आषाढ़ गुप्त नवरात्रि: कात्यायनी पूजा
कात्यायनी पूजा क्या है
आषाढ़ शुक्ल षष्ठी को गुप्त नवरात्रि का छठा दिन होता है, जिसमें माँ कात्यायनी की पूजा की जाती है। यही वह रूप है जिसने महिषासुर का वध किया। अच्छे वर की कामना रखने वाली कन्याएँ इस दिन माँ की विशेष पूजा करती हैं।
कथा और स्वरूप
महर्षि कात्यायन ने वर्षों तपस्या की कि देवी उनके घर पुत्री बनकर आएँ। जब महिषासुर का अत्याचार बढ़ा, तब देवताओं के तेज से प्रकट हुई देवी की सबसे पहले पूजा कात्यायन ऋषि ने की, इसलिए वे कात्यायनी कहलाईं। भागवत पुराण में ब्रज की गोपियाँ श्रीकृष्ण को पति रूप में पाने के लिए यमुना किनारे कात्यायनी व्रत करती हैं। माँ की चार भुजाएँ हैं, हाथों में तलवार और कमल, बाकी दो अभय और वर मुद्रा में, और वाहन सिंह।
चन्द्रहासोज्ज्वलकरा शार्दूलवरवाहना। कात्यायनी शुभं दद्याद् देवी दानवघातिनी॥
दस महाविद्याएँ और गुप्त नवरात्रि
गुप्त नवरात्रि की पहचान दस महाविद्याओं से है: काली, तारा, त्रिपुर सुंदरी (षोडशी), भुवनेश्वरी, भैरवी, छिन्नमस्ता, धूमावती, बगलामुखी, मातंगी और कमला। इनकी उपासना दीक्षा और गुरु के मार्गदर्शन में होती है, इसलिए आम परिवार इन दिनों नवदुर्गा की ही पूजा करते हैं। दतिया का पीतांबरा पीठ और असम का कामाख्या मंदिर जैसे स्थान इन दिनों साधकों से भरे रहते हैं, पर वहाँ भी माहौल शांत और अनुशासित रहता है।
आज क्या करें
- माँ को लाल चुनरी और लाल फूल चढ़ाएँ।
- भोग में शहद चढ़ाने की परंपरा है; कई घरों में शहद वाला पान भी अर्पित होता है।
- विवाह की कामना वाली कन्याएँ हल्दी की गाँठ अर्पित कर माँ से प्रार्थना करती हैं।
- शाम को जय अम्बे गौरी आरती करें।
सातवें दिन की पूजा के लिए कालरात्रि पूजा देखें, और देवी स्थानों के बारे में 51 शक्तिपीठ पढ़ें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
माँ कात्यायनी की पूजा किस दिन होती है?
कात्यायनी माता को क्या भोग लगाएं?
विवाह के लिए कात्यायनी पूजा क्यों करते हैं?
दस महाविद्याएँ कौन सी हैं?
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