श्री विष्णोर्दिव्यस्थल स्तोत्रं
अर्जुन उवाच |
क्षेत्रेषु येषु येषु त्वं चिंतनीयो मयाच्युत |
चेतसः प्रणिधानार्थं तन्ममाख्यातुमर्हसि || 1 ||
यत्र यत्र च यन्नाम प्रीतये भवतः स्तुतौ |
प्रसादसुमुखो नाथ तन्ममाशेषतो वद || 2 ||
भगवानुवाच |
सर्वगः सर्वभूतोऽहं न हि किंचिन्मया विना |
चराचरे जगत्यस्मिन् विद्यते कुरुसत्तम || 3 ||
तथापि येषु स्थानेषु चिंतनीयोऽहमर्जुन |
स्तोतव्यो नामभिर्यैश्च श्रूयतां तद्वदामि ते || 4 ||
पुष्करे पुंडरीकाक्षं गयायां च गदाधरं |
लोहदंडे तथा विष्णुं स्तुवंस्तरति दुष्कृतं || 5 ||
राघवं चित्रकूटे तु प्रभासे दैत्यसूदनं |
बृंदावने च गोविंदं मां स्तुवन् पुण्यभाग्भवेत् || 6 ||
जयं जयंत्यां तद्वच्च जयंतं हस्तिनापुरे |
वराहं कर्दमाले तु काश्मीरे चक्रपाणिनं || 7 ||
जनार्दनं च कुब्जाम्रे मथुरायां च केशवं |
कुब्जके श्रीधरं तद्वद्गंगाद्वारे सुरोत्तमं || 8 ||
सालग्रामे महायोगिं हरिं गोवर्धनाचले |
पिंडारके चतुर्बाहुं शंखोद्धारे च शंखिनं || 9 ||
वामनं तु कुरुक्षेत्रे यमुनायां त्रिविक्रमं |
विश्वेश्वरं तथा शोणे कपिलं पूर्वसागरे || 10 ||
श्वेतद्वीपपतिं चापि गंगासागरसंगमे |
भूधरं देविकानद्यां प्रयागे चैव माधवं || 11 ||
नरनारायणाख्यं च तथा बदरिकाश्रमे |
समुद्रे दक्षिणे स्तव्यं पद्मनाभेति फाल्गुन || 12 ||
द्वारकायां तथा कृष्णं स्तुवंस्तरति दुर्गतिं |
रामं नाम महेंद्राद्रौ हृषीकेशं तथार्बुदे || 13 ||
अश्वतीर्थे हयग्रीवं विश्वरूपं हिमाचले |
नृसिंहं कृतसौचे च विपाशायां द्विजप्रियं || 14 ||
नैमिषे यज्ञपुरुषं जंबूमार्गे तथाच्युतं |
अनंतं सैंधवारण्ये दंडके शार्ङ्गधारिणं || 15 ||
उत्पलावर्तके शौरिं नर्मदायां श्रियः पतिं |
दामोदरं रैवतके नंदायां जलशायिनं || 16 ||
सर्वयोगेश्वरं चैव सिंधुसागरसंगमे |
सह्याद्रौ देवदेवेशं वैकुंठं मागधे वने || 17 ||
सर्वपापहरं विंध्ये चोड्रेषु पुरुषोत्तमं |
हृदये चापि कौंतेय परमात्मानमात्मनः || 18 ||
वटे वटे वैश्रवणं चत्वरे चत्वरे शिवं |
पर्वते पर्वते रामं सर्वत्र मधुसूदनं || 19 ||
नरं भूमौ तथा व्योम्नि कौंतेय गरुडध्वजं |
वासुदेवं च सर्वत्र संस्मरेज्ज्योतिषां पतिं || 20 ||
अर्चयन् प्रणमन् स्तुन्वन् संस्मरेश्च धनंजय |
एतेष्वेतानि नामानि नरः पापात् प्रमुच्यते || 21 ||
स्थानेष्वेतेषु मन्नाम्नामेतेषां प्रीणनं नरः |
द्विजानां प्रीणनं कृत्वा स्वर्गलोकेऽभिजायते || 22 ||
नामान्येतानि कौंतेय स्थानान्येतानि चात्मवान् |
जपन् वै पंचपंचाशत् त्रिसंध्यं मत्परायणः || 23 ||
त्रीणि जन्मानि यत्पापमवस्थात्रितये कृतं |
तत्क्षालयत्यसंदिग्धं जायते च सतां कुले || 24 ||
द्विकालं वा जपन्वैतद्दिवारात्रौ च यत्कृतं |
तस्माद्विमुच्यते पापात् संस्तुवन्परमो नरः || 25 ||
जप्तान्येतानि कौंतेय सकृच्छ्रद्धासमन्वितं |
मोचयंति नरं पापाद्यत्तत्रैव दिने कृतं || 26 ||
धन्यं यशस्यमायुष्यं जयं कुरु कुलोद्वह |
ग्रहानुकूलतां चैव करोत्याशु न संशयः || 27 ||
उपोषितो मत्परमः स्थानेष्वेतेषु मानवः |
कृतायतनवासश्च प्राप्नोत्यभिमतं फलं || 28 ||
उत्क्रांतिरप्यशेषेषु स्थानेष्वेतेषु शस्यते |
अन्यस्थानाच्छतगुणमेतेष्वनशनादिकं || 29 ||
यस्तु मत्परमः कालं करोत्येतेषु मानवः |
देवानामपि पूज्योऽसौ मम लोके महीयते || 30 ||
स्थानेष्वथैतेषु च ये वसंति
संपूजयंते मम सर्वकालं |
तदेह चांते त्रिदिवं प्रयांति
नाकं च लोकं समवाप्नुवंति || 34 ||
इति श्रीविष्णुधर्मोत्तरे तृतीयखंडे मार्कंडेयवज्रसंवादे अर्जुनं प्रति कृष्णोपदेशे स्थानविशेषकीर्तनमाहात्म्यवर्णनो नाम पंचविंशत्युत्तरशततमोऽध्यायः |
अर्थ
श्री विष्णोर्दिव्यस्थल स्तोत्रं भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दिया गया एक दिव्य उपदेश है। अर्जुन विनम्रतापूर्वक प्रभु से पूछते हैं: "हे अच्युत! मुझे किन-किन पवित्र क्षेत्रों में आपका ध्यान करना चाहिए? किन स्थानों पर आपके नाम का स्मरण अत्यंत प्रिय और आध्यात्मिक रूप से शक्तिशाली होता है?" कृष्ण पहले सार्वभौमिक सत्य का वर्णन करते हैं - "मुझसे रहित कोई स्थान नहीं है, यह संपूर्ण जगत मुझमें ही व्याप्त है।" फिर भी, भक्तों के मन को ध्यान में सहायता करने के लिए, वे कुछ विशेष स्थानों का वर्णन करने के लिए अर्जुन के भक्तिपूर्ण भाव को स्वीकार करते हैं। यह स्तोत्र भक्तों को पृथ्वी पर स्थित अनेक पवित्र स्थलों के माध्यम से परमात्मा तक पहुँचने के सरल, स्पष्ट और दिव्य भक्तिमय मार्ग बताता है।
श्रीकृष्ण इसके बाद एक-एक करके इन पवित्र स्थानों की सूची देते हैं। पुष्कर में पुंडरीकाक्ष, गया में गदाधर, चित्रकूट में राघव, वृंदावन में गोविंद - इस प्रकार प्रत्येक क्षेत्र एक विशेष दिव्य रूप से जुड़ा हुआ है। गंगाद्वार, शालग्राम, गोवर्धन, बदरिकाश्रम, कुरुक्षेत्र, प्रयाग, द्वारका, कपिल, नर्मदा, नैमिषारण्य जैसे स्थान भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय भक्ति क्षेत्र हैं। ये सभी स्थान लोक कल्याण, पापों का क्षय, ऐश्वर्य, रक्षा, शांति और भक्ति प्रदान करने की शक्ति से परिपूर्ण हैं। इन स्थानों पर भगवान विष्णु के विशिष्ट रूपों का स्मरण या पूजन अत्यंत शुभ माना जाता है। यह स्तोत्र केवल स्थानों की सूची नहीं है, बल्कि उन स्थानों पर निवास करने वाली भगवान की शक्ति का स्मरण है।
भगवान कृष्ण कहते हैं - "जो भक्त इन स्थानों में मेरे नाम का स्तवन करता है, प्रणाम करता है, या आचरण करता है, उसे पाप नहीं लगता। अनेक जन्मों के संचित दोष भी क्षीण हो जाते हैं। इन नामों का नित्य जप करने से, तीनों संध्याओं में पाठ करने से, या एक बार भी विश्वास के साथ उच्चारण करने से - उस दिन किए गए सभी पाप नष्ट हो जाते हैं।" भगवान अपने वचनों से यह स्पष्ट करते हैं कि स्थल-माहात्म्य इस प्रकार का महान फल प्रदान करता है। इस स्तोत्र का पाठ भक्तों को दैवी सान्निध्य प्रदान करता है और उनके मन को शुद्ध करता है।
अंत में, श्रीकृष्ण कहते हैं - "जो इन स्थानों का स्मरण करते हैं, इन क्षेत्रों में निवास करते हैं, या मेरी पूजा करते हैं - वे इस जीवन के समाप्त होते ही स्वर्ग लोक को प्राप्त होते हैं।" यह स्तोत्र केवल भौगोलिक स्थानों का नामकरण नहीं करता, बल्कि प्रत्येक स्थान में निहित परमात्मा की दिव्य शक्ति और उस शक्ति का स्मरण करने से प्राप्त होने वाले आध्यात्मिक लाभों को उजागर करता है। यह भक्त को भक्ति मार्ग पर आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करता है और सांसारिक बंधनों से मुक्ति प्राप्त करने में सहायता करता है।
लाभ (Benefits):
- पाप-क्षय और चिंताओं से मुक्ति: इस स्तोत्र का पाठ करने या इन पवित्र स्थलों का स्मरण करने से अनेक जन्मों के पाप नष्ट होते हैं और मानसिक चिंताएँ दूर होती हैं।
- ऐश्वर्य और सफलता: भगवान विष्णु की कृपा से भक्तों को जीवन में धन, समृद्धि, सौभाग्य और उत्तम सफलता प्राप्त होती है।
- ग्रह दोषों का निवारण और मन की शांति: ग्रहों के अशुभ प्रभाव कम होते हैं, और मन को शांति व स्थिरता प्राप्त होती है।
- विष्णु भक्ति और आध्यात्मिक उन्नति: भगवान विष्णु के प्रति भक्ति बढ़ती है, ध्यान में एकाग्रता आती है और आत्म-श्रद्धा विकसित होती है।
- रक्षा और प्रगति: पवित्र क्षेत्रों के स्मरण की शक्ति से भक्तों को दैवीय सुरक्षा मिलती है और जीवन के सभी क्षेत्रों में सर्वांगीण प्रगति होती है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
श्री विष्णोर्दिव्यस्थल स्तोत्रं क्या है?
इस स्तोत्र का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
श्री विष्णोर्दिव्यस्थल स्तोत्रं के पाठ से क्या लाभ होते हैं?
इस स्तोत्र का पाठ कौन कर सकता है?
इस स्तोत्र का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
इस स्तोत्र का उद्गम क्या है?
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