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श्री तारांबा हृदयं

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स्तोत्र
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श्री तारांबा हृदयं

श्री शिव उवाच |
शृणु पार्वति भद्रं ते लोकानां हितकारकं |
कथ्यते सर्वदा गोप्यं ताराहृदयमुत्तमं || 1 ||

श्री पार्वत्युवाच |
स्तोत्रं कथं समुत्पन्नं कृतं केन पुरा प्रभो |
कथ्यतां सर्ववृत्तांतं कृपां कृत्वा ममोपरि || 2 ||

श्री शिव उवाच |
रणेदेवासुरे पूर्वं कृतमिंद्रेण सुप्रिये |
दुष्टशत्रुविनाशार्थं बल वृद्धि यशस्करं || 3 ||

ॐ अस्य श्रीमदुग्रतारा हृदय स्तोत्र मंत्रस्य – श्री भैरव ऋषिः – अनुष्टुप्छंदः – श्रीमदुग्रतारादेवता – स्त्रीं बीजं – हूंशक्तिः – नमः कीलकं – सकलशत्रुविनाशार्थे जपे विनियोगः |

करन्यासः –
ॐ स्त्रीं अंगुष्ठाभ्यां नमः |
ॐ ह्रीं तर्जनीभ्यां नमः |
ॐ हूं मध्यमाभ्यां नमः |
ॐ त्रीं अनामिकाभ्यां नमः |
ॐ ऐं कनिष्ठकाभ्यां नमः |
ॐ हंसः करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः |

अंगन्यासः –
ॐ स्त्रीं हृदयाय नमः |
ॐ ह्रीं शिरसे स्वाहा |
ॐ हूं शिखायै वषट् |
ॐ त्रीं कवचाय हुं |
ॐ ऐं नेत्रत्रयाय वौषट् |
ॐ हंसः अस्त्रायफट् |

ध्यानं |
ध्यायेत्कोटिदिवाकरद्युतिनिभां बालेंदुयुक्छेखरां
रक्तांगीं विकटां सुरक्तवसनां पूर्णेंदुबिंबाननां |
पाशंखड्गमहांकुशादि दधतीं दोर्भिश्चतुर्भिर्युतां
नानाभूषणभूषितां भगवतीं तारां जगत्तारिणीं || 4 ||

एवं ध्यात्वा शुभां तारां ततस्तु हृदयं पठेत् |
तारिणी तत्त्वनिष्ठानां सर्वतत्त्वप्रकाशिका || 5 ||

रामाभिन्नापदाशक्तिश्शत्रुनाशं करोतु मे |
सर्वदाशत्रुसंरंभे तारा मे कुरुतां जयं || 6 ||

स्त्रीं त्रीं स्वरूपिणी देवी त्रिषु लोकेषु विश्रुता |
तव स्नेहान्मयाख्यातं न पशूनां प्रकाशयेत् || 7 ||

शृणु देवि तवस्नेहात्तारानामानि तत्वतः |
वर्णयिष्यामि गुप्तानि दुर्लभानि जगत्त्रये || 8 ||

तारिणी तरळा तारा त्रिरूपा तरणीप्रभा |
तत्त्वरूपा महासाध्वी सर्वसज्जनपालिका || 9 ||

रमणीया रजोरूपा जगत्सृष्टिकरी परा |
तमोरूपा महामाया घोरारावा भयानका || 10 ||

कालरूपा काळिकाख्या जगद्विध्वंसकारिणी |
तत्त्वज्ञाना परानंता तत्त्वज्ञानप्रदाऽनघा || 11 ||

रक्तांगी रक्तवस्त्रा च रक्तमालासुशोभिता |
सिद्धिलक्ष्मीश्च ब्रह्माणि महाकाळी महालया || 12 ||

नामान्येतानि ये मर्त्यास्सर्वदैकाग्रमानसाः |
प्रपठंति प्रिये तेषां किंकरत्वं करोम्यहं || 13 ||

तारां तारपरांदेवीं तारकेश्वरपूजितां |
तारिणीं भवपाथोधेरुग्रतारां भजाम्यहं || 14 ||

स्त्रीं ह्रीं हूं त्रीं फण्मंत्रेण जलं जप्त्वाऽभिषेचयेत् |
सर्वरोगाः प्रणश्यंति सत्यं सत्यं वदाम्यहं || 15 ||

त्रीं स्वाहांतैर्महामंत्रैश्चंदनं साधयेत्ततः |
तिलकं कुरुते प्राज्ञो लोकोवश्योभवेत्प्रिये || 16 ||

स्त्रीं ह्रीं त्रीं स्वाहा मंत्रेण श्मशानं भस्म मंत्रयेत् |
शत्रोर्गृहेप्रतिक्षिप्ते शत्रोर्मृत्युर्भविष्यति || 17 ||

ह्रीं हूं स्त्रीं फडंतमंत्रैः पुष्पं संशोध्यसप्तधा |
उच्चाटनं करोत्याशु रिपूणां नैव संशयः || 18 ||

स्त्रीं त्रीं ह्रीं मंत्रवर्येण अक्षताश्चाभि मंत्रिताः |
तत्प्रतिक्षेपमात्रेण शीघ्रमायाति मानिनी || 19 ||

हंसः ॐ ह्रीं स्त्रीं हूं हंसः |

इति मंत्रेण जप्तेन शोधितं कज्जलं प्रिये |
तस्यैव तिलकं कृत्वा जगन्मोहं स वशं नयेत् || 20 ||

ताराया हृदयं देवि सर्वपापप्रणाशनं |
राजपेयादि यज्ञानां कोटि कोटि गुणोत्तरं || 21 ||

गंगादि सर्वतीर्थानां फलं कोटिगुणं स्मृतं |
महादुःखे महारोगे संकटे प्राणसंशये || 22 ||

महाभये महाघोरे पठेत् स्तोत्रं महोत्तमं |
सत्यं सत्यं मयोक्तंते पार्वति प्राणवल्लभे || 23 ||

गोपनीयं प्रयत्नेन न प्रकाश्यमिदं क्वचित् || 24 ||

इति श्री भैरवीतंत्रे शिवपार्वती संवादे श्रीमदुग्रताराहृदयं |

अर्थ

श्री तारांबा हृदयम् एक अत्यंत गोपनीय और शक्तिशाली तांत्रिक स्तोत्र है, जिसमें स्वयं भगवान शिव ने देवी पार्वती को तारा देवी की महिमा, तत्व, रहस्यमय नाम, मंत्र शक्ति और रक्षात्मक क्षमताओं का विस्तृत वर्णन किया है। शिवजी कहते हैं कि यह स्तोत्र लोक कल्याण के लिए है और अत्यंत गोपनीय रखा जाना चाहिए। जब पार्वती देवी इस स्तोत्र की उत्पत्ति के बारे में पूछती हैं, तो शिवजी बताते हैं कि प्राचीन काल में देवासुर संग्राम में इंद्र ने अपनी शक्ति बढ़ाने और शत्रुओं का नाश करने के लिए इसका पाठ किया था। यह स्तोत्र केवल शत्रु विनाश ही नहीं, बल्कि असंभव को संभव करने की शक्ति, पूर्ण सुरक्षा, शरीर-मन-आत्मा की शुद्धि और महान सिद्धियों को प्रदान करने वाली एक अत्यंत प्रभावशाली उपासना है।

स्तोत्र के आरंभ में मंत्र स्वरूप, ऋषि, छंद, देवता, बीज (स्त्रीं), शक्ति (हूं), कीलक और करन्यास-अंगन्यास का उल्लेख किया गया है। ये तारा उपासना में आंतरिक शुद्धता, एकाग्रता और सिद्धि प्राप्त करने के लिए महत्वपूर्ण मार्ग हैं। ध्यान श्लोक में देवी तारा का वर्णन करोड़ों सूर्यों के समान तेजस्वी, हाथों में पाश, खड्ग, अंकुश और अन्य आयुध धारण किए हुए, एक भयंकर किंतु परम रक्षक रूप में किया गया है। उन्हें "जगत्तारिणी" कहा गया है, जिसका अर्थ है जो समस्त जीवों को भय, संकट और संसार सागर से तारने वाली हैं। देवी का यह उग्र रूप दुष्ट शक्तियों का नाश कर भक्तों की रक्षा करने वाली उनकी परम करुणा को दर्शाता है।

इसके पश्चात के श्लोकों में देवी के रहस्यमय नाम, रूप, तत्व और शक्तियों का विस्तार से वर्णन किया गया है। तारा देवी को त्रि-रूपिणी, सृष्टि-स्थिति-लयात्मक शक्ति, रजोगुण, तमोगुण और सत्वगुण की अधिष्ठात्री, कालिका, महामाया, सिद्धलक्ष्मी जैसे अनगिनत रूपों में वर्णित किया गया है। उन्हें तत्वज्ञानप्रदा, रक्तांगी जैसे अनेक नामों से भी स्तुति की गई है। ये नाम देवी के अनंत गुणों और सामर्थ्य को प्रकट करते हैं। शिवजी घोषणा करते हैं कि जो भक्त इन नामों का श्रद्धापूर्वक जप करता है, तारा देवी स्वयं उसकी सेवा करने के लिए तत्पर रहती हैं। यह देवी की अपार करुणा और भक्त वत्सलता को दर्शाता है।

स्तोत्र के अंतिम भाग में शक्तिशाली तांत्रिक मंत्र पद्धतियों का वर्णन है। इसमें बताया गया है कि कैसे जल, चंदन, भस्म, पुष्प, अक्षत और कज्जल जैसी वस्तुओं को मंत्रों से अभिमंत्रित कर शत्रुओं का दमन करने, सुरक्षा प्राप्त करने, स्वास्थ्य शुद्धि और वशीकरण जैसे कार्यों के लिए उपयोग किया जा सकता है। अंत में, शिवजी इस हृदयम् की महिमा का बखान करते हैं। तारा हृदयम् का जप करोड़ यज्ञों के फल से भी अधिक और गंगा स्नान के फल से करोड़ों गुना अधिक महान है। महान दुख, रोग, संकट या प्राण संकट की स्थिति में इसका जप करने से तुरंत सुरक्षा मिलती है। हालांकि, शिवजी आज्ञा देते हैं कि इसे अत्यंत गोपनीय रखा जाए और केवल योग्य शिष्यों को ही बताया जाए। श्री तारांबा हृदयम् भक्त को अद्भुत सुरक्षा, ज्ञान, शक्ति, शत्रुनाश की क्षमता, आंतरिक शुद्धि और आध्यात्मिक जागृति प्रदान करने वाली परम शक्ति स्वरूप उपासना है।

लाभ (Benefits):

  • शत्रुनाश और बाधा निवारण: इस स्तोत्र के नियमित पाठ से शत्रु कमजोर होते हैं और जीवन में आने वाली सभी बाधाएं दूर होती हैं।
  • अघटितघटित करने की क्षमता: यह असंभव लगने वाले कार्यों को सिद्ध करने के लिए अपार शक्ति और आत्मविश्वास प्रदान करता है। देवी की कृपा से कोई भी कठिन कार्य सरल हो जाता है।
  • पूर्ण सुरक्षा: महान दुख, रोगों, संकटों और प्राणघातक परिस्थितियों से तत्काल सुरक्षा प्राप्त होती है। देवी भक्तों को सभी खतरों से बचाती हैं।
  • आंतरिक शुद्धि और आध्यात्मिक उन्नति: शरीर, मन और आत्मा को शुद्ध करके आंतरिक शांति और आध्यात्मिक जागृति प्रदान करता है। यह साधक को उच्च स्तर का ज्ञान प्रदान करता है।
  • महा सिद्धि और मनोकामना पूर्ति: इस हृदयम् की निष्ठावान उपासना से महान सिद्धियां प्राप्त होती हैं और भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। देवी स्वयं भक्त की सहायता के लिए आती हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

श्री तारांबा हृदयं क्या है?
श्री तारांबा हृदयं महाविधा तारा देवी को समर्पित एक अत्यंत गोपनीय और शक्तिशाली तांत्रिक स्तोत्र है। इसमें तारा देवी की महिमा, तत्व, रहस्यमय नाम और मंत्र शक्ति का विस्तृत वर्णन है।
इस स्तोत्र का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
इस स्तोत्र का पाठ महान दुख, रोग, संकट या प्राण संकट की स्थितियों में, या नित्य उपासना के भाग के रूप में गुरु से दीक्षा लेकर करना चाहिए। शुद्ध मन और एकाग्रता से पाठ करना महत्वपूर्ण है।
श्री तारांबा हृदयं के पाठ से क्या प्रमुख लाभ मिलते हैं?
इस स्तोत्र के पाठ से शत्रुनाश, बाधाओं का निवारण, पूर्ण सुरक्षा, असंभव कार्यों की सिद्धि, आंतरिक शुद्धि और आध्यात्मिक उन्नति, तथा महान सिद्धियों की प्राप्ति होती है।
इस स्तोत्र का पाठ कौन कर सकता है?
यह एक तांत्रिक स्तोत्र होने के कारण, गुरु परंपरा से दीक्षा प्राप्त व्यक्ति या तारा देवी के भक्त इसे श्रद्धा और भक्ति के साथ पढ़ सकते हैं। सामान्य भक्त भी देवी की कृपा के लिए पाठ कर सकते हैं, लेकिन गोपनीयता महत्वपूर्ण है।
श्री तारांबा हृदयं का कितनी बार जप करना चाहिए?
सामान्यतः, एक माला (108 बार) या अपने गुरु के निर्देशानुसार निश्चित संख्या में जप कर सकते हैं। संकट के समय मन को शांति मिलने तक या स्थिति सुधरने तक जप किया जा सकता है।
इस स्तोत्र की उत्पत्ति या रचना कैसे हुई?
भगवान शिव ने देवी पार्वती को इस स्तोत्र का ज्ञान दिया था। शिवजी ने बताया कि प्राचीन काल में देवासुर संग्राम में इंद्र ने अपनी शक्ति और शत्रुओं के विनाश के लिए इसका पाठ किया था।

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