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श्री रंग गद्यं

संपादन: अद्यतन
स्तोत्रश्री महाविष्णु
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श्री रंग गद्यं

चिदचित्परतत्त्वानां तत्त्वायाथार्थ्यवेदिने |
रामानुजाय मुनये नमो मम गरीयसे ||

स्वाधीनत्रिविधचेतनाऽचेतन स्वरूपस्थिति प्रवृत्तिभेदं, क्लेशकर्माद्यशेषदोषासंस्पृष्टं, स्वाभाविकानवधिकातिशय ज्ञानबलैश्वर्य वीर्यशक्तितेजस्सौशील्य वात्सल्य मार्दवार्जव सौहार्द साम्य कारुण्य माधुर्य गांभीर्य औदार्य चातुर्य स्थैर्य धैर्य शौर्य पराक्रम सत्यकाम सत्यसंकल्प कृतित्व कृतज्ञताद्यसंख्येय कल्याणगुण गणौघ महार्णवं, परब्रह्मभूतं, पुरुषोत्तमं, श्रीरंगशायिनं, अस्मत्स्वामिनं, प्रबुद्धनित्यनियाम्य नित्यदास्यैकरसात्मस्वभावोऽहं, तदेकानुभवः तदेकप्रियः, परिपूर्णं भगवंतं विशदतमानुभवेन निरंतरमनुभूय, तदनुभवजनितानवधिकातिशय प्रीतिकारिताशेषावस्थोचित अशेषशेषतैकरतिरूप नित्यकिंकरो भवानि |

स्वात्मनित्य नियाम्य नित्यदास्यैकरसात्म स्वभावानुसंधानपूर्वक भगवदनवधिकातिशय स्वाम्याद्यखिल गुणगणानुभव जनितानवधिकातिशय प्रीतिकारिताशेषावस्थोचिताशेष शेषतैकरतिरूप नित्यकैंकर्य प्राप्त्युपायभूतभक्ति तदुपाय सम्यग् ज्ञानतदुपाय समीचीनक्रिया तदनुगुणसात्त्विकताऽऽस्तिक्यादि समस्तात्मगुणविहीनः, दुरुत्तरानंत तद्विपर्यय ज्ञानक्रियानुगुणानादि पापवासना महार्णवांतर्निमग्नः, तिलतैलवद्दारुवह्निवद्दुर्विवेच त्रिगुण क्षणक्षरण स्वभावाचेतन प्रकृतिव्याप्तिरूप दुरत्यय भगवन्माया तिरोहित स्वप्रकाशः, अनाद्यविद्यासंचितानंताशक्य विस्रंसन कर्मपाश प्रग्रथितः, अनागतानंतकाल समीक्षयाऽप्यदृष्टसंतारोपायः, निखिलजंतुजातशरण्य, श्रीमन्नारायण, तव चरणारविंदयुगळं शरणमहं प्रपद्ये ||

एवमवस्थितस्याप्यर्थित्वमात्रेण, परमकारुणिको भगवान्, स्वानुभव प्रीत्योपनीतैकांतिकात्यंतिक नित्यकैंकर्यैकरतिरूप नित्यदास्यं दास्यतीति विश्वासपूर्वकं भगवंतं नित्यकिंकरतां प्रार्थये ||

तवानुभूतिसंभूतप्रीतिकारित दासतां |
देहि मे कृपया नाथ न जाने गतिमन्यथा ||

सर्वावस्थोचिताशेष शेषतैकरतिस्तव |
भवेयं पुंडरीकाक्ष त्वमेवैवं कुरुष्व मां ||

एवंभूत तत्त्व याथात्म्यवबोध तदिच्छारहितस्यापि, एतदुच्चारणमात्रावलंबनेन, उच्यमानार्थ परमार्थनिष्ठं मे मनस्त्वमेवाद्यैव कारय ||

अपार करुणांबुधे, अनालोचित विशेषाशेष लोकशरण्य, प्रणतार्तिहर, आश्रितवात्सल्यैक महोदधे, अनवरतविदित निखिलभूतजात याथात्म्य, सत्यकाम, सत्यसंकल्प, आपत्सख, काकुत्स्थ, श्रीमन्, नारायण, पुरुषोत्तम, श्रीरंगनाथ, मम नाथ, नमोऽस्तु ते ||

इति श्रीभगवद्रामानुज विरचितं श्री रंग गद्यं |

अर्थ

श्री रंग गद्यं भगवद् रामानुजाचार्य द्वारा श्रीरंगनाथ के समक्ष उच्चारित एक परम भक्तिरसपूर्ण प्रपत्ति है। यह गद्य परब्रह्मस्वरूप श्रीमन नारायण के अनंत कल्याणकारी गुणों और एक भक्त की संपूर्ण शरणागति को मधुरता से व्यक्त करता है, जो अपने दासत्व स्वरूप को पूरी तरह से समझ चुका है। यह केवल एक स्तोत्र नहीं, बल्कि भगवान की अद्वितीय महिमा और जीव के परम लक्ष्य को उजागर करने वाला एक दिव्य अनुभव है।

आचार्य सर्वप्रथम भगवान के तत्व — जीव, जड़ और परब्रह्म के वास्तविक स्वरूप को जानने वाले महागुरु रामानुज को नमस्कार करते हैं। इसके पश्चात्, वे श्रीरंगनाथ को अपरिमित ज्ञान, बल, ऐश्वर्य, शौर्य, करुणा, सौशीलय, वात्सल्य आदि असंख्य गुणों से युक्त परब्रह्मस्वरूप बताते हैं। वे इस जगत में चित्-अचित् सभी के आधार, अविनाशी, शंख-चक्र-गदाधारी विष्णु को "अस्मत्स्वामी" (मेरे स्वामी) के रूप में अपने हृदय में स्थापित करते हैं। आचार्य प्रतिपादित करते हैं कि भगवान किसी भी दोष से अछूते हैं और वे ही सर्वोत्तम आश्रय हैं।

भक्त अपने स्वरूप का पूर्ण अनुभव करके यह समझता है कि वह नित्य दास्य स्वरूप वाला है, और श्रीरंगनाथ ही उसका एकमात्र आनंद तथा लक्ष्य हैं। वह निरंतर अनुभव के साथ भगवान की सेवा करने वाला नित्य किंकर बनना चाहता है। यह गद्य भक्त के आत्म-साक्षात्कार की पराकाष्ठा को दर्शाता है, जहाँ उसे अपने अस्तित्व का मौलिक उद्देश्य भगवान की निरंतर सेवा करना ही प्रतीत होता है।

भक्त अपनी अविद्या, पाप-वासनाओं, कर्मबंधनों और माया के आवरण को दुर्गम बताते हुए, अपनी दयनीय स्थिति में श्रीमन नारायण को ही एकमात्र शरण्य घोषित करता है। वह उनके चरणारविंदों को ही अपना परम आश्रय बनाता है। प्रभु अत्यंत करुणामय हैं, इसलिए उनके संकल्प में ही अपनी रक्षा का कारण मानकर, भक्त उनसे ऐसे शाश्वत दास्य का वरदान माँगता है जिससे उसे भगवत्-अनुभव प्राप्त हो। वह कहता है कि भले ही उसमें कोई संगीतमयता या ज्ञान की परिपक्वता न हो, फिर भी वह केवल इस गद्य के उच्चारण से, इसमें वर्णित तत्वों पर अपने मन को स्थिर करता है और उसे विश्वासपूर्वक भगवान के समक्ष अर्पित करता है।

अपरिमित करुणा-अमृत के सागर, शरणागत रक्षक और विश्व के एकमात्र आश्रय श्रीरंगनाथ को भक्तिपूर्ण नमस्कार के साथ यह गद्य समाप्त होता है। समग्र गद्य भक्त की पूर्ण असहाय स्थिति, भगवान के परिपूर्ण रक्षक स्वरूप और शरणागति की मधुरता को अद्भुत रूप से व्यक्त करता है। यह भगवद् भक्तों के लिए शरणागति का परम मार्ग दिखाने वाला एक दिव्य मार्गदर्शक है।

लाभ (Benefits):

  • संपूर्ण शरणागति का भाव बढ़ता है: इस गद्य का पाठ करने से भगवान के चरणों में पूर्ण शरणागत होने का भाव गहराई से स्थापित होता है, जिससे मन को परम शांति मिलती है।
  • अहंकार और कर्मबंधनों का भार कम होता है: भगवान को पूर्णतः समर्पित होने से स्वयं के प्रयासों का अहंकार और पूर्व कर्मों का बोझ कम होता है, जिससे मन हल्का और मुक्त महसूस करता है।
  • भगवान का सान्निध्य, शांति और करुणा प्राप्त होती है: शरणागति के माध्यम से भक्त भगवान के निकट आता है, जिससे उसे दिव्य शांति और भगवान की अपार करुणा की प्राप्ति होती है।
  • सेवाभाव और दास्य स्वभाव विकसित होता है: स्वयं को भगवान का नित्य सेवक मानने से सेवा की भावना और निर्मल दास्य भाव विकसित होता है, जिससे जीवन में संतुष्टि और आनंद मिलता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

श्री रंग गद्यं क्या है?
श्री रंग गद्यं भगवद् रामानुजाचार्य द्वारा श्रीरंगनाथ को समर्पित एक गहन शरणागति स्तोत्र है। यह भक्त की परम भक्ति और भगवान के अनंत कल्याणकारी गुणों का वर्णन करता है।
श्री रंग गद्यं का पाठ कब करना चाहिए?
इस गद्य का पाठ किसी भी शुभ समय पर या प्रतिदिन किया जा सकता है। विशेष रूप से जब मन को शांति चाहिए हो या आध्यात्मिक उन्नति की इच्छा हो, तब इसका पाठ करना उत्तम होता है।
श्री रंग गद्यं के पाठ से क्या लाभ होते हैं?
श्री रंग गद्यं का पाठ करने से संपूर्ण शरणागति का भाव विकसित होता है, अहंकार और कर्मबंधनों का भार कम होता है, और भगवान का सान्निध्य तथा करुणा प्राप्त होती है। यह सेवाभाव को भी बढ़ाता है।
श्री रंग गद्यं का पाठ कौन कर सकता है?
भगवान के प्रति भक्ति और श्रद्धा रखने वाला कोई भी व्यक्ति श्री रंग गद्यं का पाठ कर सकता है। जाति, पंथ या लिंग के भेद के बिना सभी इसे पढ़ने के लिए योग्य हैं।
श्री रंग गद्यं का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
इस गद्य को एक निश्चित संख्या में पाठ करने का कोई नियम नहीं है। भक्त अपनी सुविधा के अनुसार दिन में एक बार या अपनी भक्ति भावना के अनुसार कई बार इसका पाठ कर सकते हैं।
श्री रंग गद्यं की उत्पत्ति कहाँ से हुई?
श्री रंग गद्यं की उत्पत्ति भगवद् रामानुजाचार्य से हुई है। उन्होंने श्रीरंगम क्षेत्र में श्रीरंगनाथ की उपस्थिति में इसे रचा था, और यह वेदांत दर्शन का सार प्रस्तुत करता है।

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