द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी
द्विजप्रिय संकष्टी क्या है
द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी फाल्गुन महीने के कृष्ण पक्ष की चौथ है, जिस दिन गणेश जी के "द्विजप्रिय" रूप की पूजा होती है। द्विजप्रिय का अर्थ है — विद्वानों, साधकों और वेदपाठियों को प्रिय गणपति। इस दिन का व्रत ज्ञान, घर की शांति और रुके कामों में आ रही अड़चनें दूर करने की भावना से रखा जाता है।
किस तिथि को
पूर्णिमांत पंचांग के अनुसार यह फाल्गुन कृष्ण चतुर्थी है; अमांत पंचांग में यही दिन माघ कृष्ण चतुर्थी कहलाता है। इसलिए महाराष्ट्र के कैलेंडर में आपको यह "माघ" में लिखी मिल सकती है — तिथि वही है। व्रत उस दिन होता है जब चंद्रोदय के समय चतुर्थी चल रही हो। यह संकष्टी महाशिवरात्रि से लगभग दस दिन पहले पड़ती है, जब मौसम में ठंड ढलने लगती है।
पूजा कैसे करें
- सुबह स्नान के बाद गणेश जी के सामने व्रत का संकल्प लें।
- शाम को चौकी पर गणपति की प्रतिमा रखें, दूर्वा, लाल फूल, रोली, अक्षत और मोदक या बेसन के लड्डू चढ़ाएँ।
- "ॐ गं गणपतये नमः" का जाप करें, संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा पढ़ें और गणेश चालीसा का पाठ करें।
- चंद्रोदय होने पर चंद्रमा को अर्घ्य दें, फिर प्रसाद लेकर व्रत खोलें।
इस दिन किसी विद्यार्थी या ब्राह्मण को किताब, कलम या भोजन देना इस रूप के स्वभाव के अनुकूल माना जाता है। उत्तर भारत में इसके लिए अलग लोक-नाम प्रचलित नहीं है; यहाँ लोग इसे बस फाल्गुन की संकष्टी कहते हैं। हर महीने की सूची संकष्टी चतुर्थी कैलेंडर पर है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी कब आती है?
द्विजप्रिय का अर्थ क्या है?
इस दिन किसकी पूजा होती है?
व्रत कैसे खोलें?
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