वाक्यवृत्तिः
सर्गस्थितिप्रळयहेतुमचिंत्यशक्तिं
विश्वेश्वरं विदितविश्वमनंतमूर्तिं |
निर्मुक्तबंधनमपारसुखांबुराशिं
श्रीवल्लभं विमलबोधघनं नमामि || 1 ||
यस्य प्रसादादहमेव विष्णु-
-र्मय्येव सर्वं परिकल्पितं च |
इत्थं विजानामि सदात्मरूपं
तस्यांघ्रिपद्मं प्रणतोऽस्मि नित्यं || 2 ||
तापत्रयार्कसंतप्तः कश्चिदुद्विग्नमानसः |
शमादिसाधनैर्युक्तः सद्गुरुं परिपृच्छति || 3 ||
अनायासेन येनास्मान्मुच्येयं भवबंधनात् |
तन्मे संक्षिप्य भगवन् केवयं कृपया वद || 4 ||
गुरुरुवाच |
साध्वी ते वचनव्यक्तिः प्रतिभाति वदामि ते |
इदं तदिति विस्पष्टं सावधानमनाः शृणु || 5 ||
तत्त्वमस्यादिवाक्योत्थं यज्जीवपरमात्मनोः |
तादात्म्यविषयं ज्ञानं तदिदं मुक्तिसाधनं || 6 ||
शिष्य उवाच |
को जीवः कः परश्चात्मा तादात्म्यं वा कथं तयोः |
तत्त्वमस्यादिवाक्यं वा कथं तत्प्रतिपादयेत् || 7 ||
गुरुरुवाच |
अत्र ब्रूमः समाधानं कोऽन्यो जीवस्त्वमेव हि |
यस्त्वं पृच्छसि मां कोऽहं ब्रह्मैवासि न संशयः || 8 ||
शिष्य उवाच |
पदार्थमेव जानामि नाद्यापि भगवन् स्फुटं |
अहं ब्रह्मेति वाक्यार्थं प्रतिपद्ये कथं वद || 9 ||
गुरुरुवाच |
सत्यमाह भवानत्र विज्ञानं नैव विद्यते |
हेतुः पदार्थबोधो हि वाक्यार्थावगतेरिह || 10 ||
अंतःकरणतद्वृत्तिसाक्षी चैतन्यविग्रहः |
आनंदरूपः सत्यः सन् किं नात्मानं प्रपद्यसे || 11 ||
सत्यानंदस्वरूपं धीसाक्षिणं ज्ञानविग्रहं |
चिंतयात्मतया नित्यं त्यक्त्वा देहादिगां धियं || 12 ||
रूपादिमान्यतः पिंडस्ततो नात्मा घटादिवत् |
वियदादिमहाभूतविकारत्वाच्च कुंभवत् || 13 ||
अनात्मा यदि पिंडोऽयमुक्तहेतुबलान्मतः |
करामलकवत्साक्षादात्मानं प्रतिपादय || 14 ||
घटद्रष्टा घटाद्भिन्नः सर्वथा न घटो यथा |
देहदृष्टा तथा देहो नाहमित्यवधारय || 15 ||
एवमिंद्रियदृङ्नाहमिंद्रियाणीति निश्चिनु |
मनो बुद्धिस्तथा प्राणो नाहमित्यवधारय || 16 ||
संघातोऽपि तथा नाहमिति दृश्यविलक्षणं |
द्रष्टारमनुमानेन निपुणं संप्रधारय || 17 ||
देहेंद्रियादयो भावा हानादिव्यापृतिक्षमाः |
यस्य सन्निधिमात्रेण सोऽहमित्यवधारय || 18 ||
अनापन्नविकारः सन्नयस्कांतवदेव यः |
बुद्ध्यादींश्चालयेत्प्रत्यक्सोऽहमित्यवधारय || 19 ||
अजडात्मवदाभांति यत्सान्निध्याज्जडा अपि |
देहेंद्रियमनःप्राणाः सोऽहमित्यवधारय || 20 ||
आगमन्मे मनोऽन्यत्र सांप्रतं च स्थिरीकृतं |
एवं यो वेद धीवृत्तिं सोऽहमित्यवधारय || 21 ||
स्वप्नजागरिते सुप्तिं भावाभावौ धियां तथा |
यो वेत्त्यविक्रियः साक्षात्सोऽहमित्यवधारय || 22 ||
घटावभासको दीपो घटादन्यो यथेष्यते |
देहावभासको देही तथाहं बोधविग्रहः || 23 ||
पुत्रवित्तादयो भावा यस्य शेषतया प्रियाः |
द्रष्टा सर्वप्रियतमः सोऽहमित्यवधारय || 24 ||
परप्रेमास्पदतया मा न भूवमहं सदा |
भूयासमिति यो द्रष्टा सोऽहमित्यवधारय || 25 ||
यः साक्षिलक्षणो बोधस्त्वंपदार्थः स उच्यते |
साक्षित्वमपि बोद्धृत्वमविकारितयात्मनः || 26 ||
देहेंद्रियमनःप्राणाहंकृतिभ्यो विलक्षणः |
प्रोज्झिताशेषषड्भावविकारस्त्वंपदाभिधः || 27 ||
त्वमर्थमेवं निश्चित्य तदर्थं चिंतयेत्पुनः |
अतद्व्यावृत्तिरूपेण साक्षाद्विधिमुखेन च || 28 ||
निरस्ताशेषसंसारदोषोऽस्थूलादिलक्षणः |
अदृश्यत्वादिगुणकः पराकृततमोमलः || 29 ||
निरस्तातिशयानंदः सत्यः प्रज्ञानविग्रहः |
सत्तास्वलक्षणः पूर्णः परमात्मेति गीयते || 30 ||
सर्वज्ञत्वं परेशत्वं तथा संपूर्णशक्तिता |
वेदैः समर्थ्यते यस्य तद्ब्रह्मेत्यवधारय || 31 ||
यज्ज्ञानात्सर्वविज्ञानं श्रुतिषु प्रतिपादितं |
मृदाद्यनेकदृष्टांतैस्तद्ब्रह्मेत्यवधारय || 32 ||
यदानंत्यं प्रतिज्ञाय श्रुतिस्तत्सिद्धये जगौ |
तत्कार्यत्वं प्रपंचस्य तद्ब्रह्मेत्यवधारय || 33 ||
विजिज्ञास्यतया यच्च वेदांतेषु मुमुक्षुभिः |
समर्थ्यतेऽतियत्नेन तद्ब्रह्मेत्यवधारय || 34 ||
जीवात्मना प्रवेशश्च नियंतृत्वं च तान्प्रति |
श्रूयते यस्य वेदेषु तद्ब्रह्मेत्यवधारय || 35 ||
कर्मणां फलदातृत्वं यस्यैव श्रूयते श्रुतौ |
जीवनां हेतुकर्तृत्वं तद्ब्रह्मेत्यवधारय || 36 ||
तत्त्वंपदार्थौ निर्णीतौ वाक्यार्थश्चिंत्यतेऽधुना |
तादात्म्यमत्र वाक्यार्थस्तयोरेव पदार्थयोः || 37 ||
संसर्गो वा विशिष्टो वा वाक्यार्थो नात्र संमतः |
अखंडैकरसत्वेन वाक्यार्थो विदुषां मतः || 38 ||
प्रत्यग्बोधो य आभाति सोऽद्वयानंदलक्षणः |
अद्वयानंदरूपश्च प्रत्यग्बोधैकलक्षणः || 39 ||
इत्थमन्योन्यतादात्म्यप्रतिपत्तिर्यदा भवेत् |
अब्रह्मत्वं त्वमर्थस्य व्यावर्तेत तदैव हि || 40 ||
तदर्थस्य च पारोक्ष्यं यद्येवं किं ततः शृणु |
पूर्णानंदैकरूपेण प्रत्यग्बोधोऽवतिष्ठते || 41 ||
तत्त्वमस्यादिवाक्यं च तादात्म्यप्रतिपादने |
लक्ष्यौ तत्त्वंपदार्थौ द्वावुपादाय प्रवर्तते || 42 ||
हित्वा द्वौ शबलौ वाच्यौ वाक्यं वाक्यार्थबोधने |
यथा प्रवर्ततेऽस्माभिस्तथा व्याख्यातमादरात् || 43 ||
आलंबनतया भाति योऽस्मत्प्रत्ययशब्दयोः |
अंतःकरणसंभिन्नबोधः स त्वंपदाभिधः || 44 ||
मायोपाधिर्जगद्योनिः सर्वज्ञत्वादिलक्षणः |
पारोक्ष्यशबलः सत्याद्यात्मकस्तत्पदाभिधः || 45 ||
प्रत्यक्परोक्षतैकस्य सद्वितीयत्वपूर्णता |
विरुध्यते यतस्तस्माल्लक्षणा संप्रवर्तते || 46 ||
मानांतरविरोधे तु मुख्यार्थस्यापरिग्रहे |
मुख्यार्थेनाविनाभूते प्रतीतिर्लक्षणोच्यते || 47 ||
तत्त्वमस्यादिवाक्येषु लक्षणा भागलक्षणा |
सोऽहमित्यादिवाक्यस्थपदयोरिव नापरा || 48 ||
अहं ब्रह्मेतिवाक्यार्थबोधो यावद्दृढी भवेत् |
शमादिसहितस्तावदभ्यसेच्छ्रवणादिकं || 49 ||
श्रुत्याचार्यप्रसादेन दृढो बोधो यदा भवेत् |
निरस्ताशेषसंसारनिदानः पुरुषस्तदा || 50 ||
विशीर्णकार्यकरणो भूतसूक्ष्मैरनावृतः |
विमुक्तकर्मनिगलः सद्य एव विमुच्यते || 51 ||
प्रारब्धकर्मवेगेन जीवन्मुक्तो यदा भवेत् |
किंचित्कालमनारब्धकर्मबंधस्य संक्षये || 52 ||
निरस्तातिशयानंदं वैष्णवं परमं पदं |
पुनरावृत्तिरहितं कैवल्यं प्रतिपद्यते || 53 ||
इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य श्रीगोविंदभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य श्रीमच्छंकरभगवतः कृतौ वाक्यवृत्तिः संपूर्णं |
अर्थ
'वाक्यवृत्तिः' अद्वैत वेदांत का एक उत्कृष्ट ग्रंथ है जो उपनिषदों के सार को, विशेष रूप से "तत्त्वमसि" (तुम वह हो) जैसे महावाक्यों के गहरे अर्थ को सरल और स्पष्ट तरीके से समझाता है। यह गुरु और शिष्य के बीच संवाद के रूप में रचा गया है, जिसका मुख्य उद्देश्य जीवात्मा और परमात्मा की एकता को स्थापित करना है। श्री आदि शंकराचार्य द्वारा रचित माना जाने वाला यह स्तोत्र, जीव को अपने वास्तविक स्वरूप को जानने के लिए आवश्यक समग्र ज्ञान प्रदान करता है। यह संसार के बंधनों से मुक्ति दिलाने वाले एकमात्र परम तत्व को जानने का मार्ग दिखाता है।
यह स्तोत्र भगवान श्री विष्णु को परब्रह्म स्वरूप के रूप में वर्णित करने से शुरू होता है। इसमें सृष्टि, स्थिति और प्रलय के हेतु, अचिन्त्य शक्ति वाले, विश्वेश्वर, अनंत मूर्ति, माया के बंधनों से मुक्त, अपार सुख के सागर श्रीवल्लभ के चरण कमलों को नमस्कार किया जाता है (श्लोक 1)। दूसरा श्लोक कहता है कि उन्हीं की कृपा से जीव स्वयं को विष्णु स्वरूप जान पाता है, जो आत्मज्ञान के महत्व पर जोर देता है। यह बताता है कि जिस परब्रह्म की कृपा से मैं स्वयं को विष्णु स्वरूप जानता हूँ और मुझमें ही सब कुछ कल्पित है, उस सदात्मरूप के चरण कमलों को मैं नित्य प्रणाम करता हूँ।
सांसारिक त्रिविध तापों (आध्यात्मिक, आधिभौतिक, आधिदैविक) से पीड़ित एक शिष्य, इन बंधनों से सहज मुक्ति पाने का मार्ग खोजते हुए शमादि साधनों से युक्त सद्गुरु के पास पहुँचता है (श्लोक 3-4)। गुरु शिष्य के प्रश्न का उत्तर देते हुए स्पष्ट रूप से घोषित करते हैं कि "तत्त्वमसि" महावाक्य ही मुक्ति का एकमात्र साधन है। वे समझाते हैं कि जीव और परमात्मा के बीच अभेद ज्ञान ही मुक्ति प्रदान करता है (श्लोक 5-6)। शिष्य फिर पूछता है, "जीव कौन है? परमात्मा कौन है? उनका अभेद कैसे है? और महावाक्य इसे कैसे प्रतिपादित करता है?" क्योंकि उसे पदार्थों का अर्थ तो स्पष्ट है, पर वाक्य का अर्थ अभी भी स्पष्ट नहीं है।
गुरु शिष्य को आत्मा के स्वरूप का विस्तृत वर्णन करते हैं। वे कहते हैं, "तुम शरीर नहीं हो, इंद्रियाँ नहीं हो, मन नहीं हो, बुद्धि नहीं हो, प्राण नहीं हो। इन सभी को देखने वाली साक्षी चेतना ही तुम हो।" वे उदाहरण देते हैं: जैसे दीपक पात्र को प्रकाशित करता है, लेकिन वह पात्र नहीं है, वैसे ही शरीर को प्रकाशित करने वाली साक्षी चेतना तुम हो। स्वप्न, जाग्रत और सुषुप्ति अवस्थाएँ आती-जाती रहती हैं, लेकिन इन सभी को देखने वाला 'मैं' (साक्षी) अचल रहता है। गुरु बताते हैं कि यह साक्षी चेतना निर्विकार, नित्य, शुद्ध ज्ञान आनंद स्वरूप, सर्वज्ञ, सर्वांतर्यामी, सर्वकर्ता, सर्वपालक और माया-उपाधि रहित परब्रह्म है। यही परब्रह्म 'तत्', 'त्वं' और 'असि' पदों का अखंड अर्थ है।
इस गहन उपदेश के माध्यम से, शिष्य अपने वास्तविक स्वरूप को समझता है। "तत्त्वमसि" महावाक्य के आंतरिक अर्थ को श्रवण, मनन और निदिध्यासन के माध्यम से दृढ़ करने से, बंधन समाप्त हो जाते हैं। जब ज्ञान दृढ़ हो जाता है, तो जीव जीवन्मुक्त हो जाता है। प्रारब्ध कर्मों के समाप्त होने के बाद, वह कैवल्य मोक्ष, यानी परम विष्णु पद को प्राप्त करता है। इस प्रकार, वाक्यवृत्तिः आत्म-साक्षात्कार का मार्ग सुगमता से दिखाता है और अखंड ज्ञानानंद स्वरूप का अनुभव करने में मदद करता है।
लाभ (Benefits):
- सांसारिक बंधनों से मुक्ति: इस स्तोत्र के अध्ययन और मनन से जीव अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानकर संसार के मायावी बंधनों से मुक्त हो जाता है। यह दुख और पुनर्जन्म के चक्र से मुक्ति दिलाता है।
- आत्मज्ञान की प्राप्ति: गुरु-शिष्य संवाद के माध्यम से 'तत्त्वमसि' महावाक्य के गहरे अर्थ को समझकर आत्मज्ञान प्राप्त करने में सहायता मिलती है। यह अहंकार और अज्ञान को दूर करता है।
- मानसिक शांति और आनंद: स्वयं को शरीर और मन से भिन्न शुद्ध चेतना जानकर, बाहरी दुनिया के उतार-चढ़ावों से उत्पन्न दुखों का निवारण होता है और नित्य शांति तथा आनंद की प्राप्ति होती है।
- भय का निवारण: मृत्यु, रोग और दुखों के प्रति भय आत्मस्वरूप के ज्ञान से दूर होता है, क्योंकि आत्मा नित्य और अविनाशी है, यह बोध होता है।
- जीवन्मुक्ति की प्राप्ति: इस ज्ञान को दृढ़ता से अनुष्ठान करने से जीवन्मुक्ति की स्थिति प्राप्त होती है, जिससे व्यक्ति सदैव आनंद में स्थित रहता है और शरीर में रहते हुए भी बंधन रहित जीवन जीता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
वाक्यवृत्ति क्या है?
वाक्यवृत्ति स्तोत्र का पाठ कब/कैसे करना चाहिए?
वाक्यवृत्ति के अध्ययन से क्या लाभ हैं?
वाक्यवृत्ति स्तोत्र का अध्ययन किसे करना चाहिए?
वाक्यवृत्ति स्तोत्र का अध्ययन कितनी बार करना चाहिए?
वाक्यवृत्ति स्तोत्र का मूल/स्रोत क्या है?
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