन है कि ब्रज की गोपियों ने श्रीकृष्ण को पति रूप में पाने के लिए यमुना तट पर कात्यायनी देवी का व्रत और पूजा की थी। इसी कारण आज भी जिन कन्याओं के विवाह में बाधा हो, वे माँ कात्यायनी की पूजा करती हैं और यह मंत्र जपती हैं: "कात्यायनि महामाये महायोगिन्यधीश्वरि। नन्दगोपसुतं देवं पतिं मे कुरु ते नमः॥"। वृंदावन में कात्यायनी पीठ इसी परंपरा से जुड़ा है।
गुप्त नवरात्रि में
हमारी साइट दिनों को नवदुर्गा क्रम से दिखाती है; महाविद्या साधक अपने गुरु के क्रम से उपासना करते हैं। शाम को जय अम्बे गौरी और दुर्गा चालीसा का पाठ करें। आगे की पूजाएँ कालरात्रि पूजा से जारी रहती हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
गुप्त नवरात्रि के छठे दिन किसकी पूजा होती है?
माँ कात्यायनी को क्या भोग लगाएँ?
विवाह के लिए कात्यायनी की पूजा क्यों होती है?
उनका नाम कात्यायनी क्यों पड़ा?
टिप्पणियाँ
टिप्पणी लिखने के लिए लॉगिन करें
टिप्पणियाँ लोड हो रही हैं...
