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श्री सुपर्ण स्तोत्रं (महाभारते)

संपादन: अद्यतन
स्तोत्रश्री महाविष्णु
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श्री सुपर्ण स्तोत्रं (महाभारते)

देवा ऊचुः |
त्वमृषिस्त्वं महाभागस्त्वं देवः पतगेश्वरः |
त्वं प्रभुस्तपनः सूर्यः परमेष्ठी प्रजापतिः || 1 ||

त्वमिंद्रस्त्वं हयमुखस्त्वं शर्वस्त्वं जगत्पतिः |
त्वं मुखं पद्मजो विप्रस्त्वमग्निः पवनस्तथा || 2 ||

त्वं हि धाता विधाता च त्वं विष्णुः सुरसत्तमः |
त्वं महानभिभूः शश्वदमृतं त्वं महद्यशः |
त्वं प्रभास्त्वमभिप्रेतं त्वं नस्त्राणमनुत्तमं || 3 ||

बलोर्मिमान् साधुरदीनसत्त्वः
समृद्धिमान् दुर्विषहस्त्वमेव |
त्वत्तः सृतं सर्वमहीनकीर्ते
ह्यनागतं चोपगतं च सर्वं || 4 ||

त्वमुत्तमः सर्वमिदं चराचरं
गभस्तिभिर्भानुरिवावभाससे |
समाक्षिपन् भानुमतः प्रभां मुहु-
-स्त्वमंतकः सर्वमिदं ध्रुवाध्रुवं || 5 ||

दिवाकरः परिकुपितो यथा दहेत्
प्रजास्तथा दहसि हुताशनप्रभ |
भयंकरः प्रलय इवाग्निरुत्थितो
विनाशयन् युगपरिवर्तनांतकृत् || 6 ||

खगेश्वरं शरणमुपागता वयं
महौजसं ज्वलनसमानवर्चसं |
तडित्प्रभं वितिमिरमभ्रगोचरं
महाबलं गरुडमुप्येत खेचरं || 7 ||

परावरं वरदमजय्यविक्रमं
तवौजसा सर्वमिदं प्रतापितं |
जगत्प्रभो तप्तसुवर्णवर्चसा
त्वं पाहि सर्वांश्च सुरान् महात्मनः || 8 ||

भयान्विता नभसि विमानगामिनो
विमानिता विपथगतिं प्रयांति ते |
ऋषेः सुतस्त्वमसि दयावतः प्रभो
महात्मनः खगवर कश्यपस्य ह || 9 ||

स मा क्रुधः कुरु जगतो दयां परां
त्वमीश्वरः प्रशममुपैहि पाहि नः |
महाशनिस्फुरितसमस्वनेन ते
दिशोऽंबरं त्रिदिवमियं च मेदिनी || 10 ||

चलंति नः खग हृदयानि चानिशं
निगृह्यतां वपुरिदमग्निसन्निभं |
तव द्युतिं कुपितकृतांतसन्निभां
निशम्य नश्चलति मनोऽव्यवस्थितं |
प्रसीद नः पतगपते प्रयाचतां
शिवश्च नो भव भगवन् सुखावहः || 11 ||

एवं स्तुतः सुपर्णस्तु देवैः सर्षिगणैस्तदा |
तेजसः प्रतिसंहारमात्मनः स चकार ह || 12 ||

इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि त्रयोविंशोऽध्याये देवकृत श्री सुपर्ण स्तोत्रं ||

अर्थ

श्री सुपर्ण स्तोत्रं महाभारत के आदिपर्व में वर्णित एक अत्यंत पवित्र और शक्तिशाली स्तोत्र है। जब असुरों की भयानक शक्तियों से भयभीत होकर देवताओं ने रक्षा के लिए गरुड़ की शरण ली, तब उन्होंने इस स्तोत्र के माध्यम से गरुड़ के असीम बल, तेज, आकाशव्यापी वैभव और दिव्य स्वरूप की स्तुति की। यह स्तोत्र केवल एक प्रार्थना नहीं, बल्कि गरुड़ के विश्वव्यापी रूप और संरक्षक शक्ति का गहरा दर्शन प्रदान करता है, जिससे भक्तों में अभय का संचार होता है।

इस स्तोत्र में, गरुड़ को ऋषि, महाभाग्यशाली, देव, पक्षियों के स्वामी, प्रभु, तपन, सूर्य, परमेष्ठी और प्रजापति के रूप में संबोधित किया गया है। उन्हें इंद्र, हयमुख, शर्व (शिव), जगत्पति, पद्मज (ब्रह्मा), अग्नि और पवन का स्वरूप बताया गया है। उन्हें ही धाता, विधाता, देवों में श्रेष्ठ विष्णु, महान और अमृत स्वरूप कहकर महिमामंडित किया गया है। गरुड़ की प्रभा, अमरता, महाबल और देवताओं के लिए अनुपम शरण के रूप में उनकी स्तुति की गई है। देवता घोषणा करते हैं कि समस्त चराचर सृष्टि उन्हीं से उत्पन्न हुई है और उन्हीं की शक्ति से संरक्षित है।

देवता गरुड़ के भयंकर रूप का वर्णन करते हुए कहते हैं कि उनका तेज अग्नि के समान, प्रभा सूर्य के समान और कार्य प्रलयकाल की अग्नि के समान हैं। उनका उग्र स्वरूप प्रलयकाल की अग्नि से भी अधिक भयानक है, जो कालचक्र के अंत की तरह सब कुछ नष्ट कर सकता है। उनके प्रभाव से सभी लोक तपे हुए सोने के समान प्रकाशित होते हैं। गरुड़ के आकाशव्यापी प्रकाश और घनघोर रूप को देखकर भयभीत हुए देवता, उनकी शरण मांगते हुए प्रार्थना करते हैं कि वे उनके मन के भय को शांत करें और संसार को शांति प्रदान करें।

स्तोत्र के अंत में यह वर्णित है कि देवताओं और ऋषियों की प्रार्थना से प्रसन्न होकर गरुड़ ने अपने असीम तेज को समेट लिया और तीनों लोकों में शांति बहाल की। यह स्तोत्र गरुड़ की अद्वितीय शक्ति, विश्व के संरक्षण में उनकी भूमिका और देवताओं के लिए भी शरणदाता के रूप में उनके महिमामय स्वरूप को खूबसूरती से दर्शाता है। इस स्तोत्र का पाठ भक्तों को अभय प्रदान करता है और उन्हें सभी बाधाओं से बचाता है।

लाभ (Benefits):

  • भय और नकारात्मक शक्तियों का नाश: इस स्तोत्र का पाठ आंतरिक और बाहरी भय को दूर करता है, साथ ही अशुभ शक्तियों और बुरी नजर से भी रक्षा करता है।
  • सुरक्षा और साहस में वृद्धि: गरुड़ भगवान विष्णु के वाहन हैं, इसलिए यह स्तोत्र संकट के समय सुरक्षा, साहस और आत्मविश्वास बढ़ाने में सहायक होता है।
  • शत्रु और बाधाओं का निवारण: शत्रुओं और जीवन की बाधाओं से मुक्ति पाने के लिए यह स्तोत्र अत्यंत प्रभावशाली है। यह खतरों को दूर करके सुरक्षा प्रदान करता है।
  • यात्रा सुरक्षा: विशेष रूप से यात्रा करते समय या वाहनों में सफर करते समय इस स्तोत्र का पाठ करने से दुर्घटनाओं और अप्रत्याशित परेशानियों से रक्षा मिलती है।
  • गरुड़ और विष्णु का अनुग्रह: गरुड़ भगवान विष्णु के परम भक्त और सेवक हैं, इसलिए इस स्तोत्र का पाठ करने से गरुड़ के साथ-साथ श्रीहरि का आशीर्वाद भी प्राप्त होता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

श्री सुपर्ण स्तोत्रं क्या है?
श्री सुपर्ण स्तोत्रं महाभारत के आदिपर्व में वर्णित एक पवित्र स्तोत्र है, जिसकी रचना देवताओं ने असुरों के भय से रक्षा हेतु गरुड़ की स्तुति करते हुए की थी। यह गरुड़ के असीम बल, तेज और दिव्य स्वरूप का वर्णन करता है।
इस स्तोत्र का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
इस स्तोत्र का पाठ किसी भी शुभ दिन या जब मन में भय, चिंता या बाधाएं हों, तब किया जा सकता है। शुद्ध मन से, गरुड़ का स्मरण करते हुए भक्तिपूर्वक पाठ करना सर्वोत्तम होता है।
श्री सुपर्ण स्तोत्रं के पाठ से क्या लाभ होते हैं?
इस स्तोत्र के पाठ से भय, अशुभ शक्तियाँ और बुरी नज़र दूर होती है। यह सुरक्षा, साहस, शक्ति और आत्मविश्वास बढ़ाता है, साथ ही शत्रु-बाधाओं का निवारण कर यात्रा में सुरक्षा प्रदान करता है।
किसे श्री सुपर्ण स्तोत्रं का पाठ करना चाहिए?
कोई भी व्यक्ति इस स्तोत्र का पाठ कर सकता है। विशेष रूप से वे लोग जो भय, चिंता, शत्रु बाधा या यात्रा में सुरक्षा चाहते हैं, उनके लिए यह स्तोत्र अधिक लाभकारी है।
इस स्तोत्र का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
आमतौर पर, प्रतिदिन 11, 21, 54 या 108 बार पाठ करना शुभ माना जाता है। आप अपनी इच्छा और समय के अनुसार पाठ की संख्या निर्धारित कर सकते हैं।
श्री सुपर्ण स्तोत्रं का उद्गम कहाँ से हुआ है?
श्री सुपर्ण स्तोत्रं का उद्गम महाभारत के आदिपर्व से हुआ है। देवताओं द्वारा गरुड़ की स्तुति के प्रसंग में यह स्तोत्र वहीं से प्रकट हुआ है।

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