देवि क्रोडमुखि त्वदंघ्रिकमलद्वंद्वानुरक्तात्मने
मह्यं द्रुह्यति यो महेशि मनसा कायेन वाचा नरः |
तस्याशु त्वदयोग्रनिष्ठुरहलाघातप्रभूतव्यथा-
-पर्यस्यन्मनसो भवंतु वपुषः प्राणाः प्रयाणोन्मुखाः || 1 ||
देवि त्वत्पदपद्मभक्तिविभवप्रक्षीणदुष्कर्मणि
प्रादुर्भूतनृशंसभावमलिनां वृत्तिं विधत्ते मयि |
यो देही भुवने तदीयहृदयान्निर्गत्वरैर्लोहितैः
सद्यः पूरयसे कराब्जचषकं वांछाफलैर्मामपि || 2 ||
चंडोत्तुंडविदीर्णदंष्ट्रहृदयप्रोद्भिन्नरक्तच्छटा
हालापानमदाट्टहासनिनदाटोपप्रतापोत्कटम् |
मातर्मत्परिपंथिनामपहृतैः प्राणैस्त्वदंघ्रिद्वयं
ध्यानोद्दामरवैर्भवोदयवशात्संतर्पयामि क्षणात् || 3 ||
श्यामां तामरसाननांघ्रिनयनां सोमार्धचूडां जग-
-त्त्राणव्यग्रहलायुधाग्रमुसलां संत्रासमुद्रावतीम् |
ये त्वां रक्तकपालिनीं हरवरारोहे वराहाननां
भावैः संदधते कथं क्षणमपि प्राणंति तेषां द्विषः || 4 ||
विश्वाधीश्वरवल्लभे विजयसे या त्वं नियंत्र्यात्मिका
भूतांता पुरुषायुषावधिकरी पाकप्रदाकर्मणाम् |
त्वां याचे भवतीं किमप्यवितथं यो मद्विरोधीजन-
-स्तस्यायुर्मम वांछितावधिभवेन्मातस्तवैवाज्ञया || 5 ||
मातः सम्यगुपासितुं जडमतिस्त्वां नैव शक्नोम्यहं
यद्यप्यन्वितदैशिकांघ्रिकमलानुक्रोशपात्रस्य मे |
जंतुः कश्चन चिंतयत्यकुशलं यस्तस्य तद्वैशसं
भूयाद्देवि विरोधिनो मम च ते श्रेयः पदासंगिनः || 6 ||
वाराही व्यथमानमानसगलत्सौख्यं तदाशाबलिं
सीदंतं यमपाकृताध्यवसितं प्राप्ताखिलोत्पादितम् |
क्रंदद्बंधुजनैः कलंकिततुलं कंठव्रणोद्यत्कृमि
पश्यामि प्रतिपक्षमाशु पतितं भ्रांतं लुठंतं मुहुः || 7 ||
वाराही त्वमशेषजंतुषु पुनः प्राणात्मिका स्पंदसे
शक्तिव्याप्तचराचरा खलु यतस्त्वामेतदभ्यर्थये |
त्वत्पादांबुजसंगिनो मम सकृत्पापं चिकीर्षंति ये
तेषां मा कुरु शंकरप्रियतमे देहांतरावस्थितिम् || 8 ||
इति श्री वाराहीनिग्रहाष्टकम् |
अर्थ
श्री वाराही निग्रहाष्टकम् एक अत्यंत शक्तिशाली स्तोत्र है जो दुष्ट शक्तियों, शत्रुओं और सभी प्रकार के नकारात्मक प्रभावों से सुरक्षा प्राप्त करने के लिए श्री वाराही देवी की प्रार्थना करता है। वाराही देवी सप्त मातृकाओं में से एक हैं, जो भगवान विष्णु के वराह अवतार की शक्ति स्वरूपिणी हैं। वह अपने भक्तों को सभी आपदाओं से बचाने के लिए एक उग्र रूप धारण करती हैं। यह अष्टकम् देवी से प्रार्थना करता है कि वे उन सभी को कठोर दंड दें जो उनके भक्तों को किसी भी तरह से नुकसान पहुंचाने का प्रयास करते हैं, जिससे भक्त निर्भय और शांतिपूर्ण जीवन जी सकें। यह केवल शत्रुओं के विनाश के लिए ही नहीं, बल्कि आंतरिक अरिषड्वर्गों (काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर) के निग्रह के लिए भी सहायक है।
यह स्तोत्र भक्त को हानि पहुँचाने वालों के विरुद्ध देवी के उग्र रूप का आह्वान करता है। पहले श्लोक में, भक्त प्रार्थना करता है कि जो लोग मन, शरीर या वाणी से उसे धोखा देते हैं, उनके प्राण देवी के भयंकर हल के प्रहार से उत्पन्न तीव्र पीड़ा से निकल जाएँ। दूसरे श्लोक में, भक्त कहता है कि देवी के चरण कमलों की भक्ति से जिसके दुष्कर्म नष्ट हो गए हैं, यदि कोई उसके प्रति दुर्भावना रखता है, तो उसके हृदय से रक्त निकलकर देवी के कर-कमल में स्थित प्याले को भर दे और भक्त को उसकी इच्छा के फल प्राप्त हों। यह देवी की शरण में आए हुए लोगों के लिए पूर्ण सुरक्षा और शत्रुओं के लिए कठोर दंड सुनिश्चित करता है।
तीसरा श्लोक वाराही देवी के उग्र स्वरूप का वर्णन करता है। वह अपने दाँतों से शत्रुओं के हृदयों को विदीर्ण करती हैं, रक्त का पान करती हैं और मद से भरा अट्टहास करती हैं। भक्त प्रतिज्ञा करता है कि वह अपने शत्रुओं के प्राणों को देवी के चरणों में समर्पित करेगा और उनके भयानक चीखों से देवी को तृप्त करेगा। यह देवी की भक्ति में अटूट विश्वास और शत्रुओं के विनाश में पूर्ण आस्था को दर्शाता है। चौथा श्लोक श्यामला वर्ण वाली, कमल के समान मुख, चरण और नेत्रों वाली, अर्धचंद्र को मुकुट में धारण करने वाली, जगत की रक्षा के लिए हल और मूसल धारण करने वाली, भय उत्पन्न करने वाली, रक्त कपाल धारण करने वाली, वराह मुखी देवी के रूप का ध्यान करने वालों के शत्रुओं का एक क्षण भी जीवित रहना कैसे संभव है, यह प्रश्न करता है।
इस स्तोत्र का पाठ केवल बाहरी शत्रुओं से सुरक्षा प्रदान नहीं करता, बल्कि आंतरिक रूप से मन में छिपे भय, अहंकार और नकारात्मक गुणों को नियंत्रित करने में भी मदद करता है। श्री वाराही देवी का यह उग्र रूप अंततः धर्म की रक्षा और सज्जनों की सुरक्षा के लिए होता है। उनकी आराधना भक्तों को साहस, धैर्य और सभी बाधाओं का सामना करने की शक्ति प्रदान करती है। यह भक्त को आध्यात्मिक रूप से सशक्त बनाता है और जीवन में सफलता तथा शांति लाता है।
लाभ (Benefits):
- शत्रु निग्रह और सुरक्षा: इस स्तोत्र का नियमित पाठ करने से शत्रुओं से होने वाली परेशानियाँ दूर होती हैं और सभी प्रकार की बुरी शक्तियों तथा नकारात्मक प्रभावों से पूर्ण सुरक्षा प्राप्त होती है।
- आत्मविश्वास और साहस में वृद्धि: वाराही देवी की उग्र शक्ति का स्मरण करने से भक्तों में अटूट आत्मविश्वास और किसी भी चुनौती का सामना करने का साहस उत्पन्न होता है।
- बाधाओं का निवारण: जीवन में आने वाली सभी बाधाएँ, विघ्न और दुष्ट ग्रह पीड़ाएँ इस स्तोत्र के प्रभाव से दूर होती हैं।
- इच्छित फल की प्राप्ति: देवी की कृपा से भक्तों की सभी सकारात्मक इच्छाएँ पूरी होती हैं और जीवन में समृद्धि तथा खुशी प्राप्त होती है।
- आंतरिक शुद्धि: यह बाहरी शत्रुओं के निग्रह के साथ-साथ, मन में स्थित अरिषड्वर्गों और नकारात्मक गुणों को नियंत्रित कर आंतरिक शुद्धि में भी सहायक होता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
श्री वाराही निग्रहाष्टकम् क्या है?
इस स्तोत्र का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
श्री वाराही निग्रहाष्टकम् का पाठ करने के प्रमुख लाभ क्या हैं?
किसे श्री वाराही निग्रहाष्टकम् का पाठ करना चाहिए?
इस स्तोत्र का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
इस स्तोत्र का मूल या उद्गम क्या है?
टिप्पणियाँ
टिप्पणी लिखने के लिए लॉगिन करें
टिप्पणियाँ लोड हो रही हैं...
