वा

श्री वासुदेव द्वादशार्णव स्तुतिः

संपादन: अद्यतन
स्तोत्रश्री महाविष्णु
0 व्यूज़

श्री वासुदेव द्वादशार्णव स्तुतिः

ओमिति ज्ञानवस्त्रेण रागनिर्णेजनीकृतः |
कर्मनिद्रां प्रपन्नोऽस्मि त्राहि मां मधुसूदन || 1 ||

न गतिर्विद्यते चान्या त्वमेव शरणं मम |
मायापंकेनलिप्तोऽस्मि त्राहि मां मधुसूदन || 2 ||

मोहितो मोहजालेन पुत्रदारगृहादिषु |
तृष्णया पीड्यमानोऽस्मि त्राहि मां मधुसूदन || 3 ||

भक्तिहीनं तु दीनं च दुःखशोकसमन्वितौ |
अनाश्रयमनाथं च त्राहि मां मधुसूदन || 4 ||

गतागतपरिश्रांतो दूरमध्वनि कर्मणां |
संसारभयभीतोऽस्मि त्राहि मां मधुसूदन || 5 ||

वसितो मातृगर्भेषु पीडितोऽहं जनार्दन |
गर्भवासक्षयकर त्राहि मां मधुसूदन || 6 ||

तेन देव प्रपन्नोऽस्मि सत्वाश्रयपरायण |
जरामरणभीतोऽस्मि त्राहि मां मधुसूदन || 7 ||

वाचा तूपकृतं पापं कर्मणा यदुपार्जितं |
मया देव दुराचारं त्राहि मां मधुसूदन || 8 ||

सुकृतं न कृतं किंचित् दुष्कृतं तु सदा कृतं |
तेनाहं परितप्तोऽस्मि त्राहि मां मधुसूदन || 9 ||

देहांतरसहस्रेषु कुयोनिः सेविता मया |
तिर्यक्त्वं मानुषत्वं च त्राहि मां मधुसूदन || 10 ||

वासुदेव हृषीकेश वैकुंठ पुरुषोतम |
सृष्टिसंहारकरण त्राहि मां मधुसूदन || 11 ||

यत्राहमागमिष्यामि नारी वा पुरुषोऽपि वा |
तत्र तत्र च ते भक्तिः त्राहि मां मधुसूदन || 12 ||

द्वादशार्णवस्तुतिमिमां यः पठेच्छृणुयादपि |
स याति परमं स्थानं यत्र योगेश्वरो हरिः || 13 ||

इति श्रीवेदव्यास कृत द्वादशार्णव स्तुतिः ||

अर्थ

श्री वासुदेव द्वादशार्णव स्तुति भगवान विष्णु को पूर्ण समर्पण का एक अत्यंत शक्तिशाली और हृदयस्पर्शी स्तोत्र है। यह मानव जीवन यात्रा में आने वाले अज्ञान, कर्म के चक्र, मोह, दुःख और बार-बार जन्म लेने जैसी सभी पीड़ाओं से मुक्ति पाने के लिए केवल भगवान की शरण को स्वीकार करने वाली एक अद्वितीय शरणागति स्तुति है। यह भक्त की आंतरिक पुकार है, जो अपनी कमजोरियों को स्वीकार करते हुए, भगवान की दिव्य सुरक्षा की याचना करता है और भक्तिभाव की पराकाष्ठा का प्रतिनिधित्व करता है।

पहले पाँच श्लोकों में, भक्त अपनी अवस्थाओं को मधुसूदन के समक्ष व्यक्त करता है। वह कहता है, "मैं ज्ञान के वस्त्र से रागों को धोकर, कर्म की निद्रा में लीन हूँ, हे मधुसूदन, मेरी रक्षा करो।" वह अपने अज्ञान और कर्म के बंधनों को स्वीकार करता है। माया के कीचड़ में लिपटा हुआ, पुत्र, पत्नी, घर आदि के मोहजाल में फँसा हुआ, तृष्णा से पीड़ित, भक्तिहीन, दीन, दुःख और शोक से घिरा हुआ, और अनाथ जैसा महसूस करता हुआ अपनी असहायता व्यक्त करता है। संसार चक्र की यात्रा से थका हुआ और पुनर्जन्म के भय से भयभीत होकर वह अपनी रक्षा के लिए गहराई से प्रार्थना करता है।

छठे से दसवें श्लोकों में, भक्त गर्भाशय से लेकर अब तक के अपने कष्टों और किए गए पापों को निःसहाय होकर स्वीकार करता है। वह दीनतापूर्वक कहता है, "मैं माता के गर्भ में रहा और पीड़ित हुआ, अब वृद्धावस्था और मृत्यु के भय से काँप रहा हूँ।" वह वाणी, मन और कर्म से किए गए सभी बुरे कर्मों को और अच्छे कर्म न करने को ईमानदारी से स्वीकार करता है। वह आत्म-निरीक्षण के साथ स्वतंत्र रूप से स्वीकार करता है कि "मैंने कोई सुकृत नहीं किया, केवल दुष्कृत ही किया है" और इन पापों से संतप्त होकर पुकारता है।

यह स्तोत्र इस बात पर प्रकाश डालता है कि भक्त ने अनेक जन्मों में तिर्यग् योनियों (पशु रूप) और मानव योनियों का अनुभव किया है, फिर भी वह दुखों से मुक्त नहीं हुआ है। अब वह प्रणाम करते हुए कहता है कि केवल भगवान ही उसका एकमात्र आश्रय हैं। ग्यारहवें से बारहवें श्लोकों में, भक्त वासुदेव, हृषिकेश, वैकुण्ठनाथ - किसी भी रूप में भगवान हों - यह प्रार्थना करता है कि "मैं जहाँ भी जन्म लूँ, जहाँ भी रहूँ, मेरी भक्ति आपसे कभी दूर न हो।" यह भगवान के प्रति अटल श्रद्धा और भक्ति की निरंतरता के लिए की गई प्रार्थना है।

तेरहवाँ श्लोक इस स्तोत्र के फलश्रुति को बताता है। यह आशीर्वाद के रूप में कहता है कि जो कोई इस स्तोत्र का पाठ करता है या सुनता है, वह योगेश्वर हरि के परम पद (सर्वोच्च स्थान) को प्राप्त करता है। कुल मिलाकर, यह स्तोत्र पूर्ण आत्म-समर्पण और दैवीय शरणागति का एक उत्तम उदाहरण है, जो भक्त के हृदय से निकलने वाले भगवान के प्रति पूर्ण विश्वास और निर्भरता को दर्शाता है।

लाभ (Benefits):

  • शरणागति के भाव को मजबूत करता है: यह भक्त को स्वयं को पूरी तरह से भगवान को समर्पित करने में मदद करता है, जिससे अहंकार कम होता है और मन को शांति मिलती है।
  • मानसिक बोझ और पाप के भय को कम करता है: किए गए पापों को स्वीकार करके और भगवान की सुरक्षा की याचना करके मन का बोझ और पाप का भय दूर होता है, जिससे आंतरिक शांति प्राप्त होती है।
  • मोह, ममत्व, दुःख, तृष्णा जैसे बंधनों से मुक्ति: यह सांसारिक बंधनों से मुक्ति पाने और आध्यात्मिक शांति का अनुभव करने में सहायक है। यह भक्त को आंतरिक रूप से मजबूत करता है।
  • भगवद भक्ति किसी भी जन्म में बनी रहती है: पुनर्जन्मों में भी भगवान के प्रति भक्ति अटल बनी रहे, ऐसी प्रार्थना करने से भक्त निरंतर भगवान के साथ जुड़ा रहता है।
  • संसार चक्र से मुक्ति: स्तोत्र का नियमित पाठ जीवन-मृत्यु के चक्र से मुक्ति पाने और योगेश्वर हरि के परम पद को प्राप्त करने का मार्ग प्रशस्त करता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

श्री वासुदेव द्वादशार्णव स्तुति क्या है?
यह भगवान विष्णु या वासुदेव को पूर्ण शरणागति समर्पित करने वाला एक भक्तिपूर्ण स्तोत्र है। इसमें भक्त अपने अज्ञान, कर्म-बंधनों और संसार के दुखों से मुक्ति पाने के लिए भगवान की रक्षा की याचना करता है।
इस स्तोत्र का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
इस स्तोत्र का पाठ किसी भी समय किया जा सकता है, विशेष रूप से जब मानसिक रूप से कठिनाई हो या भगवान के प्रति पूर्ण समर्पण का भाव विकसित करना हो। प्रतिदिन स्नान के बाद शुद्ध मन से इसका पाठ करना उत्तम माना जाता है।
श्री वासुदेव द्वादशार्णव स्तुति के पाठ के क्या लाभ हैं?
इस स्तोत्र का पाठ शरणागति के भाव को मजबूत करता है, मानसिक बोझ और पाप के भय को कम करता है, मोह-ममत्व से मुक्ति दिलाता है, और संसार चक्र से मोक्ष प्राप्त करने में सहायक होता है।
इस स्तोत्र का पाठ कौन कर सकता है?
भगवान विष्णु में श्रद्धा रखने वाला और जीवन की कठिनाइयों से मुक्ति चाहने वाला कोई भी व्यक्ति इस स्तोत्र का पाठ कर सकता है। विशेष रूप से आध्यात्मिक प्रगति और भगवान का पूर्ण आश्रय चाहने वाले भक्त।
इस स्तोत्र का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
इस स्तोत्र का पाठ प्रतिदिन एक या तीन बार करना सामान्य है। भक्त की इच्छा और समय के अनुसार इसे अधिक बार भी पढ़ा जा सकता है, लेकिन नियमित पाठ महत्वपूर्ण है।
इस स्तोत्र का मूल या उद्गम क्या है?
यह स्तोत्र पुराणों या प्राचीन भक्ति साहित्य का हिस्सा है। इसका सटीक मूल स्पष्ट रूप से ज्ञात नहीं है, लेकिन यह हिंदू धर्म की भक्ति परंपरा में गहराई से निहित है।

टिप्पणियाँ

टिप्पणी लिखने के लिए लॉगिन करें

टिप्पणियाँ लोड हो रही हैं...