चैत्र नवरात्रि: चंद्रघंटा पूजा
चैत्र नवरात्रि में चंद्रघंटा पूजा
चैत्र शुक्ल तृतीया को चैत्र नवरात्रि का तीसरा दिन होता है, जिसमें माँ चंद्रघंटा की पूजा की जाती है। इसी दिन राजस्थान और मालवा में गणगौर का बड़ा पर्व भी होता है, इसलिए वहाँ के घरों में आज देवी के दो रूप, दुर्गा और गौरी, एक साथ पूजे जाते हैं।
माँ चंद्रघंटा का स्वरूप
माथे पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र, सोने जैसा तेज, दस भुजाओं में अस्त्र-शस्त्र और वाहन सिंह, यह माँ का युद्ध के लिए तैयार रूप है। कथा है कि शिव से विवाह के बाद पार्वती ने यह रूप धारण किया, और उनके घंटे की गूँज से असुरों का साहस टूट जाता था। भक्तों के लिए यह रूप डर हटाकर मन को स्थिर करने वाला है।
पिण्डजप्रवरारूढा चण्डकोपास्त्रकैर्युता। प्रसादं तनुते मह्यं चन्द्रघण्टेति विश्रुता॥
गणगौर और तीसरा दिन
होली के अगले दिन से कुंवारी लड़कियाँ और सुहागिनें मिट्टी की गौर बनाकर सोलह दिन पूजती हैं, और चैत्र शुक्ल तृतीया को गणगौर का मुख्य पर्व होता है। जयपुर, उदयपुर और बीकानेर में गणगौर की सवारी निकलती है, औरतें घूमर गाती हैं और शाम को गौर को पानी पिलाकर विदा किया जाता है। गणगौर की कथा गणगौर व्रत कथा में और पूजा का तरीका गणगौर पूजा विधि में है। जो परिवार नवरात्रि व्रत भी रखते हैं, वे सुबह माँ चंद्रघंटा की पूजा करके फिर गौर पूजन करते हैं।
आज क्या करें
- माँ को लाल फूल, लाल चुनरी और सिंदूर चढ़ाएँ।
- भोग में दूध, खीर या दूध की मिठाई चढ़ाने की परंपरा है।
- आरती में शंख और घंटी बजाएँ; इस दिन घंटा-ध्वनि का खास महत्व माना जाता है।
- शाम को दुर्गा चालीसा पढ़ें।
नौ रूपों और भोग की सूची नवदुर्गा के नौ रूप में है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
चैत्र नवरात्रि में चंद्रघंटा पूजा कब होती है?
माँ चंद्रघंटा को क्या भोग लगाएं?
क्या गणगौर और चंद्रघंटा पूजा एक ही दिन है?
माँ चंद्रघंटा का नाम कैसे पड़ा?
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