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श्री त्रिपुरसुंदरी प्रातः स्मरणं

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स्तोत्र
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श्री त्रिपुरसुंदरी प्रातः स्मरणं

प्रातर्नमामि जगतां जनन्याश्चरणांबुजं |
श्रीमत्त्रिपुरसुंदर्या वंदिताया हरादिभिः || 1 ||

प्रातस्त्रिपुरसुंदर्याः व्रजामि चरणांबुजं |
हरिर्हरो विरिंचिश्च सृष्ट्यादीन् कुरुते यया || 2 ||

प्रातस्त्रिपुरसुंदर्याः नमामि पदपंकजं |
यत्पाद्यमंबु शिरसि भाति गंगा महेशितुः || 3 ||

प्रातः पाशांकुश शर चापहस्तां नमाम्यहं |
उद्यदादित्यसंकाशां श्रीमत्त्रिपुरसुंदरीं || 4 ||

प्रातर्नमामि पादाब्जं ययेदं भासते जगत् |
तस्यास्त्रिपुरसुंदर्याः यत्प्रसादान्निवर्तते || 5 ||

यः श्लोक पंचकमिदं प्रातर्नित्यं पठेन्नरः |
तस्मै दद्यादात्मपदं श्रीमत्त्रिपुरसुंदरी || 6 ||

त्रैलोक्यचैतन्यमये परेशि
श्रीनाथनित्ये भवदाज्ञयैव |
प्रातः समुत्थाय तव प्रियार्थं
संसारयात्रामनुवर्तयिष्ये || 7 ||

संसारयात्रामनुवर्तमानं
त्वदाज्ञाया श्रीत्रिपुरे परेशि |
स्पर्धा तिरस्कार कलिप्रमाद
भयानि मामभिभवंतु मातः || 8 ||

जानामि धर्मं न च मे प्रवृत्तिः
जानाम्यधर्मं न च मे निवृत्तिः |
त्वया हृषीकेशि हृदिस्थयाऽहं
यथा नियुक्तोऽस्मि तथा करोमि || 9 ||

इति श्री त्रिपुरसुंदरी प्रातः स्मरणं |

अर्थ

श्री त्रिपुरसुंदरी प्रातः स्मरणं एक पवित्र और लघु स्तुति है, जिसे भक्त दिन की शुरुआत में, सुबह उठते ही देवी त्रिपुरसुंदरी का स्मरण करने के लिए पाठ करते हैं। यह स्तोत्र देवी के चरण कमलों को समर्पित है और उनकी दिव्य शक्ति तथा करुणा का गुणगान करता है। यह दिन भर के लिए आध्यात्मिक संरेखण और मानसिक शांति प्रदान करता है, जिससे जीवन की चुनौतियों का सामना करने के लिए आत्मिक शक्ति मिलती है।

त्रिपुरसुंदरी देवी दस महाविद्याओं में से एक हैं, जो अत्यंत सुंदर और सौम्य रूप में प्रकट होती हैं। वे सृष्टि, स्थिति और संहार की परम शक्ति हैं। सुबह के समय उनका स्मरण करने से हमारा पूरा दिन उनकी दिव्य कृपा से भर जाता है। यह स्तोत्र केवल शब्दों का पाठ नहीं है, बल्कि देवी के साथ पूर्ण एकत्व स्थापित करने का एक गहरा आध्यात्मिक अभ्यास है, जिससे जीवन में मार्गदर्शन और सुरक्षा प्राप्त होती है। यह आंतरिक शांति और स्पष्टता लाता है।

पहले श्लोक में, भक्त जगत्जननी श्री त्रिपुरसुंदरी देवी के चरण कमलों को प्रणाम करता है। इसमें बताया गया है कि हरि (विष्णु), हर (शिव) और विरिंचि (ब्रह्मा) जैसे देवता भी उन्हीं को वंदन करते हैं, जो उनकी सर्वोच्चता को दर्शाता है। दूसरे श्लोक में, भक्त श्री त्रिपुरसुंदरी के चरण कमलों का आश्रय लेता है, जिनके द्वारा हरि, हर और विरिंचि सृष्टि आदि के कार्य करते हैं। यह दर्शाता है कि देवी के चरण ही समस्त ब्रह्मांड के चक्र को चलाने वाली मूल शक्ति हैं। तीसरा श्लोक देवी के चरणों की पवित्रता को उजागर करता है। इसमें कहा गया है कि उनके चरणों का जल, जो पाद्य के रूप में अर्पित किया जाता है, वह महेश्वर (भगवान शिव) के मस्तक पर गंगा के रूप में सुशोभित होता है। यह देवी की असीम करुणा और उनके चरणों की अद्वितीय पवित्रता को दर्शाता है। चौथे श्लोक में, भक्त पाश, अंकुश, बाण और धनुष धारण किए हुए, उगते हुए सूर्य के समान तेजस्वी श्री त्रिपुरसुंदरी देवी के रूप का स्मरण कर उन्हें प्रणाम करता है। यह उनके दिव्य और शक्तिशाली स्वरूप का वर्णन करता है। पांचवां श्लोक कहता है कि यह समस्त जगत् देवी के चरण कमलों से ही प्रकाशित होता है। भक्त दृढ़ता से विश्वास करता है कि उनकी कृपा से ही संसार के शोक, भय और सांसारिक क्लेश दूर होते हैं।

छठा श्लोक इस स्तोत्र के फल को बताता है। जो व्यक्ति इन पांच श्लोकों का प्रतिदिन सुबह उत्साहपूर्वक पाठ करता है, उसे श्री त्रिपुरसुंदरी देवी 'आत्मपद' प्रदान करती हैं, जिसका अर्थ है आध्यात्मिक जागृति, भक्ति और मोक्ष की स्थिति। अंतिम दो श्लोक पूर्ण शरणागति का भाव व्यक्त करते हैं। "हे त्रैलोक्यचैतन्यमयी, परेशी, श्रीनाथ नित्ये, आपकी आज्ञा से ही मैं सुबह उठकर आपके प्रिय कार्य के लिए संसार यात्रा को जारी रखूँगा। हे श्री त्रिपुरे, परेशी, आपकी आज्ञा से संसार यात्रा को अनुवर्तित करते हुए, स्पर्धा, तिरस्कार, कलि (कलह), प्रमाद और भय मुझे अभिभूत न करें, माँ! मैं धर्म को जानता हूँ फिर भी उसका आचरण नहीं कर पाता, अधर्म को जानता हूँ फिर भी उसे छोड़ नहीं पाता; आप मेरे हृदय में जैसा नियुक्त करती हैं, मैं वैसा ही करता हूँ।" यह भक्त की देवी पर पूर्ण निर्भरता और समर्पण की भावना को दर्शाता है और दिव्य इच्छा के प्रति पूर्ण समर्पण सिखाता है।

लाभ (Benefits):

  • मानसिक शांति और स्थिरता: सुबह के स्मरण से दिन भर मन में शांति और स्थिरता बनी रहती है, जिससे मानसिक स्पष्टता और एकाग्रता बढ़ती है।
  • भय और चिंता से मुक्ति: देवी की कृपा से भय, चिंता, दुख और सांसारिक बंधनों से मुक्ति मिलती है, और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है, जिससे जीवन में आशा और साहस बढ़ता है।
  • धर्माचरण में शक्ति: धर्म के मार्ग पर चलने, सही निर्णय लेने और पापों से बचने के लिए शक्ति और साहस प्राप्त होता है, जिससे नैतिक और आध्यात्मिक जीवन में सुधार होता है।
  • आध्यात्मिक जागृति: श्री त्रिपुरसुंदरी देवी की विशेष कृपा से आंतरिक जागृति, भक्ति और आध्यात्मिक प्रगति संभव होती है, जो आत्मज्ञान की ओर मार्गदर्शन करती है।
  • सुरक्षा और समृद्धि: स्पर्धा, तिरस्कार, प्रमाद और भय से सुरक्षा मिलती है, जिससे जीवन में समृद्धि, संतोष और खुशी आती है, और दिव्य शक्ति से जीवन के सभी क्षेत्रों में सफलता मिलती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

श्री त्रिपुरसुंदरी प्रातः स्मरणं क्या है?
श्री त्रिपुरसुंदरी प्रातः स्मरणं एक भक्तिमय स्तोत्र है जिसे दिन की शुरुआत में, देवी त्रिपुरसुंदरी का स्मरण करने के लिए रचा गया है। यह देवी के चरण कमलों को पूर्ण समर्पण व्यक्त करता है और उनकी दिव्य शक्ति व करुणा का गुणगान करता है।
इस स्तोत्र का पाठ कब करना चाहिए?
इस स्तोत्र का पाठ प्रतिदिन सुबह, स्नान आदि से निवृत्त होकर शुद्ध मन से करना चाहिए। यह दिन भर सकारात्मक ऊर्जा और देवी की दिव्य सुरक्षा प्रदान करता है, मन को शांत रखता है।
श्री त्रिपुरसुंदरी प्रातः स्मरणं के पाठ से क्या लाभ होते हैं?
इस स्तोत्र के पाठ से मन को शांति, स्थिरता, भय और चिंताओं से मुक्ति, धर्म के मार्ग पर चलने की शक्ति और आध्यात्मिक प्रगति प्राप्त होती है। देवी की कृपा से सांसारिक क्लेश दूर होते हैं।
इस स्तोत्र का पाठ कौन कर सकता है?
श्री त्रिपुरसुंदरी देवी में श्रद्धा और भक्ति रखने वाला कोई भी व्यक्ति, लिंग भेद के बिना, इस स्तोत्र का पाठ कर सकता है। विशेष रूप से आध्यात्मिक उन्नति और मानसिक शांति चाहने वालों के लिए यह अत्यंत लाभकारी है।
इस स्तोत्र का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
इस स्तोत्र में कुल आठ श्लोक हैं, जिसमें कहा गया है कि जो व्यक्ति पहले पाँच श्लोकों का प्रतिदिन पाठ करता है, उसे देवी 'आत्मपद' प्रदान करती हैं। अतः, प्रतिदिन कम से कम एक बार पूरे स्तोत्र का पाठ करना उत्तम है।
श्री त्रिपुरसुंदरी प्रातः स्मरणं का मूल क्या है?
श्री त्रिपुरसुंदरी प्रातः स्मरणं के सटीक मूल के बारे में विशिष्ट जानकारी उपलब्ध नहीं है, लेकिन यह शक्ति उपासना का एक हिस्सा है और प्राचीन संस्कृत स्तोत्रों में से एक है। ऐसे प्रातः स्मरण अक्सर विभिन्न देवी पुराणों या तंत्र ग्रंथों से प्रेरित होते हैं।

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