श्री विष्णु पंजर स्तोत्रं
विनियोगः –
अस्य श्रीविष्णुपंजरस्तोत्रमंत्रस्य नारद ऋषिः अनुष्टुप् छंदः श्रीविष्णुः परमात्मा देवता अहं बीजं सोऽहं शक्तिः ॐ ह्रीं कीलकं मम सर्वदेहरक्षणार्थं जपे विनियोगः ||
ऋष्यादिन्यासः –
नारद ऋषये नमः मुखे |
श्रीविष्णुपरमात्मदेवतायै नमः हृदये |
अहं बीजं गुह्ये |
सोऽहं शक्तिः पादयोः |
ॐ ह्रीं कीलकं पादाग्रे |
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रैं ह्रौं ह्रः इति मंत्रः |
करन्यासः –
ॐ ह्रां अंगुष्ठाभ्यां नमः |
ॐ ह्रीं तर्जनीभ्यां नमः |
ॐ ह्रूं मध्यमाभ्यां नमः |
ॐ ह्रैं अनामिकाभ्यां नमः |
ॐ ह्रौं कनिष्ठिकाभ्यां नमः |
ॐ ह्रः करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः |
हृदयादिन्यासः –
ॐ ह्रां हृदयाय नमः |
ॐ ह्रीं शिरसे स्वाहा |
ॐ ह्रूं शिखायै वषट् |
ॐ ह्रैं कवचाय हुं |
ॐ ह्रौं नेत्रत्रयाय वौषट् |
ॐ ह्रः अस्त्राय फट् |
अहंबीजप्राणायामं मंत्रत्रयेण कुर्यात् |
अथ ध्यानं |
परं परस्मात् प्रकृतेरनादि-
-मेकं निविष्टं बहुधा गुहायां |
सर्वालयं सर्वचराचरस्थं
नमामि विष्णुं जगदेकनाथं || 1 ||
अथ पंजर स्तोत्रं |
ॐ || विष्णुपंजरकं दिव्यं सर्वदुष्टनिवारणं |
उग्रतेजो महावीर्यं सर्वशत्रुनिकृंतनं || 2 ||
त्रिपुरं दहमानस्य हरस्य ब्रह्मणोदितं |
तदहं संप्रवक्ष्यामि आत्मरक्षाकरं नृणां || 3 ||
पादौ रक्षतु गोविंदो जंघे चैव त्रिविक्रमः |
ऊरू मे केशवः पातु कटिं चैव जनार्दनः || 4 ||
नाभिं चैवाच्युतः पातु गुह्यं चैव तु वामनः |
उदरं पद्मनाभश्च पृष्ठं चैव तु माधवः || 5 ||
वामपार्श्वं तथा विष्णुर्दक्षिणं मधुसूदनः |
बाहू वै वासुदेवश्च हृदि दामोदरस्तथा || 6 ||
कंठं रक्षतु वाराहः कृष्णश्च मुखमंडलं |
माधवः कर्णमूले तु हृषीकेशश्च नासिके || 7 ||
नेत्रे नारायणो रक्षेल्ललाटं गरुडध्वजः |
कपोलौ केशवो रक्षेद्वैकुंठः सर्वतोदिशं || 8 ||
श्रीवत्सांकश्च सर्वेषामंगानां रक्षको भवेत् |
पूर्वस्यां पुंडरीकाक्ष आग्नेय्यां श्रीधरस्तथा || 9 ||
दक्षिणे नारसिंहश्च नैरृत्यां माधवोऽवतु |
पुरुषोत्तमो मे वारुण्यां वायव्यां च जनार्दनः || 10 ||
गदाधरस्तु कौबेर्यामीशान्यां पातु केशवः |
आकाशे च गदा पातु पाताले च सुदर्शनं || 11 ||
सन्नद्धः सर्वगात्रेषु प्रविष्टो विष्णुपंजरः |
विष्णुपंजरविष्टोऽहं विचरामि महीतले || 12 ||
राजद्वारेऽपथे घोरे संग्रामे शत्रुसंकटे |
नदीषु च रणे चैव चोरव्याघ्रभयेषु च || 13 ||
डाकिनीप्रेतभूतेषु भयं तस्य न जायते |
रक्ष रक्ष महादेव रक्ष रक्ष जनेश्वर || 14 ||
रक्षंतु देवताः सर्वा ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः |
जले रक्षतु वाराहः स्थले रक्षतु वामनः || 15 ||
अटव्यां नारसिंहश्च सर्वतः पातु केशवः |
दिवा रक्षतु मां सूर्यो रात्रौ रक्षतु चंद्रमाः || 16 ||
पंथानं दुर्गमं रक्षे सर्वमेव जनार्दनः |
रोगविघ्नहतश्चैव ब्रह्महा गुरुतल्पगः || 17 ||
स्त्रीहंता बालघाती च सुरापो वृषलीपतिः |
मुच्यते सर्वपापेभ्यो यः पठेन्नात्र संशयः || 18 ||
अपुत्रो लभते पुत्रं धनार्थी लभते धनं |
विद्यार्थी लभते विद्यां मोक्षार्थी लभते गतिं || 19 ||
आपदो हरते नित्यं विष्णुस्तोत्रार्थसंपदा |
यस्त्विदं पठते स्तोत्रं विष्णुपंजरमुत्तमं || 20 ||
मुच्यते सर्वपापेभ्यो विष्णुलोकं स गच्छति |
गोसहस्रफलं तस्य वाजपेयशतस्य च || 21 ||
अश्वमेधसहस्रस्य फलं प्राप्नोति मानवः |
सर्वकामं लभेदस्य पठनान्नात्र संशयः || 22 ||
जले विष्णुः स्थले विष्णुर्विष्णुः पर्वतमस्तके |
ज्वालामालाकुले विष्णुः सर्वं विष्णुमयं जगत् || 23 ||
इति श्रीब्रह्मांडपुराणे इंद्रनारदसंवादे श्री विष्णु पंजर स्तोत्रं ||
अर्थ
श्री विष्णु पंजर स्तोत्र, जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, भगवान विष्णु का एक दिव्य सुरक्षा कवच है। यह एक अत्यंत शक्तिशाली स्तोत्र है जो दुष्ट शक्तियों का नाश करता है और शत्रुओं पर विजय दिलाता है। यह गुप्त रक्षा मंत्र स्वयं भगवान शिव ने सृष्टि के रचयिता ब्रह्माजी को भक्तों की सुरक्षा हेतु प्रदान किया था। नारद महर्षि इस स्तोत्र के ऋषि हैं, अनुष्टुप् छंद में रचित है, और श्री विष्णु परमात्मा इसके देवता हैं। 'अहं' बीज, 'सोऽहं' शक्ति और 'ॐ ह्रीं' कीलक के साथ यह स्तोत्र संपूर्ण देह की रक्षा के लिए जपा जाता है। इस स्तोत्र का पाठ करने वाले भक्त संपूर्ण शरीर में विष्णु की दिव्य ऊर्जा से सुरक्षित हो जाते हैं, चाहे वे भूमि पर हों, आकाश में हों या जल में हों।
यह स्तोत्र विस्तार से बताता है कि भगवान के विभिन्न स्वरूप हमारे शरीर के प्रत्येक अंग की किस प्रकार रक्षा करते हैं। गोविन्द हमारे चरणों की, त्रिविक्रम जंघाओं की, केशव ऊरुओं की और जनार्दन कमर की रक्षा करते हैं। अच्युत नाभि की, वामन गुप्त अंगों की, पद्मनाभ उदर की और माधव पृष्ठभाग की रक्षा करते हैं। विष्णु हमारे बाएँ भाग की, मधुसूदन दाएँ भाग की, वासुदेव भुजाओं की और दामोदर हृदय की रक्षा करते हैं। वराह कंठ की, कृष्ण मुखमंडल की, माधव कानों की और हृषीकेश नासिका की रक्षा करते हैं। नारायण नेत्रों की, गरुड़ध्वज ललाट की, केशव मुख की और वैकुंठ सभी दिशाओं से हमारी रक्षा करते हैं।
केवल शरीर के अंगों की ही नहीं, यह स्तोत्र सभी दिशाओं से भी भगवान की सुरक्षा सुनिश्चित करता है। पूर्व में पुंडरीकाक्ष, आग्नेय में श्रीधर, दक्षिण में नरसिंह, नैऋत्य में माधव, पश्चिम में पुरुषोत्तम, वायव्य में जनार्दन, कुबेर दिशा में गदाधर और ईशान में केशव हमारी रक्षा करते हैं। जल में वराह, पृथ्वी पर वामन, वन क्षेत्रों में नरसिंह, दिन में सूर्य और रात में चंद्रमा के रूप में भगवान विष्णु हमारी रक्षा करते हैं। यह 'विष्णु पंजर' एक दिव्य कवच है, जिसे धारण करने वाला किसी भी भय, रोग, आघात या अपशकुन का सामना नहीं करता। राक्षस, बुरी आत्माएँ, चोर या किसी भी प्रकार के खतरे से पूर्ण सुरक्षा मिलती है।
इस स्तोत्र का पाठ केवल शारीरिक सुरक्षा ही नहीं, बल्कि आध्यात्मिक और भौतिक लाभ भी प्रदान करता है। यह गौसहस्र दान, शत वाजपेय यज्ञ और सहस्र अश्वमेध यज्ञों के समान पुण्य प्रदान करता है। जो भक्त नियमित रूप से इस स्तोत्र का पाठ करते हैं, वे शुद्ध, समृद्ध और सभी प्रकार से सुरक्षित रहते हैं। अंततः, भक्त विष्णुलोक की प्राप्ति करते हैं, जो मोक्ष का सर्वोच्च मार्ग है।
लाभ (Benefits):
- समस्त पापों का नाश: स्त्रीहत्या, ब्रह्महत्या, गुरुद्रोह जैसे महापाप भी इस स्तोत्र के पाठ से नष्ट हो जाते हैं।
- संतान प्राप्ति: निःसंतान दंपति को सद्गुणी संतान की प्राप्ति होती है, जिससे वंश वृद्धि होती है।
- धन और समृद्धि: धन की इच्छा रखने वालों को धन की प्राप्ति होती है, आर्थिक समस्याएँ दूर होती हैं और समृद्धि आती है।
- ज्ञान और विद्या: विद्यार्थियों को ज्ञान की वृद्धि होती है और शिक्षा में सफलता मिलती है। मोक्ष की कामना करने वालों को परम गति प्राप्त होती है।
- पूर्ण सुरक्षा: शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक सुरक्षा मिलती है। बुरी शक्तियों, चोरों, शत्रुओं और सभी प्रकार के संकटों से मुक्ति मिलती है।
- महायज्ञों का फल: इस स्तोत्र का पाठ हजारों अश्वमेध और वाजपेय यज्ञों के समान पुण्य प्रदान करता है।
- विष्णुलोक की प्राप्ति: निष्ठापूर्वक पाठ करने वाले भक्त अंततः विष्णुलोक को प्राप्त करते हैं और मोक्ष के अधिकारी बनते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
श्री विष्णु पंजर स्तोत्रं क्या है?
इस स्तोत्र का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
श्री विष्णु पंजर स्तोत्रं के पाठ से क्या प्रमुख लाभ मिलते हैं?
यह स्तोत्र किसे पढ़ना चाहिए?
इस स्तोत्र का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
इस स्तोत्र का उद्गम या इतिहास क्या है?
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