रक्षाबंधन पर राखी बाँधने की विधि और मुहूर्त

राखी श्रावण पूर्णिमा को भद्रा ख़त्म होने के बाद, अपराह्न में बाँधना सबसे शुभ है। बहन भाई को पूर्व या उत्तर मुख बैठाकर तिलक करती है और रक्षा सूत्र मंत्र बोलते हुए दाहिनी कलाई पर राखी बाँधती है।

N. R. Sharma (Nutalapati Rajeshwara Sharma)
लेखन: · वेद पण्डित, लेखकअद्यतन · 5 मिनट का पाठ
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राखी बाँधने की विधि सरल है: बहन थाली सजाती है, भाई को पूर्व या उत्तर की ओर मुँह करके बैठाती है, रोली-अक्षत से तिलक करती है, दाहिनी कलाई पर रक्षा सूत्र मंत्र बोलते हुए राखी बाँधती है, आरती उतारती है और मिठाई खिलाती है। राखी श्रावण पूर्णिमा के दिन बाँधी जाती है, पर भद्रा काल में नहीं। शुभ समय के लिए दोपहर बाद का अपराह्न काल सबसे अच्छा माना जाता है।

राखी की थाली

थाली एक दिन पहले ही सजा लें, ताकि सुबह भागदौड़ न हो। पारंपरिक थाली में ये चीज़ें रहती हैं:

  • राखी (रेशमी धागा, मौली या जो भी राखी आपने चुनी हो)
  • रोली या कुमकुम और हल्दी
  • अक्षत (साबुत चावल, टूटे हुए नहीं)
  • घी का दीपक
  • मिठाई (घर की बनी हो तो और अच्छा), कई घरों में घेवर या बताशे
  • एक छोटा लोटा जल या गंगाजल
  • सिर ढकने के लिए रूमाल या टोपी
  • कुछ घरों में नारियल या सूखा गोला

कोई चीज़ न हो तो चिंता न करें। रोली न हो तो हल्दी या चंदन से तिलक हो सकता है, खास राखी न मिले तो पूजा वाली मौली (कलावा) भी उतनी ही पवित्र है। असल राखी तो रक्षा सूत्र ही है।

राखी बाँधने की विधि

  1. सुबह स्नान करके घर के मंदिर में पूजा करें। कई परिवार पहली राखी गणेश जी, अपने इष्ट देव या लड्डू गोपाल को चढ़ाते हैं।
  2. भाई को पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुँह करके आसन या पीढ़े पर बैठाएँ। बहन का मुँह भाई की ओर रहे।
  3. भाई के सिर पर रूमाल या टोपी रखें; परंपरा में सिर ढककर तिलक कराया जाता है।
  4. दीपक जलाएँ। रोली से भाई के माथे पर तिलक करें और उस पर अक्षत लगाएँ। कुछ अक्षत भाई के सिर पर आशीर्वाद के रूप में छिड़कें।
  5. रक्षा सूत्र मंत्र बोलते हुए भाई की दाहिनी कलाई पर राखी बाँधें। तीन गाँठें लगाने का चलन है।
  6. दीपक से भाई की आरती उतारें और मिठाई खिलाएँ।
  7. भाई बहन के पैर छूता है (या बड़ी बहन हो तो आशीर्वाद लेता है), उपहार देता है और रक्षा का वचन देता है।

कई घरों में बहनें राखी बाँधने तक कुछ नहीं खातीं और राखी के बाद ही भोजन करती हैं। यह व्रत नहीं, प्रेम का नियम है, इसलिए भाई को आने में देर हो तो बहन फल या पानी ले सकती है।

लुंबा राखी और दूसरी परंपराएँ

मारवाड़ी और राजस्थानी परिवारों में भाभी को लुंबा बाँधा जाता है, जो उसकी चूड़ी में लटकती है। कई जगह बहनें बहन को भी राखी बाँधती हैं। जिनका भाई नहीं है, वे श्रीकृष्ण को राखी बाँधती हैं, जैसे द्रौपदी ने कृष्ण की कटी उँगली पर अपनी साड़ी का किनारा बाँधा था।

रक्षा सूत्र मंत्र

राखी बाँधते समय यह पारंपरिक मंत्र बोला जाता है:

येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः।

तेन त्वामनुबध्नामि रक्षे मा चल मा चल॥

अर्थ: जिस रक्षा सूत्र से महाबली दानवराज बलि बाँधे गए थे, उसी से मैं तुम्हें बाँधता/बाँधती हूँ। हे रक्षा सूत्र, तुम अडिग रहना, विचलित मत होना। कुछ पुस्तकों में दूसरी पंक्ति "तेन त्वां प्रतिबध्नामि" के रूप में मिलती है; अर्थ वही है।

यह मंत्र राजा बलि और माँ लक्ष्मी की कथा से जुड़ा है। जब भगवान विष्णु बलि के द्वारपाल बनकर पाताल में रहने लगे, तब लक्ष्मी जी ने बलि को राखी बाँधकर उन्हें भाई बनाया और उपहार में अपने पति को वापस माँग लिया। इंद्राणी द्वारा इंद्र को रक्षा सूत्र बाँधने की कथा भी इसी पर्व से जुड़ी है। दोनों कथाएँ विस्तार से रक्षाबंधन की कथा में पढ़ें।

भद्रा और मुहूर्त

रक्षाबंधन श्रावण पूर्णिमा को मनाया जाता है, पर पूर्णिमा तिथि के साथ अक्सर भद्रा भी लगी रहती है। परंपरा में भद्रा काल में राखी नहीं बाँधी जाती। लोक में कहा जाता है कि शूर्पणखा ने भद्रा में रावण को राखी बाँधी थी और उसी साल रावण का अंत हुआ। भद्रा क्या है और किन कामों में इसे टाला जाता है, यह भद्रा क्या है में समझाया गया है।

शुभ समय चुनने के नियम:

  • भद्रा ख़त्म होने के बाद, पूर्णिमा तिथि रहते हुए राखी बाँधें।
  • सबसे अच्छा समय अपराह्न (दोपहर बाद का हिस्सा) माना गया है; वह न मिले तो शाम का प्रदोष काल।
  • अगर भद्रा देर शाम तक हो तो कई पंडित भद्रा के "पूँछ" वाले हिस्से में राखी की अनुमति देते हैं। ऐसे साल में अपने पंडित जी या पंचांग की सलाह मानें।
  • राहुकाल से भी बचने की कोशिश करें।

हर साल भद्रा का समय और राखी का शुभ मुहूर्त अलग होता है। इस साल का समय रक्षाबंधन पृष्ठ पर देखें।

श्रावणी उपाकर्म

श्रावण पूर्णिमा पर ही श्रावणी या उपाकर्म भी होता है। इस दिन जनेऊ पहनने वाले नदी या तालाब के किनारे हेमाद्रि स्नान करते हैं, सप्तर्षियों और ऋषियों का तर्पण करते हैं और पुराना जनेऊ उतारकर नया धारण करते हैं। पुराने समय में यहीं से वेद-पाठ का नया सत्र शुरू होता था। जनेऊ के नियम जनेऊ संस्कार में दिए हैं। कई घरों में पहले पुरोहित जी यजमान को रक्षा सूत्र बाँधते हैं, फिर बहनें भाइयों को राखी।

भाई दूर हो तो

नौकरी, पढ़ाई या फ़ौज की वजह से बहुत से भाई रक्षाबंधन पर घर नहीं आ पाते। ऐसे में:

  1. राखी पहले भेजें: डाक या कूरियर से कुछ दिन पहले भेज दें, साथ में रोली-अक्षत की छोटी पुड़िया और मिठाई।
  2. बहन पूजा करे: राखी के दिन बहन अपने घर पर भाई के नाम से दीपक जलाकर भगवान को राखी और मिठाई चढ़ाए और मन में रक्षा सूत्र मंत्र बोले।
  3. भाई की ओर से: भाई शुभ समय में खुद तिलक लगाकर, या पत्नी, माँ या किसी परिजन से बँधवाकर राखी पहने। वीडियो कॉल पर बहन साथ रहे तो और अच्छा।
  4. पहले भगवान को: राखी न पहुँच पाए तो बहन श्रीकृष्ण या हनुमान जी को भाई के नाम की राखी बाँध सकती है।

राखी कब उतारें, इस पर परिवारों में अलग चलन है। कई लोग जन्माष्टमी तक पहनते हैं, कुछ दस-पंद्रह दिन बाद उतारते हैं। उतरी हुई राखी को कूड़े में न डालें; किसी पेड़ की जड़ में रख दें या बहते जल में प्रवाहित करें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

राखी किस हाथ में बाँधनी चाहिए?

राखी भाई की दाहिनी कलाई पर बाँधी जाती है। पूजा-पाठ के रक्षा सूत्र भी पुरुषों के दाहिने हाथ में बाँधे जाते हैं।

भद्रा में राखी क्यों नहीं बाँधते?

भद्रा काल को शुभ कामों के लिए वर्जित माना जाता है। लोक कथा है कि शूर्पणखा ने भद्रा में रावण को राखी बाँधी थी, इसलिए भद्रा ख़त्म होने के बाद ही राखी बाँधी जाती है।

राखी बाँधते समय कौन सा मंत्र बोलें?

येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः, तेन त्वामनुबध्नामि रक्षे मा चल मा चल। इसका अर्थ है कि जिस सूत्र से राजा बलि बाँधे गए, उसी से मैं तुम्हें बाँधती हूँ।

राखी बाँधने का सबसे अच्छा समय कौन सा है?

भद्रा रहित पूर्णिमा में अपराह्न (दोपहर बाद) का समय सबसे अच्छा माना जाता है; वह न मिले तो प्रदोष काल। हर साल का मुहूर्त पंचांग में देखें।

राखी कब उतारनी चाहिए?

इसका कोई एक नियम नहीं है; कई लोग जन्माष्टमी तक पहनते हैं। उतरी राखी को कूड़े में न डालें, पेड़ की जड़ में रखें या बहते जल में प्रवाहित करें।

N. R. Sharma (Nutalapati Rajeshwara Sharma)
लेखक के बारे में

नूतलपाटि राजेश्वर शर्मा

वेद पण्डित, लेखक

नूतलपाटि राजेश्वर शर्मा जी वेद पण्डित और लेखक हैं। अनेक वर्षों से वे दुर्गा देवी की आराधना का अध्ययन और आचरण करते आ रहे हैं। पूजा विधि, मंत्रों और स्तोत्रों को सामान्य भक्तों के लिए सरलता से समझाना उनका लक्ष्य है। वे “श्री दुर्गा नित्याराधना” ग्रंथ के लेखक हैं। इस साइट के लेख उनकी रचनाएँ हैं, या उनके ग्रंथों पर आधारित हैं।

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