ईश्वर उवाच |
मातर्जगद्रचननाटकसूत्रधार-
-स्त्वद्रूपमाकलयितुं परमार्थतोऽयम् |
ईशोऽप्यमीश्वरपदं समुपैति तादृक्
कोऽन्यः स्तवं किमिव तावकमादधातु || 1 ||
नामानि किंतु गृणतस्तव लोकतुंडे
नाडंबरं स्पृशति दंडधरस्य दंडः |
यल्लेशलंबितभवांबुनिधिर्यतोऽयत्
त्वन्नामसंस्मृतिरियं न नुनः स्तुतिस्ते || 2 ||
त्वच्चिंतनादरसमुल्लसदप्रमेया-
-ऽऽनंदोदयात्समुदितः स्फुटरोमहर्षः |
मातर्नमामि सुदिनानि सदेत्यमुं त्वा-
-मभ्यर्थयेऽर्थमिति पूरयताद्दयालो || 3 ||
इंद्रेंदुमौलिविधिकेशवमौलिरत्न-
-रोचिश्चयोज्ज्वलितपादसरोजयुग्मे |
चेतो नतौ मम सदा प्रतिबिंबिता त्वं
भूया भवानि भवनाशिनि भावये त्वाम् || 4 ||
लीलोद्धृतक्षितितलस्य वराहमूर्ते-
-र्वाराहमूर्तिरखिलार्थकरी त्वमेव |
प्रालेयरश्मिसुकलोल्लसितावतंसा
त्वं देवि वामतनुभागहरा हरस्य || 5 ||
त्वामंब तप्तकनकोज्ज्वलकांतिमंत-
-र्ये चिंतयंति युवतीतनु मागलांताम् |
चक्रायुधां त्रिनयनां वरपोतृवक्त्रां
तेषां पदांबुजयुगं प्रणमंति देवाः || 6 ||
त्वत्सेवनस्खलितपापचयस्य मात-
-र्मोक्षोऽपि यस्य न सतो गणनामुपैति |
देवासुरोरगनृपूजितपादपीठः
कस्याः श्रियः स खलु भाजनतां न धत्ते || 7 ||
किं दुष्करं त्वयि मनोविषयं गतायां
किं दुर्लभं त्वयि विधानुवदर्चितायाम् |
किं दुर्भरं त्वयि सकृत् स्मृतिमागतायां
किं दुर्जयं त्वयि कृतस्तुतिवादपुंसाम् || 8 ||
इति श्री वाराह्यनुग्रहाष्टकम् |
अर्थ
श्री वाराह्यनुग्रहाष्टकं स्तोत्र आदि शक्ति के उग्र रूपों में से एक, श्री वाराही देवी की स्तुति में एक अत्यंत शक्तिशाली अष्टक है। यह स्तोत्र भगवान शिव द्वारा देवी पार्वती को वाराही देवी की महिमा का वर्णन करने वाले संवाद के रूप में प्रस्तुत किया गया है। वाराही देवी को सप्तमातृकाओं में से एक माना जाता है और वे भगवान विष्णु के वराह अवतार का स्त्री रूप हैं। यह अष्टक भक्तों को देवी की परम शक्ति, नाम स्मरण के महत्व और उनके आशीर्वाद से प्राप्त होने वाले लाभों के बारे में बताता है।
पहले श्लोक में, स्वयं भगवान शिव वाराही देवी की महिमा का गुणगान करते हैं। वे कहते हैं, 'हे माता, आप इस ब्रह्मांडीय नाटक की सूत्रधार हैं। आपके वास्तविक स्वरूप को समझने में मैं, स्वयं ईश्वर भी असमर्थ हो जाता हूँ। तब कोई और कैसे आपकी स्तुति कर सकता है?' यह कथन वाराही देवी की अकल्पनीय शक्ति और सर्वोच्चता को दर्शाता है। दूसरे श्लोक में, केवल वाराही देवी के नाम स्मरण के महत्व पर प्रकाश डाला गया है। 'जो लोग भक्तिपूर्वक आपके नामों का जप करते हैं, उन्हें यमराज का दंड स्पर्श नहीं करता। संसार रूपी सागर आपकी शक्ति के एक अंश से ही टिका हुआ है। इसलिए, आपके नाम का स्मरण मात्र ही स्तुति नहीं, बल्कि परम सुरक्षा कवच है।' यह श्लोक मृत्यु के भय और संसार के बंधनों से मुक्ति दिलाने में देवी के नाम की शक्ति को उजागर करता है।
तीसरे श्लोक में, देवी के चिंतन से उत्पन्न होने वाले आनंद का वर्णन किया गया है। 'हे माता, आपके भक्तिपूर्ण चिंतन से उत्पन्न होने वाले अप्रमेय आनंद से मेरे शरीर में रोमांच हो जाता है। हे दयालु देवी, मैं आपसे प्रार्थना करता हूँ कि मेरे ये दिन सदैव शुभ रहें और आप मेरी सभी मनोकामनाएँ पूर्ण करें।' यह श्लोक आंतरिक शांति और इच्छाओं की पूर्ति के लिए देवी से प्रार्थना करने का तरीका बताता है। चौथे श्लोक में, देवी के चरण कमलों की महिमा का वर्णन है। 'इंद्र, चंद्रमौली (शिव), ब्रह्मा और केशव (विष्णु) के मुकुट रत्नों की चमक से प्रकाशित आपके चरण कमलों में मेरा मन सदैव प्रतिबिंबित रहे। हे भवानी, संसार के बंधनों को नष्ट करने वाली, मैं आपका ध्यान करता हूँ।' यह श्लोक देवी के दिव्य गौरव को दर्शाता है, जिनकी पूजा सभी प्रमुख देवता करते हैं, और निरंतर स्मरण एवं मुक्ति के लिए प्रार्थना करता है।
पांचवें श्लोक में, वाराही देवी को भगवान वराह की शक्ति का प्रतीक बताया गया है। 'आप ही वाराही स्वरूप हैं, जो सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करती हैं, जिन्होंने लीलापूर्वक पृथ्वी को उठाया था (जैसे भगवान वराह ने)। हे देवी, शीतल किरणों वाले चंद्रमा से सुशोभित आप, हर (शिव) के वाम भाग को धारण करने वाली देवी हैं।' यह दर्शाता है कि वाराही देवी न केवल एक स्वतंत्र देवी हैं, बल्कि वे विष्णु और शिव की शक्ति के साथ अविभाज्य रूप से जुड़ी हुई हैं। इस स्तोत्र का भक्तिपूर्वक पाठ करने से भक्त सभी प्रकार के शुभ फल प्राप्त करते हैं, कष्टों से मुक्ति पाते हैं और अंततः मोक्ष मार्ग पर अग्रसर होते हैं।
लाभ (Benefits):
- शत्रु नाश और सुरक्षा: वाराही देवी शत्रुओं और नकारात्मक शक्तियों का नाश करने वाली देवी हैं। इस अष्टक का पाठ करने से शत्रु भय दूर होता है और पूर्ण सुरक्षा प्राप्त होती है।
- मनोकामना पूर्ति: देवी के दयालु स्वरूप की स्तुति करने से भक्तों की सभी न्यायोचित इच्छाएँ और मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं।
- आर्थिक समृद्धि: वाराही देवी धन और समृद्धि की भी देवी हैं, इसलिए उनके आशीर्वाद से आर्थिक समस्याओं से मुक्ति मिलती है और धन लाभ होता है।
- स्वास्थ्य और दीर्घायु: देवी की कृपा से उत्तम स्वास्थ्य, रोगों से मुक्ति और दीर्घायु की प्राप्ति होती है।
- मानसिक शांति और भय मुक्ति: देवी के नाम स्मरण और ध्यान से मानसिक शांति मिलती है और सभी प्रकार के नकारात्मक प्रभावों तथा भय से मुक्ति मिलती है।
- संसार बंधनों से मुक्ति: 'भवनाशिनी' के रूप में जानी जाने वाली वाराही देवी संसार के बंधनों से मुक्ति प्रदान कर मोक्ष के मार्ग पर ले जाने में सहायक होती हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
श्री वाराह्यनुग्रहाष्टकं क्या है?
इस स्तोत्र का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
श्री वाराह्यनुग्रहाष्टकं के पाठ से क्या लाभ होते हैं?
इस स्तोत्र का पाठ किसे करना चाहिए?
इस स्तोत्र का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
श्री वाराह्यनुग्रहाष्टकं का उद्गम क्या है?
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