गणगौर राजस्थान का सबसे प्रिय स्त्री-पर्व है, जिसमें शिव (ईसर) और पार्वती (गौर) की पूजा होती है। पूजा होली के अगले दिन, धुलंडी यानी चैत्र कृष्ण प्रतिपदा से शुरू होती है और चैत्र शुक्ल तृतीया को गणगौर के दिन पूरी होती है। गिनती में ये लगभग अठारह दिन बनते हैं, पर घरों में इसे सोलह दिन की गौर पूजा ही कहा जाता है। कुंवारी लड़कियाँ मनचाहे वर के लिए और सुहागिनें पति की लंबी आयु के लिए यह पूजा करती हैं। मध्य प्रदेश के मालवा-निमाड़, हरियाणा और गुजरात के कुछ हिस्सों में भी गणगौर पूजी जाती है।
वर्ष 2026 में गणगौर 21 मार्च को और वर्ष 2027 में 9 अप्रैल को है। तिथि और पूजा का समय गणगौर पृष्ठ पर देखें।
होली के अगले दिन से शुरुआत
धुलंडी की सुबह लड़कियाँ और नई बहुएँ होलिका दहन की ठंडी राख और गीली मिट्टी (कई घरों में गोबर) लाकर सोलह छोटी पिंडियाँ बनाती हैं। इन्हीं पिंडियों को पहले कुछ दिन गौर मानकर पूजा जाता है। पूजा के लिए घर में एक साफ़ कोना या दीवार चुनी जाती है, जहाँ अगले सोलह-अठारह दिन रोज़ पूजा होगी।
शादी के बाद की पहली गणगौर का विशेष महत्व है। राजस्थान में नई दुल्हन पहली गणगौर अक्सर मायके में पूजती है, और पूरे सोलह दिन पूजा करती है। बाद के सालों में कई सुहागिनें केवल अंतिम दिन का व्रत और पूजा करती हैं।
पूजा सामग्री
- होलिका की राख और मिट्टी (पिंडियों के लिए)
- ताज़ी दूब (हरी घास) और मौसमी फूल
- जल से भरा लोटा या कलश
- रोली, मेहंदी, काजल, हल्दी, अक्षत
- सुहाग का सामान: चूड़ी, बिंदी, सिंदूर, छोटी चुनरी
- दीवार या कागज़ पर बिंदियाँ लगाने के लिए साफ़ जगह
- प्रसाद: गुणे (मैदे या आटे के मीठे-नमकीन तले पकवान), घेवर, फल
- बाद के दिनों के लिए मिट्टी या लकड़ी की ईसर-गौर की मूर्तियाँ
ईसर-गौर की मूर्तियाँ
सातवें-आठवें दिन, यानी शीतला अष्टमी के आसपास, कई घरों में कुम्हार के यहाँ से मिट्टी लाकर ईसर और गौर की मूर्तियाँ बनाई या खरीदी जाती हैं। जिन परिवारों में लकड़ी की रंगी हुई पुरानी मूर्तियाँ हैं, वे उन्हें निकालकर नए कपड़े और गहने पहनाते हैं; ये मूर्तियाँ पीढ़ियों तक चलती हैं और हर साल फिर से सजाई जाती हैं। लोकगीतों में ईसर-गौर के साथ उनके परिवार, जैसे कानीराम जी और रोवां बाई, के नाम भी आते हैं, और कई घरों में उनकी छोटी मूर्तियाँ भी रखी जाती हैं।
गौर को लहरिया या चुनरी की ओढ़नी, गहने और मेहंदी से सजाया जाता है, और ईसर जी को पगड़ी और धोती पहनाई जाती है। पूजा करने वाली स्त्रियों का अपना श्रृंगार भी इस पर्व का हिस्सा है; पूरी सूची सोलह श्रृंगार लेख में है।
रोज़ की पूजा और दूब
- सुबह नहाकर लड़कियाँ और स्त्रियाँ बाग़ या खेत से ताज़ी दूब और फूल लाती हैं। रास्ते में और लौटते हुए गीत गाने का रिवाज़ है।
- लोटे में जल भरकर उसमें दूब और फूल डालती हैं और गौर के सामने बैठती हैं।
- दूब को जल में डुबोकर गौर (पिंडियों या मूर्तियों) पर सोलह बार जल छिड़कती हैं; इसे गौर को पानी देना कहते हैं।
- दीवार या कागज़ पर रोली, मेहंदी और काजल की सोलह-सोलह बिंदियाँ लगाती हैं। कुंवारी लड़कियाँ और सुहागिनें अलग-अलग पंक्ति बनाती हैं।
- रोली-अक्षत से तिलक, फूल और सुहाग का सामान चढ़ाकर गुणे या फल का भोग लगाती हैं।
- हाथ में दूब और अक्षत लेकर पूजा के गीत गाती हैं, जिनमें सबसे प्रसिद्ध ‘गौर गौर गोमती, ईसर पूजे पार्वती’ से शुरू होता है।
- पूजा के बाद कहानी सुनी जाती है और घर की बड़ी स्त्रियों के पैर छूए जाते हैं।
दोपहर बाद या शाम को कई मोहल्लों में लड़कियाँ गौर को कुएँ, बावड़ी या बगीचे में पानी पिलाने ले जाती हैं, और सिर पर कलश रखकर गीत गाती हुई लौटती हैं।
गीत और घुड़ला
गणगौर बिना गीतों के अधूरी है। सुबह की पूजा के गीत, पानी पिलाने के गीत, ईसर-गौर की छेड़छाड़ वाले मीठे गीत और विदाई के भावुक गीत, सब अलग-अलग होते हैं और माँ से बेटी तक मुँह-ज़बानी चलते आए हैं। मारवाड़ी और मेवाड़ी में इनके बोल थोड़े बदल जाते हैं।
शीतला अष्टमी के बाद से मारवाड़ (जोधपुर क्षेत्र) में घुड़ले की परंपरा शुरू होती है। घुड़ला मिट्टी का छेदों वाला घड़ा होता है, जिसके अंदर दीपक जलता है। शाम को लड़कियाँ घुड़ला सिर पर रखकर घर-घर जाती हैं, घुड़ले के गीत गाती हैं और बदले में घर की स्त्रियाँ उन्हें तेल, पैसे या मिठाई देती हैं। गणगौर के दिन घुड़ला भी गौर के साथ विदा कर दिया जाता है।
सिंजारा और अंतिम दिन का विसर्जन
सिंजारा (चैत्र शुक्ल द्वितीया)
गणगौर से एक दिन पहले सिंजारा होता है। मायके से बेटी के लिए घेवर, मिठाई, मेहंदी, कपड़े और श्रृंगार का सामान आता है। रात को स्त्रियाँ हाथों में मेहंदी लगाती हैं और गीत-नाच होता है।
गणगौर का दिन (चैत्र शुक्ल तृतीया)
- स्त्रियाँ व्रत रखती हैं; ज़्यादातर घरों में दिन में एक बार भोजन किया जाता है।
- पूरे श्रृंगार के साथ ईसर-गौर की अंतिम पूजा होती है। सोलह गुणे या सोलह पकवान का भोग लगता है, और सुहाग का सामान गौर को चढ़ाया जाता है।
- गणगौर की कथा सुनी जाती है, जिसमें शिव-पार्वती के भ्रमण और पार्वती द्वारा सच्ची भक्ति वाली स्त्रियों को सुहाग का आशीर्वाद देने का प्रसंग है। पूरी कथा गणगौर व्रत कथा पृष्ठ पर पढ़ें।
- बायना निकाला जाता है: गुणे, मिठाई और सुहाग का सामान थाली में रखकर सास या जेठानी को देकर पैर छूते हैं।
- शाम को गौर को विदा किया जाता है। मिट्टी की पिंडियाँ और मूर्तियाँ गीत गाते हुए तालाब, बावड़ी, नदी या कुएँ में विसर्जित की जाती हैं। लकड़ी की मूर्तियाँ विसर्जित नहीं होतीं; उन्हें पानी पिलाकर वापस घर लाया जाता है और अगले साल के लिए सँभालकर रखा जाता है।
आजकल कई शहरों में तालाब न होने पर लोग घर पर ही बाल्टी या टब में मिट्टी की गौर विसर्जित करके वह मिट्टी गमलों में डाल देते हैं। यह भी पूरी तरह ठीक है।
जयपुर और उदयपुर की सवारी
जयपुर में गणगौर की शाही सवारी सिटी पैलेस की जनानी ड्योढ़ी से निकलती है और त्रिपोलिया बाज़ार, छोटी चौपड़ होते हुए तालकटोरा की ओर जाती है। सजे हुए हाथी, ऊँट, लोक कलाकार और गौर की पालकी इसे देखने लायक बनाते हैं। अगले दिन बूढ़ी गणगौर की सवारी निकलती है। उदयपुर में पिछोला झील के गणगौर घाट पर स्त्रियाँ गौर को लेकर आती हैं और झील में नावों की शोभायात्रा होती है। नाथद्वारा, बीकानेर और जोधपुर की गणगौर भी अपने-अपने रंग में मशहूर हैं।
सवारी का रास्ता और समय हर साल प्रशासन तय करता है, इसलिए जाने से पहले स्थानीय सूचना देख लें। दिन की तिथि और शुभ समय आज के पंचांग में मिलेगा।

