लक्ष्मण उवाच ।
नमस्ते रामनाथाय त्रिपुरघ्नाय शंभवे ।
पार्वतीजीवितेशाय गणेशस्कंदसूनवे ॥13॥
नमस्ते सूर्यचद्राग्निलोचनाय कपर्दिने ।
नमः शिवाय सोमाय मार्कंडेयभयच्छिदे ॥14॥
नमः सर्वप्रपंचस्य सृष्टिस्थित्यंतहेतवे ।
नम उग्राय भीमाय महादेवाय साक्षिणे ॥15॥
सर्वज्ञाय वरेण्याय वरदाय वराय ते ।
श्रीकंठाय नमस्तुभ्यं पंचपातकभेदिने ॥16॥
नमस्तेऽस्तु परानंदसत्यविज्ञानरूपिणे ।
नमस्ते भवरोगघ्न स्नायूनां पतये नमः ॥17॥
पतये तस्कराणां ते वनानां पतये नमः ।
गणानां पतये तुभ्यं विश्वरूपाय साक्षिणे ॥18॥
कर्मणा प्रेरितः शंभो जनिष्ये यत्र यत्र तु ।
तत्र तत्र पदद्वंद्वे भवतो भक्तिरस्तु मे ॥19॥
असन्मार्गे रतिर्मा भूद्भवतः कृपया मम ।
वैदिकाचारमार्गे च रतिः स्याद्भवते नमः ॥1।49।20॥
इति श्रीस्कंदपुराणे ब्रह्मखंडे सेतुखंडे एकोनपंचाशत्तमाध्यायांतर्गतं
लक्ष्मणकृतं रामनाथस्तोत्रं समाप्तं ।
अर्थ
श्री स्कंद पुराण के ब्रह्मखंड के सेतुखंड में वर्णित यह पवित्र श्री रामनाथ स्तोत्रम, भगवान श्रीराम के अनुज लक्ष्मण द्वारा रचा गया है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब भगवान राम ने लंका जाने से पहले रामेश्वरम में शिवलिंग की स्थापना कर पूजा की थी, तब लक्ष्मण ने राम की आज्ञा से स्वयं रामनाथ स्वामी (श्री रामेश्वरेश्वर) की स्तुति में इस स्तोत्र का पाठ किया था। यह स्तोत्र केवल एक प्रार्थना नहीं, बल्कि एक भाई की भक्ति, समर्पण और भगवान शिव के प्रति उनके गहन ज्ञान का प्रतीक है।
इस स्तोत्र में, लक्ष्मण भगवान शिव की विभिन्न दिव्य गुणों के साथ स्तुति करते हैं। वे शिव को त्रिपुरांतक (त्रिपुरों का नाश करने वाले), पार्वती के जीवनाधीश (पार्वती के पति), गणेश और स्कंद के पिता, सूर्य, चंद्र और अग्नि को अपने नेत्रों के रूप में धारण करने वाले, मार्कंडेय के भय को हरने वाले, और समस्त ब्रह्मांड की सृष्टि, स्थिति तथा संहार के हेतु के रूप में वर्णित करते हैं। लक्ष्मण की यह स्तुति भक्तों को भगवान की अनंत शक्ति और करुणा का स्मरण कराती है, जो जीवन के हर पहलू में व्याप्त है।
लक्ष्मण शिव को 'उग्र' और 'भीम' रूप में, महादेव के रूप में, साक्षी के रूप में, सर्वज्ञ, श्रेष्ठ, वर देने वाले, और श्रीकंठ के रूप में पूजते हैं। वे उन्हें पांच महापातकों का नाश करने वाले, परमानंद, सत्य और विज्ञान स्वरूप, तथा भव रोग का नाश करने वाले के रूप में भी संबोधित करते हैं। इस स्तोत्र का प्रत्येक श्लोक शिव के विभिन्न गुणों, महिमाओं और अनंत शक्तियों का गुणगान करता है, जो लक्ष्मण की गहरी भक्ति और पूर्ण शरणागति को दर्शाता है। यह स्तोत्र यह भी बताता है कि शिव केवल संहारक नहीं, बल्कि लोक कल्याण के लिए दुष्ट शक्तियों का नाश करने वाले और सज्जनों के रक्षक भी हैं।
स्तोत्र के अंत में, लक्ष्मण भगवान शिव से अपनी हार्दिक प्रार्थना करते हैं। वे कहते हैं, “हे शंभो, मैं जिस भी जन्म में, जहाँ भी जन्म लूँ, मेरा मन सदैव आपके चरण कमलों में ही लीन रहे। आपकी कृपा से मेरा मन कभी भी असन्मार्ग में आसक्त न हो, और मैं सदैव वैदिक आचार-मार्ग में ही रत रहूँ।” यह प्रार्थना निष्काम भक्ति का उत्कृष्ट उदाहरण है, जो आत्मा की शुद्धि और निरंतर भगवद् भक्ति की कामना करती है। यह केवल लौकिक इच्छाओं की पूर्ति का स्तोत्र नहीं, बल्कि आत्मोन्नति और मोक्ष के मार्ग को प्रशस्त करता है।
लाभ (Benefits):
- पाप मुक्ति: इस स्तोत्र के पाठ से भक्तों के संचित पाप नष्ट होते हैं और मन शुद्ध होता है।
- भय और दरिद्रता का नाश: रामनाथ स्तोत्र का नियमित पाठ सभी प्रकार के भय और दरिद्रता को दूर कर भक्तों को साहस और समृद्धि प्रदान करता है।
- मानसिक शांति: इस स्तोत्र का पाठ मन को शांति और स्थिरता प्रदान करता है, जिससे मानसिक कष्ट दूर होते हैं।
- निष्ठावान भक्ति की वृद्धि: यह अहंकार को दूर कर भगवान शिव और श्रीराम के प्रति निष्काम भक्ति और समर्पण की भावना को बढ़ाता है।
- आध्यात्मिक उन्नति: शिव के गुणों का स्तवन करने से भक्त आध्यात्मिक रूप से उच्च स्तर प्राप्त करने में सहायता मिलती है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
श्री रामनाथ स्तोत्रं क्या है?
इस स्तोत्र का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
श्री रामनाथ स्तोत्रं के पाठ से क्या प्रमुख लाभ होते हैं?
इस स्तोत्र का पाठ कौन कर सकता है?
इस स्तोत्र का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
इस स्तोत्र का मूल या स्रोत क्या है?
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