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श्री वश्य वाराही स्तोत्रं

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स्तोत्र
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ॐ अस्य श्री सर्व वशीकरण स्तोत्र मंत्रस्य
 नारद ऋषिःअनुष्टुप् छंदः
 श्री वश्यवाराही देवता 
 ऐं बीजं क्लीं शक्तिः ग्लौं कीलकं
 मम सर्ववश्यार्थे जपे विनियोगः 

ध्यानम् –
तारे तारिणि देवि विश्वजननि प्रौढप्रतापान्विते
तारे दिक्षु विपक्ष यक्ष दलिनि वाचा चला वारुणी |
लक्ष्मीकारिणि कीर्तिधारिणि महासौभाग्यसंदायिनि |
रूपं देहि यशश्च सततं वश्यं जगत्यावृतम् |

अथ स्तोत्रम् –

अश्वारूढे रक्तवर्णे स्मितसौम्यमुखांबुजे |
राज्यस्त्री सर्वजंतूनां वशीकरणनायिके || 1 ||

वशीकरणकार्यार्थं पुरा देवेन निर्मितम् |
तस्माद्वश्यवाराही सर्वान्मे वशमानय || 2 ||

यथा राजा महाज्ञानं वस्त्रं धान्यं महावसु |
मह्यं ददाति वाराहि यथात्वं वशमानय || 3 ||

अंतर्बहिश्च मनसि व्यापारेषु सभाषु च |
यथा मामेवं स्मरति तथा वश्यं वशं कुरु || 4 ||

चामरं दोलिकां छत्रं राजचिह्नानि यच्छति |
अभीष्ठं संप्रदोराज्यं यथा देवि वशं कुरु || 5 ||
मन्मथस्मरणाद्रामा रतिर्यातु मयासह |
स्त्रीरत्नेषु महत्प्रेम तथा जनयकामदे || 6 ||

मृग पक्ष्यादयाः सर्वे मां दृष्ट्वा प्रेममोहिताः |
अनुगच्छति मामेव त्वत्प्रसादाद्दयां कुरु || 7 ||
वशीकरणकार्यार्थं यत्र यत्र प्रयुंजति |
सम्मोहनार्थं वर्धित्वात्तत्कार्यं तत्र कर्षय || 8 ||

वशमस्तीति चैवात्र वश्यकार्येषु दृश्यते |
तथा मां कुरु वाराही वश्यकार्य प्रदर्शय || 9 ||
वशीकरण बाणास्त्रं भक्त्यापद्धिनिवारणम् |
तस्माद्वश्यवाराही जगत्सर्वं वशं कुरु || 10 ||

वश्यस्तोत्रमिदं देव्या त्रिसंध्यं यः पठेन्नरः |
अभीष्टं प्राप्नुयाद्भक्तो रमां राज्यं यथापिवः || 11 ||

इति अथर्वशिखायां वश्यवाराही स्तोत्रम् |

अर्थ

श्री वश्य वाराही स्तोत्रं आदि शक्ति के स्वरूप, श्री वाराही देवी को समर्पित एक अत्यंत शक्तिशाली स्तोत्र है। यह नारद ऋषि द्वारा रचित है और अनुष्टुप छंद में श्री वश्य वाराही देवी का आह्वान करता है। 'ऐं' बीज, 'क्लीं' शक्ति, 'ग्लौँ' कीलक के साथ, इस स्तोत्र का जप 'मम सर्ववश्यर्थे' अर्थात सभी जीवों, परिस्थितियों और बाधाओं को अपने अनुकूल बनाने के लिए समर्पित है। यह भक्तों को सम्मोहन शक्ति, ऐश्वर्य और शत्रुओं पर विजय प्रदान करने के उद्देश्य से है।

ध्यान श्लोक में वाराही देवी को तारा, तारिणी, विश्वजननी (विश्व की माता), प्रौढ़प्रतापान्विते (महान प्रतापी), विपक्ष यक्ष दलिनी (शत्रुओं और दुष्ट शक्तियों का नाश करने वाली) के रूप में वर्णित किया गया है। वह वाचा चला वारुणी (वाणी में चतुर, वारुणी के समान), लक्ष्मीकारिणी (धन प्रदान करने वाली), कीर्तिधारिणी (कीर्ति लाने वाली) और महासौभाग्यसंदायिनी (महान सौभाग्य प्रदान करने वाली) हैं। भक्त देवी से रूप, यश और जगत के वशीकरण की निरंतर याचना करता है, अपने जीवन में सकारात्मक प्रभाव की कामना करता है।

स्तोत्र का प्रथम श्लोक देवी के दिव्य स्वरूप का वर्णन करता है – अश्व पर आरूढ़, रक्तवर्णी, मंद मुस्कान से युक्त कमल जैसे मुख वाली। उन्हें राजाओं, स्त्रियों और समस्त जीवों को अपने वश में करने वाली नायिका घोषित किया गया है। द्वितीय श्लोक बताता है कि देवताओं ने वशीकरण कार्यों के लिए ही इस देवी का निर्माण किया था। अतः, भक्त वश्य वाराही देवी से प्रार्थना करता है कि वे सब कुछ उसके वश में कर दें। तृतीय श्लोक में, जिस प्रकार एक राजा महान ज्ञान, वस्त्र, धान्य और अपार धन का दान करता है, उसी प्रकार वाराही देवी से प्रार्थना की जाती है कि वे इन सभी को भक्त के लिए सुलभ और वश में कर दें। यह केवल भौतिक लाभों को ही नहीं, बल्कि ज्ञान और समृद्धि के सहज प्रवाह को भी इंगित करता है।

चौथा श्लोक प्रार्थना करता है कि मन के भीतर और बाहर, व्यापार में, सभाओं में, लोग भक्त को सदा स्मरण करें और उसके वश में रहें। यह सर्वत्र सम्मोहन और प्रभाव को दर्शाता है। पांचवां श्लोक (अधूरा) चामर, डोलिका, छत्र जैसे राजचिह्नों और अभीष्ट राज्य की प्राप्ति की इच्छा व्यक्त करता है। यह उच्च पद, अधिकार और सम्मान की प्राप्ति का सूचक है, व्यक्ति को समाज में नेतृत्व का स्थान प्राप्त करने में मदद करता है।

इस स्तोत्र में 'वशीकरण' शब्द का अर्थ केवल बलपूर्वक नियंत्रण नहीं है, बल्कि सम्मोहन, आकर्षण, सद्भावना और अनुकूल परिस्थितियों का निर्माण करने वाली दिव्य शक्ति से है। यह व्यक्ति के व्यक्तित्व में आकर्षक शक्ति को बढ़ाता है, जिससे समाज में सम्मान, अधिकार और सफलता प्राप्त होती है। वाराही देवी अपने भक्तों का मार्गदर्शन करती हैं, बाधाओं को दूर करती हैं और सुख-समृद्धि प्रदान करती हैं, जिससे भक्त का जीवन सर्वांगीण रूप से विकसित होता है।

लाभ (Benefits):

  • सर्व वशीकरण शक्ति: शत्रुओं, प्रतिकूल परिस्थितियों और मन को अपने अनुकूल बनाने में सहायता करता है, जिससे बाधाएं दूर होती हैं।
  • धन-संपत्ति और समृद्धि: व्यापार, नौकरी में सफलता, धन की वृद्धि और आर्थिक स्थिरता प्रदान करता है, जीवन में समृद्धि लाता है।
  • सामाजिक सम्मान और अधिकार: समाज में, कार्यक्षेत्र में सम्मान, प्रतिष्ठा और नेतृत्व के गुणों को बढ़ाता है, व्यक्ति के प्रभाव को बढ़ाता है।
  • शत्रु नाश और सुरक्षा: दुष्ट शक्तियों, बाधाओं और शत्रुओं से रक्षा करता है, भय को दूर करता है, भक्त को सुरक्षा प्रदान करता है।
  • मानसिक शांति और संतोष: देवी की कृपा से मन को शांति, सकारात्मकता और आंतरिक संतोष प्राप्त होता है, जीवन में सुख-शांति आती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

श्री वश्य वाराही स्तोत्रं क्या है?
श्री वश्य वाराही स्तोत्रं आदि शक्ति के स्वरूप, श्री वाराही देवी को समर्पित एक शक्तिशाली स्तोत्र है। इसका जप सभी प्राणियों और परिस्थितियों को अपने अनुकूल बनाने या वशीकरण के लिए किया जाता है।
इस स्तोत्र का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
इस स्तोत्र का पाठ नियमित रूप से, स्नान करके, देवी की प्रतिमा या चित्र के सामने दीपक जलाकर, एकाग्रता से करना चाहिए। शुक्रवार या मंगलवार से इसका आरंभ करना शुभ माना जाता है।
इस स्तोत्र के पाठ से क्या लाभ मिलते हैं?
इस स्तोत्र के जप से सर्व वशीकरण शक्ति, धन-संपत्ति, सामाजिक सम्मान, शत्रु नाश और मानसिक शांति प्राप्त होती है। यह जीवन में सकारात्मक बदलाव लाता है।
श्री वश्य वाराही स्तोत्रं किसे करना चाहिए?
जीवन में बाधाओं का सामना कर रहे लोग, करियर या व्यवसाय में सफलता चाहने वाले, सामाजिक प्रभाव बढ़ाना चाहने वाले और शत्रुओं से रक्षा चाहने वाले इस स्तोत्र का पाठ कर सकते हैं।
इस स्तोत्र का कितनी बार पाठ करना चाहिए?
इस स्तोत्र का प्रतिदिन कम से कम 11, 21, 51 या 108 बार जप करना उत्तम है। देवी की कृपा प्राप्त करने के लिए इसे लंबे समय तक श्रद्धापूर्वक जपना चाहिए।
इस स्तोत्र की उत्पत्ति क्या है?
यह स्तोत्र नारद ऋषि द्वारा रचित है और इसका उल्लेख प्राचीन तांत्रिक तथा वैदिक परंपराओं में मिलता है। यह श्री वाराही देवी की उपासना का एक महत्वपूर्ण अंग है।

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