गजानन संकष्टी चतुर्थी
गजानन संकष्टी चतुर्थी क्या है
सावन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को गणेश जी के गजानन रूप की पूजा होती है। सावन भगवान शिव का महीना है, और इस महीने उनके पुत्र गणेश की संकष्टी पर बहुत से परिवार शिव-पार्वती और गणेश, तीनों की साथ पूजा करते हैं। व्रत दिन भर रहता है और चंद्रोदय पर अर्घ्य के बाद खोला जाता है।
गजानन रूप का अर्थ
गजानन यानी हाथी के मुख वाले। शिव पुराण की कथा में माता पार्वती के बनाए बालक को द्वारपाल के रूप में रोकने पर शिव जी ने उसका सिर काट दिया था, और पार्वती के दुख को देखकर उस पर हाथी का सिर लगाकर उसे जीवन दिया। इसी रूप में वे सभी देवताओं में पहले पूजे जाने वाले बने। मुद्गल पुराण में गजानन अवतार चूहे पर सवार होकर लोभासुर, यानी लालच, को हराते हैं। बड़ा सिर बुद्धि का, बड़े कान ध्यान से सुनने का और छोटी आँखें एकाग्रता का प्रतीक माने जाते हैं।
किस तिथि को
पूर्णिमांत पंचांग में श्रावण कृष्ण चतुर्थी; अमांत पंचांग में यही आषाढ़ कृष्ण चतुर्थी है। व्रत चंद्रोदय के समय चतुर्थी वाले दिन रखा जाता है। उत्तर भारत में यह सावन शुरू होने के चौथे दिन के आसपास पड़ती है, जब कांवड़ यात्रा चल रही होती है।
कैसे मनाते हैं
- सुबह शिवलिंग पर जल चढ़ाकर गणेश जी के सामने संकल्प।
- फलाहार व्रत; शाम को दूर्वा, मोदक, लड्डू, बेलपत्र (शिव जी के लिए) और लाल फूल से पूजा।
- संकष्टी व्रत कथा, फिर गणेश जी की आरती और ॐ जय शिव ओंकारा।
- चंद्रोदय पर अर्घ्य और प्रसाद के साथ पारण।
सावन के बाकी नियमों के लिए सावन मास के व्रत और नियम पढ़ें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
गजानन संकष्टी किस महीने में आती है?
गणेश जी को गजानन क्यों कहते हैं?
क्या सावन की संकष्टी पर शिव पूजा भी करें?
क्या गणेश जी को बेलपत्र चढ़ा सकते हैं?
व्रत कैसे खोलें?
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