श्री राम कवचं
अगस्तिरुवाच |
आजानुबाहुमरविंददळायताक्ष-
-माजन्मशुद्धरसहासमुखप्रसादं |
श्यामं गृहीत शरचापमुदाररूपं
रामं सराममभिराममनुस्मरामि || 1 ||
अस्य श्रीरामकवचस्य अगस्त्य ऋषिः अनुष्टुप् छंदः सीतालक्ष्मणोपेतः श्रीरामचंद्रो देवता श्रीरामचंद्रप्रसादसिद्ध्यर्थे जपे विनियोगः |
अथ ध्यानं |
नीलजीमूतसंकाशं विद्युद्वर्णांबरावृतं |
कोमलांगं विशालाक्षं युवानमतिसुंदरं || 1 ||
सीतासौमित्रिसहितं जटामुकुटधारिणं |
सासितूणधनुर्बाणपाणिं दानवमर्दनं || 2 ||
यदा चोरभये राजभये शत्रुभये तथा |
ध्यात्वा रघुपतिं क्रुद्धं कालानलसमप्रभं || 3 ||
चीरकृष्णाजिनधरं भस्मोद्धूळितविग्रहं |
आकर्णाकृष्टविशिखकोदंडभुजमंडितं || 4 ||
रणे रिपून् रावणादींस्तीक्ष्णमार्गणवृष्टिभिः |
संहरंतं महावीरमुग्रमैंद्ररथस्थितं || 5 ||
लक्ष्मणाद्यैर्महावीरैर्वृतं हनुमदादिभिः |
सुग्रीवाद्यैर्माहावीरैः शैलवृक्षकरोद्यतैः || 6 ||
वेगात्करालहुंकारैर्भुभुक्कारमहारवैः |
नदद्भिः परिवादद्भिः समरे रावणं प्रति || 7 ||
श्रीराम शत्रुसंघान्मे हन मर्दय खादय |
भूतप्रेतपिशाचादीन् श्रीरामाशु विनाशय || 8 ||
एवं ध्यात्वा जपेद्रामकवचं सिद्धिदायकं |
सुतीक्ष्ण वज्रकवचं शृणु वक्ष्याम्यनुत्तमं || 9 ||
अथ कवचं |
श्रीरामः पातु मे मूर्ध्नि पूर्वे च रघुवंशजः |
दक्षिणे मे रघुवरः पश्चिमे पातु पावनः || 10 ||
उत्तरे मे रघुपतिर्भालं दशरथात्मजः |
भ्रुवोर्दूर्वादलश्यामस्तयोर्मध्ये जनार्दनः || 11 ||
श्रोत्रं मे पातु राजेंद्रो दृशौ राजीवलोचनः |
घ्राणं मे पातु राजर्षिर्गंडौ मे जानकीपतिः || 12 ||
कर्णमूले खरध्वंसी भालं मे रघुवल्लभः |
जिह्वां मे वाक्पतिः पातु दंतपंक्ती रघूत्तमः || 13 ||
ओष्ठौ श्रीरामचंद्रो मे मुखं पातु परात्परः |
कंठं पातु जगद्वंद्यः स्कंधौ मे रावणांतकः || 14 ||
धनुर्बाणधरः पातु भुजौ मे वालिमर्दनः |
सर्वाण्यंगुलिपर्वाणि हस्तौ मे राक्षसांतकः || 15 ||
वक्षो मे पातु काकुत्स्थः पातु मे हृदयं हरिः |
स्तनौ सीतापतिः पातु पार्श्वं मे जगदीश्वरः || 16 ||
मध्यं मे पातु लक्ष्मीशो नाभिं मे रघुनायकः |
कौसल्येयः कटी पातु पृष्ठं दुर्गतिनाशनः || 17 ||
गुह्यं पातु हृषीकेशः सक्थिनी सत्यविक्रमः |
ऊरू शार्ङ्गधरः पातु जानुनी हनुमत्प्रियः || 18 ||
जंघे पातु जगद्व्यापी पादौ मे ताटकांतकः |
सर्वांगं पातु मे विष्णुः सर्वसंधीननामयः || 19 ||
ज्ञानेंद्रियाणि प्राणादीन् पातु मे मधुसूदनः |
पातु श्रीरामभद्रो मे शब्दादीन्विषयानपि || 20 ||
द्विपदादीनि भूतानि मत्संबंधीनि यानि च |
जामदग्न्यमहादर्पदलनः पातु तानि मे || 21 ||
सौमित्रिपूर्वजः पातु वागादीनींद्रियाणि च |
रोमांकुराण्यशेषाणि पातु सुग्रीवराज्यदः || 22 ||
वाङ्मनोबुद्ध्यहंकारैर्ज्ञानाज्ञानकृतानि च |
जन्मांतरकृतानीह पापानि विविधानि च || 23 ||
तानि सर्वाणि दग्ध्वाशु हरकोदंडखंडनः |
पातु मां सर्वतो रामः शार्ङ्गबाणधरः सदा || 24 ||
इति श्रीरामचंद्रस्य कवचं वज्रसम्मितं |
गुह्याद्गुह्यतमं दिव्यं सुतीक्ष्ण मुनिसत्तम || 25 ||
यः पठेच्छृणुयाद्वापि श्रावयेद्वा समाहितः |
स याति परमं स्थानं रामचंद्रप्रसादतः || 26 ||
महापातकयुक्तो वा गोघ्नो वा भ्रूणहा तथा |
श्रीरामचंद्रकवचपठनाच्छुद्धिमाप्नुयात् || 27 ||
ब्रह्महत्यादिभिः पापैर्मुच्यते नात्र संशयः |
भो सुतीक्ष्ण यथा पृष्टं त्वया मम पुराः शुभं |
तथा श्रीरामकवचं मया ते विनिवेदितं || 28 ||
इति श्रीमदानंदरामायणे मनोहरकांडे सुतीक्ष्णागस्त्यसंवादे श्रीरामकवचं ||
अर्थ
श्री राम कवचम् एक अत्यंत शक्तिशाली और पवित्र रक्षा मंत्र है, जिसे अगस्त्य ऋषि ने आनंद रामायण में सुतीक्ष्ण को उपदेश दिया था। इस कवच का पाठ करने से भगवान श्री राम भक्त को सिर से पैर तक पूर्ण सुरक्षा प्रदान करते हैं। यह केवल शारीरिक सुरक्षा ही नहीं, बल्कि मानसिक, आध्यात्मिक और भावनात्मक संतुलन भी प्रदान करता है। भक्त किसी भी भय, चिंता, रोग या बुरी शक्तियों से मुक्ति पाने के लिए इस कवच का आश्रय लेते हैं। श्री राम को नीले बादल के समान श्याम वर्ण वाले, बिजली के समान चमकीले वस्त्र धारण किए हुए, सीता और लक्ष्मण सहित, कोमल अंगों वाले, विशाल नेत्रों वाले और हाथ में धनुष-बाण धारण कर राक्षसों का संहार करने वाले के रूप में ध्यान किया जाता है।
इस कवच में श्री राम के विभिन्न रूपों का ध्यान किया जाता है। चोरों के भय, राजभय, शत्रु भय के समय, रघुपति के क्रोधित रूप का स्मरण करना चाहिए - जो कालाग्नि के समान तेजस्वी हैं, चीर-कृष्णाजिन धारण किए हुए हैं, भस्म से विभूषित शरीर वाले हैं, कान तक बाण खींचकर कोदण्ड धारण किए हुए हैं, और रावण आदि शत्रुओं का संहार करने वाले महाबली हैं। लक्ष्मण, हनुमान और सुग्रीव जैसे महावीर योद्धाओं से घिरे हुए, जो पर्वत और वृक्षों को उठाए हुए हैं, और तीव्र गर्जनाओं से शत्रुओं का नाश करते हैं, ऐसे रामचन्द्र का ध्यान सभी भयों को दूर करता है। “हे राम! मेरे शत्रुओं का नाश करो, भूतों, प्रेतों और पिशाचों को तुरंत समाप्त करो!” ऐसी प्रार्थना करने से सभी बाधाएँ दूर हो जाती हैं।
यह कवच शरीर के प्रत्येक अंग को सुरक्षा प्रदान करता है। राघव सिर की रक्षा करते हैं, कमल-नयन आँखों की, जानकीपति हृदय की, और विश्वपालक सभी अंगों की रक्षा करते हैं। ज्ञानेंद्रियाँ, प्राणशक्ति, मन, बुद्धि और अहंकार - इन सभी की रक्षा भगवान श्री राम करते हैं। सुग्रीव को राज्य देने वाले राम हमारे शरीर, चिंताओं और मन की रक्षा करते हैं। यह कवच हमारे पिछले जन्मों के पापों को जलाकर भस्म कर देता है और हमें सभी प्रकार के कष्टों से मुक्ति दिलाता है, जिससे भक्तों को श्री राम की अटूट कृपा प्राप्त होती है। कोदंडधारी राम सदैव हमारे शरणागत होते हैं।
जो भी इस श्री राम कवच का भक्तिपूर्वक पाठ करता है या सुनता है, वह श्री रामचन्द्र की कृपा से परमपद को प्राप्त करता है। गोहत्यारे और ब्रह्महत्यारे जैसे महापापी भी इस कवच के पाठ से पापों से मुक्त हो जाते हैं। यह केवल एक रक्षा मंत्र नहीं, बल्कि आत्मोद्धार का मार्ग दिखाने वाला एक दिव्य साधन है। श्री राम की भक्ति को बढ़ाने और जीवन में शांति, समृद्धि तथा मोक्ष की इच्छा रखने वालों के लिए यह कवच एक अनमोल निधि है।
लाभ (Benefits):
- पूर्ण सुरक्षा: भगवान श्री राम सिर से पैर तक शरीर के प्रत्येक अंग की रक्षा करते हैं, जिससे शारीरिक हानियों से मुक्ति मिलती है।
- भय और चिंता का निवारण: चोरों के भय, शत्रुओं के भय, राजभय और अन्य सभी प्रकार की चिंताओं से मुक्ति मिलती है।
- शत्रु संहार: यह शत्रुओं, बुरी शक्तियों, भूत-प्रेत-पिशाचों जैसी बाधाओं को दूर करता है और जीवन में शांति लाता है।
- पाप मुक्ति: पूर्वजन्मों के पापों और वर्तमान जीवन के पापों को जलाकर आत्मा को शुद्ध करता है।
- आध्यात्मिक उन्नति और मोक्ष: नियमित पाठ से श्री राम की कृपा प्राप्त होती है, जिससे परमपद यानी मोक्ष की प्राप्ति में सहायता मिलती है।
- मानसिक और भावनात्मक शांति: इंद्रियों, प्राणशक्ति, मन, बुद्धि और अहंकार की रक्षा कर मानसिक संतुलन और शांति प्रदान करता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
श्री राम कवचम् क्या है?
श्री राम कवचम् का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
श्री राम कवचम् का पाठ करने के क्या लाभ हैं?
यह कवच कौन पाठ कर सकता है?
श्री राम कवचम् का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
श्री राम कवचम् का मूल क्या है?
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