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श्री वाराही देवी स्तोत्रम्

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स्तोत्र
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नमोऽस्तु देवी वाराहि जयैकारस्वरूपिणि |
जपित्वा भूमिरूपेण नमो भगवतः प्रिये ||1||

जय क्रोडास्तु वाराहि देवित्वां च नमाम्यहम् |
जय वाराहि विश्वेशि मुख्य वाराहिते नमः ||2||

मुख्यवाराहि वंदेत्वां अंधे अंधिनिते नमः |
सर्वदुष्ट प्रदुष्टानां वाक् स्तंभनकरी नमः ||3||

नमस्तंभिनि स्तंभेत्वां जृंभेजृंभिणिते नमः |
रुंधे रुंधिनि वंदेत्वां नमो देवीतुमोहिनी ||4||

स्वभक्तानांहि सर्वेषां सर्वकाम प्रदे नमः |
बाह्वास्तंभकरी वंदे चित्तस्तंभिनिते नमः ||5||

चक्षुस्तंभिनि त्वां मुख्य स्तंभिनीते नमो नमः |
जगत् स्तंभिनि वंदेत्वां जिह्वास्तंभनकारिणि ||6||

स्तंभनं कुरु शत्रूणां कुरुमे शत्रुनाशनम् |
शीघ्रं वश्यंच कुरुते योग्ने  वाचात्मके नमः ||7||

टचतुष्टय रूपेत्वां शरणं सर्वदाभजे |
होमात्मकेफट् रूपेण जयाद्यानकेशिवे ||8||

देहिमे सकलान् कामान् वाराही  जगदीश्वरी |
नमस्तुभ्यं नमस्तुभ्यं नमस्तुभ्यं नमो नमः ||9||

इदमाद्यानना स्तोत्रं सर्वपापविनाशनम् |
पठेद्यः सर्वदा भक्त्या पातकैर्मुच्यते तथा ||10||

लभंते शत्रवोनाशं दुःखरोगापमृत्यवः |
महदायुष्यमाप्नोति  अलक्ष्मीर्नाशमाप्नुयात् ||11||

नभयं विद्यते क्वापि सर्वदा विजयोभवेत् 
आभीष्टार्धान् लभेत् सर्वान् शरीरी नात्रसंवयः  ||12||

  ||इति श्री वाराही स्तोत्रम् संपूर्णं   ||

अर्थ

श्री वाराही देवी स्तोत्रम्, शक्ति के अत्यंत शक्तिशाली रूपों में से एक, श्री वाराही देवी की स्तुति है। वाराही देवी सप्तमातृकाओं में से एक हैं और भगवान विष्णु के वराह अवतार की शक्ति स्वरूपा हैं। यह स्तोत्र भक्तों को सुरक्षा, विजय और सभी मनोकामनाओं की पूर्ति प्रदान करने वाला एक दिव्य मंत्र है। इसे दुष्ट शक्तियों को वश में करने और शत्रुओं को स्तंभित करने में अत्यंत प्रभावी माना जाता है। वाराही देवी अपने भक्तों को अभय प्रदान करती हैं और सभी बाधाओं से मुक्ति दिलाकर जीवन में सफलता प्रदान करती हैं।

वाराही देवी पृथ्वी की संरक्षिका और धर्म की संस्थापिका हैं। उनका वराह रूप अज्ञान के अंधकार को चीरकर ज्ञान का प्रकाश लाने वाली शक्ति का प्रतीक है। इस स्तोत्र का पाठ केवल बाहरी शत्रुओं के विनाश तक ही सीमित नहीं है, यह आंतरिक शत्रुओं जैसे काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर को नियंत्रित कर आत्मोन्नति प्राप्त करने में भी सहायक है। देवी के आशीर्वाद से, भक्त जीवन में आने वाली बाधाओं को दूर कर निर्भयता से आगे बढ़ सकते हैं। देवी की शक्ति अतुलनीय है और समस्त लोकों को शांति और समृद्धि प्रदान करती है।

स्तोत्र का प्रत्येक पद देवी की विभिन्न शक्तियों की स्तुति करता है। 'नमोऽस्तु देवी वाराही जयैकारस्वरूपिणी' पहला श्लोक देवी को विजय के रूप में स्तुति करता है और पृथ्वी रूप में स्थित उन्हें नमन करता है। 'मुख्यवाराहि वन्देत्वां अन्धे अन्धिनिते नमः' जैसे श्लोक शत्रुओं के वाक् स्तंभन (वाणी को रोकना), चित्त स्तंभन (मन को रोकना), चक्षु स्तंभन (दृष्टि को रोकना), जिह्वा स्तंभन (जीभ को रोकना) आदि शक्तियों का वर्णन करते हैं। इसका अर्थ है दुष्टों के बुरे विचारों, बातों, दृष्टि और कार्यों को रोकने की देवी की क्षमता। देवी अपने भक्तों पर किसी भी प्रकार की दुष्ट शक्तियों के प्रभाव को नहीं होने देतीं।

इसके अतिरिक्त, 'स्तंभनं कुरु शत्रूणां कुरुमे शत्रुनाशनम्' श्लोक देवी से शत्रुओं को स्तंभित करने और उनका नाश करने की प्रार्थना करता है। 'देहि मे सकलान कामान वाराही जगदीश्वरी' अंतिम श्लोक यह घोषणा करता है कि देवी सभी इच्छाओं को पूर्ण करने वाली जगदीश्वरी हैं। इस स्तोत्र का पाठ केवल मंत्रों का उच्चारण नहीं है, बल्कि देवी के चरणों में पूर्ण समर्पण है। जब भक्त स्वयं को पूरी तरह से देवी को समर्पित कर देते हैं, तो वे उन्हें अभय प्रदान करती हैं और सभी दुष्ट शक्तियों से उनकी रक्षा करती हैं। देवी की कृपा से, भक्त साहस, आत्मविश्वास और आंतरिक शांति प्राप्त करते हैं।

लाभ (Benefits):

  • शत्रु नाश: शत्रुओं से होने वाली परेशानियों को दूर कर उन्हें निष्क्रिय करने में सहायता करता है। न्यायपूर्ण संघर्षों और प्रतिकूल परिस्थितियों में विजय दिलाता है।
  • वाक् स्तंभन: दुष्ट व्यक्तियों की बुरी बातों, निंदा और दुष्प्रचार को रोकता है। इससे भक्तों को मानसिक शांति प्राप्त होती है।
  • सर्वकामना सिद्धि: भक्तों की सद्भावपूर्ण सभी इच्छाओं को पूर्ण करने के लिए देवी का अनुग्रह प्राप्त होता है, जीवन में समृद्धि और खुशी लाता है।
  • सुरक्षा और निर्भयता: सभी प्रकार की दुष्ट शक्तियों, नकारात्मक प्रभावों, तांत्रिक प्रयोगों और भय से भक्तों की रक्षा करता है, उन्हें सुरक्षित रखता है।
  • आत्मविश्वास में वृद्धि: देवी के आशीर्वाद से जीवन की चुनौतियों का सामना करने के लिए साहस, धैर्य और आत्मविश्वास प्रदान करता है, जिससे भक्त निर्भय होकर आगे बढ़ते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

श्री वाराही देवी स्तोत्रम् क्या है?
यह सप्तमातृकाओं (सात दिव्य माताओं) में से एक, श्री वाराही देवी को समर्पित एक शक्तिशाली भक्ति भजन है। वाराही देवी को भगवान वराह (विष्णु के वराह अवतार) की शक्ति (ऊर्जा) माना जाता है। यह उनकी सुरक्षा, विजय और इच्छाओं की पूर्ति के लिए पाठ किया जाता है।
इस स्तोत्र का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
इसका पाठ प्रतिदिन, विशेषकर ब्रह्म मुहूर्त में या शाम को किया जा सकता है। इसे शुद्ध मन, भक्ति और स्नान करने के बाद, अधिमानतः वाराही देवी की मूर्ति या चित्र के सामने करना उचित है।
श्री वाराही देवी स्तोत्र का पाठ करने के मुख्य लाभ क्या हैं?
प्राथमिक लाभों में शत्रुओं से सुरक्षा, नकारात्मक शक्तियों का दमन, बाधाओं को दूर करना, धर्मसम्मत इच्छाओं की पूर्ति और साहस व आत्मविश्वास प्राप्त करना शामिल है। यह विशेष रूप से विरोधियों के दुर्भावनापूर्ण शब्दों और कार्यों को बेअसर करने में प्रभावी है।
इस स्तोत्र का पाठ किसे करना चाहिए?
जो कोई भी शत्रुओं से सुरक्षा चाहता है, बाधाओं को दूर करना चाहता है, प्रयासों में सफलता चाहता है, या आध्यात्मिक विकास चाहता है, वह इस स्तोत्र का पाठ कर सकता है। यह कानूनी विवादों, पेशेवर प्रतिद्वंद्विता या नकारात्मक प्रभावों का सामना करने वालों के लिए विशेष रूप से फायदेमंद है।
श्री वाराही देवी स्तोत्र का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
सामान्य लाभ के लिए, इसे प्रतिदिन एक बार पाठ करना पर्याप्त है। विशिष्ट उद्देश्यों या तीव्र समस्याओं के लिए, कोई इसे 3, 11, 21, या 108 बार (एक माला) प्रतिदिन एक निर्धारित अवधि के लिए, आमतौर पर 41 दिनों (एक मंडल) तक पाठ कर सकता है।
इस स्तोत्र का मूल या स्रोत क्या है?
श्री वाराही देवी स्तोत्रम् प्राचीन हिंदू धर्मग्रंथों और परंपराओं का हिस्सा है, जो अक्सर शक्ति की पूजा के लिए समर्पित विभिन्न पुराणों और तांत्रिक ग्रंथों में पाया जाता है। इसका सटीक एकल मूल विभिन्न परंपराओं में भिन्न हो सकता है, लेकिन इसका सार देवी माँ वाराही के प्रति श्रद्धा से आता है।

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