अहोई अष्टमी
अहोई अष्टमी माताओं का व्रत है, जो संतान की लंबी उम्र, सेहत और सुख के लिए करवा चौथ के चार दिन बाद रखा जाता है। माताएँ दिन भर उपवास रखकर शाम को अहोई माता की पूजा करती हैं और तारों को अर्घ्य देकर व्रत खोलती हैं। दिल्ली, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, राजस्थान और पंजाब में इसका खास चलन है।
क्या है और क्यों मनाते हैं
लोककथा के अनुसार एक साहूकारनी से मिट्टी खोदते समय अनजाने में स्याहू (साही) का बच्चा मर गया। इस दुख का प्रायश्चित उसने अहोई माता की आराधना से किया और उसके बच्चे सुरक्षित रहे। कथा अपने शब्दों में अहोई अष्टमी व्रत कथा में पढ़ें। "अहोई" शब्द को अनहोनी टालने वाली माता से भी जोड़ा जाता है।
किस तिथि को
पूर्णिमांत पंचांग के अनुसार कार्तिक कृष्ण अष्टमी; अमांत पंचांग में यही आश्विन कृष्ण अष्टमी कहलाती है। पूजा शाम के समय, सूर्यास्त के बाद होती है, इसलिए वह दिन लिया जाता है जब संध्या में अष्टमी हो। इस रात चाँद देर से निकलता है, इसलिए ज़्यादातर घरों में तारे देखकर अर्घ्य दिया जाता है; कुछ परिवार चंद्रोदय तक रुकते हैं।
कैसे मनाते हैं
- दीवार पर गेरू या कागज़ पर अहोई माता का चित्र बनता है, जिसमें स्याहू और उसके बच्चे, और सात पुत्रों के चिह्न होते हैं।
- पूजा में जल भरा करवा (अक्सर करवा चौथ वाला ही), मीठे पुए या आटे का हलवा, चावल और मूली या सिंघाड़ा रखा जाता है।
- चाँदी की स्याहू माला में हर साल या हर संतान के लिए एक मनका जोड़ने की परंपरा है; यह माला दिवाली तक पहनी जाती है।
- मथुरा के पास राधा कुंड में इस रात स्नान का बड़ा मेला लगता है।
पूजा की पूरी विधि अहोई अष्टमी पूजा विधि में है। इससे पहले आने वाले करवा चौथ और बाद में आने वाली दिवाली के पृष्ठ भी देखें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
अहोई अष्टमी कब होती है?
अहोई अष्टमी का व्रत कैसे खोलें?
स्याहू माला क्या है?
क्या बेटी के लिए भी अहोई व्रत रखते हैं?
अहोई अष्टमी पर क्या भोग लगता है?
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