श्री विष्णु हृदय स्तोत्रं
अस्य श्री विष्णु हृदय स्तोत्रस्य संकर्षण ऋषिः, अनुष्टुप् त्रिष्टुप् गायत्री च यथायोगं छंदः, श्रीमहाविष्णुः परमात्मा देवता, भगवत्प्रीत्यर्थे जपे विनियोगः
संकर्षणः उवाच –
ममाग्रतस्सदा विष्णुः पृष्ठतश्चापि केशवः |
गोविंदो दक्षिणे पार्श्वे वामे च मधुसूधनः ||1||
उपरिष्टात्तु वैकुंठो वराहः पृथिवीतले |
अवांतरदिशो यास्स्युः तासु सर्वासु माधवः ||2||
गच्छतस्तिष्ठतो वापि जाग्रतस्स्वप्नतोऽपि वा |
नरसिंहकृता गुप्तिः वासुदेवमयो ह्यहं ||3||
अव्यक्तं चैवास्य योनौ वदंति
व्यक्तं तेऽहं दीर्घमायुर्गतिं च |
वह्निं वक्त्रं चंद्रसूर्यौ च नेत्रे
दिशश्श्रोत्रे प्राणमाहुश्च वायुं ||4||
वाचं वेदा हृदयं वै नभश्च
पृथ्वी पादौ तारका रोमकूपाः |
सांगोपांगा ह्यधिदेवता च विद्या
ह्युपस्थं ते सर्व एते समुद्राः ||5||
तं देवदेवं शरणं प्रजानां
यज्ञात्मकं सर्वलोक प्रतिष्ठं |
यज्ञं वरेण्यं वरदं वरिष्ठं
ब्रह्माणमीशं पुरुषं नमस्ते ||6||
आद्यं पुरुषमीशानं पुरुहूतं पुरुष्टुतं |
ऋतेमेकाक्षरं ब्रह्म व्यक्ताव्यक्तं सनातनं ||7||
महाभारतकाख्यानं कुरुक्षेत्रं सरस्वतीं |
केशवं गांच गंगांच कीर्तयन्नावसीदति ||8||
ॐ भूः पुरुषाय पुरुषरूपाय वासुदेवाय नमो नमः |
ॐ भुवः पुरुषाय पुरुषरूपाय वासुदेवाय नमो नमः |
ॐ सुवः पुरुषाय पुरुषरूपाय वासुदेवाय नमो नमः |
ॐ भूर्भुवस्सुवः पुरुषाय पुरुषरूपाय वासुदेवाय नमो नमः |
ॐ प्रद्युम्नाय पुरुषाय वासुदेवाय नमो नमः |
ॐ अनिरुद्धाय पुरुषाय वासुदेवाय नमो नमः |
ॐ भवोद्भवाय पुरुषाय वासुदेवाय नमो नमः |
ॐ केशवाय पुरुषाय वासुदेवाय नमो नमः |
ॐ नारायणाय पुरुषाय वासुदेवाय नमो नमः |
ॐ माधवाय पुरुषाय वासुदेवाय नमो नमः |
ॐ गोविंदाय पुरुषाय वासुदेवाय नमो नमः |
ॐ विष्णवे पुरुषाय वासुदेवाय नमो नमः |
ॐ मधुसूदनाय पुरुषाय वासुदेवाय नमो नमः |
ॐ त्रिविक्रमाय पुरुषाय वासुदेवाय नमो नमः |
ॐ वामनाय पुरुषाय वासुदेवाय नमो नमः |
ॐ श्रीधराय पुरुषाय वासुदेवाय नमो नमः |
ॐ हृषीकेशाय पुरुषाय वासुदेवाय नमो नमः |
ॐ पद्मनाभाय पुरुषाय वासुदेवाय नमो नमः |
ॐ दामोदराय पुरुषाय वासुदेवाय नमो नमः |
ॐ सत्याय पुरुषाय वासुदेवाय नमो नमः |
ॐ ईशानाय पुरुषाय वासुदेवाय नमो नमः |
ॐ तत्पुरुषाय पुरुषाय वासुदेवाय नमो नमः |
ॐ सत्पुरुषाय पुरुषाय वासुदेवाय नमो नमः |
ॐ प्रणवेंद्र विष्णो शतसहस्रनेत्रे पुरुषाय वासुदेवाय नमो नमः |
य इदं विष्णुहृदयमधीयते ब्रह्महत्यायाः पूतो भवति पतितसंभाषणात्पूतो भवति
सुरापानात्पूतो भवति सुवर्णस्तेयात्पूतो भवति असत्यभाषणात्पूतो भवति अगम्यागमनात्पूतो भवति वृषलीगमनात्पूतो भवति अभक्ष्यभक्षणात्पूतो भवति ब्रह्मचारी सुब्रह्मचारी भवति अनेक क्रतुसहस्रेणेष्टं भवति गायत्र्याः षष्टिसहस्राणि जप्तानि भवंति चत्वारो वेदाश्चाधीता भवंति सर्ववेदेषु ज्ञातो भवति सर्वतीर्थेषु स्नातो भवति। यदि कस्यचिन्नब्रूयाच्छ्वित्री भवति। अष्टौ ब्राह्मणाग् ग्राहयित्वा विष्णुलोकमाप्नोति मानसेन गतिर्भवति न नश्यति मंत्रः यत्र यत्रेच्छेत्तत्र तत्रोपजायते स्मरति चात्मानं भगवान्महाविष्णुरित्याह |
इति श्री विष्णुहृदयस्तोत्रं |
अर्थ
श्री विष्णु हृदय स्तोत्र भगवान श्रीहरि के सर्वव्यापक स्वरूप, उनके रक्षक गुण और परब्रह्म अवस्था का स्तवन करने वाला एक अत्यंत शक्तिशाली तथा पवित्र स्तोत्र है। इस स्तोत्र की रचना संकर्षण (बलराम) ऋषि ने की है। अनुष्टुप, त्रिष्टुप और गायत्री जैसे छंदों में रचित इस स्तोत्र के देवता श्रीमहाविष्णु परमात्मा हैं। इसका पाठ भगवान की प्रसन्नता और सभी प्रकार के कष्टों से मुक्ति पाने के लिए किया जाता है। यह स्तोत्र भक्त को भगवान के साथ एकरूप कर देता है और सभी दिशाओं से सुरक्षा प्रदान करता है।
स्तोत्र की शुरुआत में यह बताया गया है कि भगवान श्रीहरि सभी दिशाओं में किस प्रकार रक्षक बनकर खड़े हैं। संकर्षण ऋषि कहते हैं कि मेरे सामने विष्णु हों, पीछे केशव हों, दाहिनी ओर गोविंद हों और बाईं ओर मधुसूदन हों। ऊपर वैकुंठनाथ हों, पृथ्वी पर वराह रूप में हों और सभी अंतर दिशाओं में माधव मेरी रक्षा करें। चलते हुए, खड़े होते हुए, जागते हुए या सोते हुए भी, नरसिंह मेरी रक्षा करें। क्योंकि मैं स्वयं वासुदेवमय हूँ, यह घोषणा करके भक्त भगवान के साथ अपनी एकात्मता स्थापित करता है। यह भाग भगवान की निरंतर और सर्वव्यापी सुरक्षा पर जोर देता है।
आगे, भगवान के विश्व रूप का वर्णन किया गया है। अव्यक्त स्थिति उनका गर्भ है, व्यक्त रूप हमारा प्राण है। अग्नि उनकी वाणी है, चंद्रमा और सूर्य उनके नेत्र हैं, दिशाएँ उनके कान हैं, वायु उनकी श्वास है। वेद उनके वचन हैं, आकाश उनका हृदय है, पृथ्वी उनके चरण हैं, तारे उनके रोम हैं, ज्ञान उनकी शक्ति है और समुद्र उनका उपस्थान हैं। यह वर्णन दर्शाता है कि भगवान ही संपूर्ण ब्रह्मांड की सृष्टि, स्थिति और लय के कारणभूत परमात्मा हैं। यह उनकी सर्वव्यापकता और सर्वशक्तिमानता को उद्घोषित करता है।
यह स्तोत्र परब्रह्म स्वरूप भगवान विष्णु को शरणागति प्रदान करता है। समस्त प्रजा के आश्रयदाता, यज्ञ स्वरूप, संपूर्ण लोकों के आधार, वरदान देने वाले, श्रेष्ठ आदिपुरुष को नमस्कार है। वे सत्य स्वरूप हैं, व्यक्त और अव्यक्त रूपों में विद्यमान सनातन हैं। वे ही इस ब्रह्मांड के मूल कारण हैं। इस स्तोत्र में महाभारत, कुरुक्षेत्र, सरस्वती, केशव और गंगा नदी का स्मरण दुख दूर करता है। इसके अतिरिक्त, भूः, भुवः, सुवः जैसे वेदमूल मंत्रों से वासुदेव की स्तुति की जाती है और केशव, नारायण, माधव, गोविंद आदि विष्णु के 24 रूपों को "पुरुषाय वासुदेवाय नमो नमः" कहकर नमस्कार किया जाता है, जिससे भगवान की सर्वव्यापकता और भी पुष्ट होती है।
लाभ (Benefits):
- सभी पापों से मुक्ति: इस स्तोत्र का भक्तिपूर्वक पाठ करने से ब्रह्महत्या, सुरापान, असत्य बोलने और अन्य दुराचारों जैसे महापापों से भी मुक्ति मिलती है। यह आत्मा को शुद्ध करता है।
- यज्ञों का फल प्राप्त: हजारों यज्ञों को करने का फल इस स्तोत्र के पाठ से प्राप्त किया जा सकता है। यह भक्त को अपार पुण्य प्रदान करता है।
- गायत्री जप का पुण्य: लाखों गायत्री मंत्रों का जप करने जितना पुण्य इस विष्णु हृदय स्तोत्र का पाठ करने से मिलता है। यह वेदों के अध्ययन का फल भी प्रदान करता है।
- मोक्ष की प्राप्ति: इस स्तोत्र के नियमित पाठ से पुनर्जन्म के बंधनों से मुक्ति मिलती है और अंततः विष्णुलोक या मोक्ष की प्राप्ति संभव होती है।
- सर्वव्यापी सुरक्षा और शांति: यह भगवान विष्णु की सर्वव्यापी सुरक्षा सुनिश्चित करता है, मन को शांति, संतोष और साहस प्रदान करता है। यह दैनिक जीवन में सभी बाधाओं से रक्षा करता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
श्री विष्णु हृदय स्तोत्रं क्या है?
श्री विष्णु हृदय स्तोत्र का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
श्री विष्णु हृदय स्तोत्र का पाठ करने से क्या लाभ होते हैं?
श्री विष्णु हृदय स्तोत्र का पाठ कौन कर सकता है?
श्री विष्णु हृदय स्तोत्र का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
श्री विष्णु हृदय स्तोत्र की उत्पत्ति क्या है?
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