गणाधिप संकष्टी चतुर्थी
गणाधिप संकष्टी चतुर्थी क्या है
मार्गशीर्ष (अगहन) मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को गणेश जी के गणाधिप रूप की पूजा होती है। कार्तिक के दीयों और त्योहारों के बाद, सर्दी की शुरुआत में आने वाली इस संकष्टी पर भक्त दिन भर व्रत रखकर रात को चंद्रमा को अर्घ्य देते हैं।
गणाधिप रूप का अर्थ
गणाधिप यानी गणों के अधिपति। शिव जी के गण, यानी उनके सेवक और साथी, अलग-अलग स्वभाव और रूप वाले माने जाते हैं। शिव पुराण की कथा में जब शिव जी ने बालक गणेश को हाथी का मुख देकर फिर से जीवन दिया, तो उन्होंने सब देवताओं के सामने उसे अपने सभी गणों का अध्यक्ष बना दिया और वरदान दिया कि हर पूजा में पहले उसी की पूजा होगी। तभी से वे गणपति, गणेश और गणाधिप कहलाए। यह रूप नेतृत्व, सबको साथ लेकर चलने और परिवार-समाज में मेल-जोल का प्रतीक है, इसलिए घर-परिवार और कामकाज में तालमेल के लिए इस संकष्टी की पूजा की जाती है।
किस तिथि को
पूर्णिमांत पंचांग में मार्गशीर्ष कृष्ण चतुर्थी; अमांत पंचांग में यही कार्तिक कृष्ण चतुर्थी कहलाती है। व्रत उस दिन होता है जब चंद्रोदय के समय चतुर्थी हो।
कैसे मनाते हैं
- सुबह स्नान और संकल्प; दिन भर फलाहार।
- शाम को गणेश जी को दूर्वा, सिंदूर, लाल फूल, तिल-गुड़ के लड्डू या मोदक; ठंड के मौसम में शकरकंद और सिंघाड़े का भोग भी लगाया जाता है।
- संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा, गणेश चालीसा और जय गणेश देवा आरती।
- चंद्रोदय पर जल, दूध और अक्षत से अर्घ्य, फिर पारण।
सर्दी के महीनों की अगली बड़ी संकष्टी माघ की सकट चौथ (लंबोदर संकष्टी) है। हर महीने की तारीखें संकष्टी कैलेंडर पर देखें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
गणाधिप संकष्टी कब होती है?
गणाधिप का क्या अर्थ है?
इस संकष्टी पर क्या भोग लगाएँ?
संकष्टी का व्रत कितने समय का होता है?
संकष्टी चतुर्थी और विनायक चतुर्थी में क्या अंतर है?
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