श्री विष्णु स्तवनं
मार्कंडेय उवाच |
नरं नृसिंहं नरनाथमच्युतं
प्रलंबबाहुं कमलायतेक्षणं |
क्षितीश्वरैरर्चितपादपंकजं
नमामि विष्णुं पुरुषं पुरातनं || 1 ||
जगत्पतिं क्षीरसमुद्रमंदिरं
तं शार्ङ्गपाणिं मुनिवृंदवंदितं |
श्रियः पतिं श्रीधरमीशमीश्वरं
नमामि गोविंदमनंतवर्चसं || 2 ||
अजं वरेण्यं जनदुःखनाशनं
गुरुं पुराणं पुरुषोत्तमं प्रभुं |
सहस्रसूर्यद्युतिमंतमच्युतं
नमामि भक्त्या हरिमाद्यमाधवं || 3 ||
पुरस्कृतं पुण्यवतां परां गतिं
क्षितीश्वरं लोकपतिं प्रजापतिं |
परं पराणामपि कारणं हरिं
नमामि लोकत्रयकर्मसाक्षिणं || 4 ||
भोगे त्वनंतस्य पयोदधौ सुरः
पुरा हि शेते भगवाननादिकृत् |
क्षीरोदवीचीकणिकांबुनोक्षितं
तं श्रीनिवासं प्रणतोऽस्मि केशवं || 5 ||
यो नारसिंहं वपुरास्थितो महान्
सुरो मुरारिर्मधुकैटभांतकृत् |
समस्तलोकार्तिहरं हिरण्यकं
नमामि विष्णुं सततं नमामि तं || 6 ||
अनंतमव्यक्तमतींद्रियं विभुं
स्वे स्वे हि रूपे स्वयमेव संस्थितं |
योगेश्वरैरेव सदा नमस्कृतं
नमामि भक्त्या सततं जनार्दनं || 7 ||
आनंदमेकं विरजं विदात्मकं
वृंदालयं योगिभिरेव पूजितं |
अणोरणीयांसमवृद्धिमक्षयं
नमामि भक्तप्रियमीश्वरं हरिं || 8 ||
इति श्रीनरसिंहपुराणे दशमोऽध्याये मार्कंडेय प्रोक्त श्रीविष्णु स्तवनं |
अर्थ
महर्षि मार्कण्डेय द्वारा रचित श्री विष्णु स्तवनं, भगवान विष्णु की अनंत महिमा और दिव्य स्वरूप का गुणगान करने वाला एक अत्यंत श्रेष्ठ स्तोत्र है। यह स्तोत्र आठ श्लोकों से युक्त है, और प्रत्येक श्लोक भगवान के विशिष्ट गुणों, अवतारों तथा भक्तों पर उनकी कृपा का वर्णन करता है। यह भक्तों को मन की शांति, पापों से मुक्ति और श्रीहरि की अनुकंपा प्राप्त करने का मार्ग दिखाता है। भगवान विष्णु सृष्टि, स्थिति और संहार के मूल कारण हैं, और यह स्तवन उस परम शक्ति को विभिन्न आयामों से स्तुति करता है।
यह स्तवन भगवान विष्णु को अनादि पुरुष, नर रूप में नरसिंह, नरनाथ, अच्युत, विशाल भुजाओं वाले और कमल के समान नेत्रों वाले के रूप में वर्णित करता है। राजाओं और ऋषियों द्वारा पूजित चरण-कमलों वाले इस पुरातन पुरुष को नमस्कार किया जाता है। जगत के स्वामी, क्षीरसागर में निवास करने वाले, शार्ङ्ग धनुष धारण करने वाले, मुनियों द्वारा वंदित, लक्ष्मीपति, श्रीधर, गोविंद और अनंत तेज से प्रकाशित उस विष्णु को प्रणाम अर्पित किए जाते हैं। अजन्मा, भक्तों की इच्छाओं को पूरा करने वाले, लोगों के दुखों का नाश करने वाले, गुरु, पुरुषोत्तम, सहस्र सूर्यों के समान कांति वाले अच्युत, माधव रूपी हरि को भक्तिपूर्वक नमस्कार किया जाता है।
पुण्यात्माओं की परम गति, भूलोकाधिपति, प्रजापति, समस्त सृष्टि के कारण स्वरूप हरि, तीनों लोकों के कर्मों के साक्षी को निरंतर नमस्कार है। अनंत शेषनाग पर क्षीरसागर में शयन करने वाले भगवान श्रीनिवास, क्षीरसागर की लहरों के जल कणों से भीगे हुए केशव को प्रणाम अर्पित किए जाते हैं। नरसिंह का रूप धारण कर मधु-कैटभ असुरों का संहार करने वाले, समस्त लोक की पीड़ा हरने वाले महान मुरारी, हिरण्यकशिपु का वध करने वाले उस विष्णु को निरंतर नमस्कार किया जाता है। अनंत, अव्यक्त, इंद्रियों से परे, अपने ही स्वरूप में स्थित रहने वाले, योगेश्वरों द्वारा सदा पूजित जनार्दन को भक्तिपूर्वक नमस्कार किया जाता है।
आनंद स्वरूप, निर्मल, योगियों द्वारा वृंदावन में पूजित, भक्तों को प्रिय, शाश्वत, सूक्ष्म से भी सूक्ष्म और विशाल से भी विशाल परमात्मा हरि को सदा नमस्कार है। इस स्तोत्र के माध्यम से भगवान विष्णु के अनेक गुणों, उनके अवतारों की महिमा और जगत के पालन में उनकी भूमिका का स्मरण किया जाता है। इस स्तवन का पाठ करने से मन को शांति, आध्यात्मिक उन्नति और भगवान की कृपा प्राप्त करने का सौभाग्य मिलता है। यह भक्तों के मन में भगवान के प्रति प्रेम और श्रद्धा बढ़ाता है, जीवन की चुनौतियों का सामना करने का साहस प्रदान करता है।
लाभ (Benefits):
- मन की शांति: इस स्तोत्र के निरंतर पाठ से मन शांत होता है, आंतरिक शांति मिलती है और तनाव कम होता है।
- पापों का नाश: भगवान विष्णु के नामस्मरण और स्तवन से जाने-अनजाने में किए गए पापों का नाश होता है, आत्मा शुद्ध होती है।
- दैवीय कृपा: श्रीहरि की कृपा प्राप्त होती है, जीवन में आने वाली कठिनाइयों से मुक्ति मिलती है और सभी शुभ फल प्राप्त होते हैं।
- मनोकामना पूर्ति: भक्तिपूर्वक इस स्तोत्र का पाठ करने वालों की भगवान विष्णु उनकी सद्भावनापूर्ण इच्छाओं को पूर्ण करते हैं। धर्मसम्मत इच्छाएं पूरी होती हैं।
- आध्यात्मिक उन्नति: भगवान के स्वरूप और गुणों का ध्यान करने से आध्यात्मिक ज्ञान बढ़ता है, जिससे मोक्ष मार्ग की ओर बढ़ने में सहायता मिलती है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
श्री विष्णु स्तवनं क्या है?
श्री विष्णु स्तवनं का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
श्री विष्णु स्तवनं का पाठ करने से क्या लाभ होते हैं?
श्री विष्णु स्तवनं का पाठ कौन कर सकता है?
श्री विष्णु स्तवनं का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
श्री विष्णु स्तवनं का मूल स्रोत क्या है?
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