श्री विष्णु स्तोत्रं (शिवपुराणे)
देवा ऊचुः |
हृषीकेश महाबाहो भगवन् मधुसूदन |
नमस्ते देवदेवेश सर्वदैत्यविनाशक || 1 ||
मत्स्यरूपाय ते विष्णो वेदान्नीतवते नमः |
सत्यव्रतेन सद्राज्ञा प्रलयाब्धिविहारिणे || 2 ||
कुर्वाणानां सुराणां च मंथनायोद्यमं भृशं |
बिभ्रते मंदरगिरिं कूर्मरूपाय ते नमः || 3 ||
नमस्ते भगवन्नाथ क्रतवे सूकरात्मने |
वसुंधरां जनाधारां मूर्धतो बिभ्रते नमः || 4 ||
वामनाय नमस्तुभ्यमुपेंद्राख्याय विष्णवे |
विप्ररूपेण दैत्येंद्रं बलिं छलयते विभो || 5 ||
नमः परशुरामाय क्षत्रनिःक्षत्रकारिणे |
मातुर्हितकृते तुभ्यं कुपितायासतां द्रुहे || 6 ||
रामाय लोकरामाय मर्यादापुरुषाय ते |
रावणांतकरायाशु सीतायाः पतये नमः || 7 ||
नमस्ते ज्ञानगूढाय कृष्णाय परमात्मने |
राधाविहारशीलाय नानालीलाकराय च || 8 ||
नमस्ते गूढदेहाय वेदनिंदाकराय च |
योगाचार्याय जैनाय बौद्धरूपाय मापते || 9 ||
नमस्ते कल्किरूपाय म्लेच्छानामंतकारिणे |
अनंतशक्तिरूपाय सद्धर्मस्थापनाय च || 10 ||
नमस्ते कपिलरूपाय देवहूत्यै महात्मने |
वदते सांख्ययोगं च सांख्याचार्याय वै प्रभो || 11 ||
नमः परमहंसाय ज्ञानं संवदते परं |
विधात्रे ज्ञानरूपाय येनात्मा संप्रसीदति || 12 ||
वेदव्यासाय वेदानां विभागं कुर्वते नमः |
हिताय सर्वलोकानां पुराणरचनाय च || 13 ||
एवं मत्स्यादितनुभिर्भक्तकार्योद्यताय ते |
सर्गस्थितिध्वंसकर्त्रे नमस्ते ब्रह्मणे प्रभो || 14 ||
आर्तिहंत्रे स्वदासानां सुखदाय शुभाय च |
पीतांबराय हरये तार्क्ष्ययानाय ते नमः |
सर्वक्रियायैककर्त्रे शरण्याय नमो नमः || 15 ||
दैत्यसंतापितामर्त्यदुःखादिध्वंसवज्रक |
शेषतल्पशयायार्कचंद्रनेत्राय ते नमः || 16 ||
कृपासिंधो रमानाथ पाहि नः शरणागतान् |
जलंधरेण देवाश्च स्वर्गात् सर्वे निराकृताः || 17 ||
सूर्यो निस्सारितः स्थानाच्चंद्रो वह्निस्तथैव च |
पातालान्नागराजश्च धर्मराजो निराकृतः || 18 ||
विचरंति यथा मर्त्याः शोभंते नैव ते सुराः |
शरणं ते वयं प्राप्ता वधस्तस्य विचिंत्यतां || 19 ||
इति श्रीशिवपुराणे रुद्रसंहितायां युद्धखंडे षोडशोऽध्याये सर्वदेव कृत श्री विष्णु स्तोत्रं ||
अर्थ
श्री विष्णु स्तोत्रं (शिवपुराणे) एक अत्यंत शक्तिशाली और महत्वपूर्ण प्रार्थना है, जिसे सभी देवताओं ने मिलकर भगवान विष्णु की स्तुति करने और दैत्य जालंधर से अपनी रक्षा के लिए किया था। यह स्तोत्र भगवान विष्णु की अनंत महिमाओं, उनके विभिन्न अवतारों और लोक कल्याण के लिए किए गए उनके दिव्य कार्यों का अद्भुत वर्णन करता है। इसमें भगवान को हृषीकेश, मधुसूदन, समस्त दैत्यों का विनाशक और देवों के देव के रूप में स्तुति की गई है। यह स्तोत्र भगवान की सर्वव्यापकता, संरक्षक गुण और धर्म की स्थापना के उद्देश्य को उजागर करता है।
देवता सर्वप्रथम भगवान विष्णु के मत्स्य अवतार की स्तुति करते हैं, जिसमें उन्होंने प्रलयकाल में सत्यव्रत महाराज की रक्षा की और वेदों का संरक्षण किया। इसके पश्चात्, कूर्म अवतार का वर्णन है, जहाँ उन्होंने मंदराचल पर्वत को अपनी पीठ पर धारण करके देवताओं और असुरों को क्षीरसागर का मंथन करने में सहायता की थी। वराह रूप में, उन्होंने पृथ्वी को अपने मस्तक पर धारण करके प्रलय से बचाया और सृष्टि में स्थिरता पुनः स्थापित की। वामन अवतार में, उन्होंने दैत्यराज बलि के अभिमान को भंग किया और तीन पग में तीनों लोकों को मापकर धर्म की स्थापना की, जिससे वे उपेन्द्र के नाम से भी विख्यात हुए।
परशुराम अवतार में, उन्होंने क्रूर क्षत्रियों के आतंक का अंत करके लोक को धर्म का पाठ पढ़ाया। राम अवतार में, उन्होंने रावण का संहार किया, सीता माता के परम पति बने और मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में लोक में धर्म की स्थापना की। कृष्ण अवतार में, राधा के साथ उनकी लीलाएँ, यादव वंश की रक्षा, महाभारत युद्ध में पांडवों का मार्गदर्शन और परमात्मा के रूप में उनके अनेक दिव्य कार्य अत्यंत सुंदर ढंग से वर्णित हैं। देवता यह भी स्वीकार करते हैं कि वेदों की निंदा करने वाले और भ्रमित मनों को सही मार्ग दिखाने के लिए भगवान ने बुद्ध और जैन गुरु के रूप में भी अवतार लिया। कलयुग के अंत में कल्कि रूप में आकर अधर्म का नाश कर सद्धर्म को पुनः स्थापित करने की उनकी महिमा का भी स्मरण किया गया है।
कपिल मुनि के रूप में उन्होंने सांख्य योग का गहन ज्ञान प्रदान किया, और वेदव्यास के रूप में उन्होंने वेदों का विभाजन किया तथा पुराणों की रचना की, जिससे लोक कल्याण हो सके। इस स्तोत्र में मत्स्य से लेकर कल्कि तक सभी अवतारों को भक्तों की रक्षा और धर्म की स्थापना के लिए बताया गया है। अंत में, देवता शेषनाग पर शयन कर रहे, सूर्य और चंद्रमा को नेत्रों के रूप में धारण करने वाले, पीतांबरधारी और गरुड़ पर आरूढ़ भगवान हरि की शरण लेते हैं। दैत्य जालंधर ने जब सभी देवताओं को स्वर्ग से निकाल दिया था और सूर्य, चंद्र, अग्नि, नागराज, यमराज जैसे देवता भी अपने स्थान खोकर शक्तिहीन हो गए थे, तब देवताओं ने भगवान विष्णु की शरण लेकर उनसे जालंधर के संहार की प्रार्थना की थी। यह स्तोत्र भगवान विष्णु को जगत के हितकर्ता, धर्म के संस्थापक, शरणागत वत्सल और नित्य रक्षक के रूप में प्रस्तुत करता है।
लाभ (Benefits):
- शत्रु बाधा से मुक्ति: इस स्तोत्र के नियमित पाठ से शत्रुओं से उत्पन्न होने वाली बाधाएं और बुरी शक्तियों का प्रभाव नष्ट होता है। भगवान विष्णु की कृपा से साधक को सुरक्षा मिलती है।
- आपदाओं से रक्षा: जीवन में आने वाली कठिनाइयों, बाधाओं और संकटों से मुक्ति पाने के लिए यह स्तोत्र अत्यंत प्रभावी है। भगवान अपने भक्तों को सभी प्रकार की विपत्तियों से बचाते हैं।
- धर्म और न्याय की स्थापना: चूंकि भगवान विष्णु धर्म के रक्षक हैं, इस स्तोत्र का पाठ करने से व्यक्ति को धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा मिलती है और जीवन में न्याय की स्थापना होती है।
- ज्ञान और आध्यात्मिक विकास: भगवान के विभिन्न अवतारों और उनकी लीलाओं का स्मरण करने से ज्ञान में वृद्धि होती है और साधक आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त करता है।
- समस्त मनोकामनाओं की पूर्ति: भगवान विष्णु पर पूर्ण श्रद्धा और भक्ति के साथ इस स्तोत्र का पाठ करने से भक्तों की सभी इच्छाएं पूर्ण होती हैं और जीवन में शांति व समृद्धि आती है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
श्री विष्णु स्तोत्रं (शिवपुराणे) क्या है?
इस स्तोत्र का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
श्री विष्णु स्तोत्रं के पाठ के क्या लाभ हैं?
इस स्तोत्र का पाठ कौन कर सकता है?
इस स्toत्र का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
इस स्तोत्र का मूल स्रोत क्या है?
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