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श्री पुरुषोत्तम स्तुतिः (प्रह्लाद कृतं)

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स्तोत्रश्री महाविष्णु
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श्री पुरुषोत्तम स्तुतिः (प्रह्लाद कृतं)

ॐ नमः परमार्थार्थ स्थूलसूक्ष्मक्षराक्षर |
व्यक्ताव्यक्त कलातीत सकलेश निरंजन || 1 ||

गुणांजन गुणाधार निर्गुणात्मन् गुणस्थिर |
मूर्तामूर्त महामूर्ते सूक्ष्ममूर्ते स्फुटास्फुट || 2 ||

करालसौम्यरूपात्मन् विद्याविद्यालयाच्युत |
सदसद्रूप सद्भाव सदसद्भावभावन || 3 ||

नित्यानित्यप्रपंचात्मन् निष्प्रपंचामलाश्रित |
एकानेक नमस्तुभ्यं वासुदेवादिकारण || 4 ||

यः स्थूलसूक्ष्मः प्रकटः प्रकाशो
यः सर्वभूतो न च सर्वभूतः |
विश्वं यतश्चैतदविश्वहेतो-
-र्नमोऽस्तु तस्मै पुरुषोत्तमाय || 5 ||

इति श्रीविष्णुपुराणे प्रथमांशे विंशोऽध्याये प्रह्लादकृत श्री पुरुषोत्तम स्तुतिः |

अर्थ

श्री पुरुषोत्तम स्तुति प्रह्लाद महाराज द्वारा परमपुरुष भगवान विष्णु को अर्पित एक अत्यंत गहन दार्शनिक स्तोत्र है। यह विष्णु पुराण के प्रथमांश के बीसवें अध्याय में वर्णित है। इसमें भगवान के स्थूल-सूक्ष्म रूप, सगुण-निर्गुण स्वरूप, व्यक्त-अव्यक्त स्वरूप, उनकी नित्यता और सर्वव्यापकता का अद्भुत वर्णन किया गया है। प्रह्लाद भगवान की अनंत महिमा, उनकी सृष्टि, स्थिति और लय के पीछे के सिद्धांत का अत्यंत भक्तिपूर्ण ढंग से स्तवन करते हैं।

पहले श्लोक में, प्रह्लाद परमार्थ स्वरूप भगवान को नमस्कार करते हैं। वे समझाते हैं कि भगवान स्थूल रूपों में (दृश्य जगत), सूक्ष्म रूपों में (अदृश्य तत्व), क्षर (नाशवान) और अक्षर (अविनाशी) भूतों में, व्यक्त (प्रकट) और अव्यक्त (अप्रकट) स्वरूप में विद्यमान हैं। वे समस्त लोकों के स्वामी, निष्कलंक और नित्य शुद्ध हैं। यहाँ भगवान की सर्वव्यापकता और शुद्धता को उजागर किया गया है।

दूसरे श्लोक में, प्रह्लाद घोषणा करते हैं कि भगवान गुणों (सत्व, रजस, तमस) का सृजन करने वाले होते हुए भी, वे उन गुणों से अतीत निर्गुण आत्मा हैं। वे ही गुणों के आधार हैं और गुणों से परे निर्गुण स्वरूप भी हैं। वे ही मूर्त रूप (आकार सहित) और अमूर्त रूप (आकार रहित) में विद्यमान महामूर्ति हैं। सूक्ष्म रूप में ग्राह्य वे ही हैं, और स्पष्ट रूप से दर्शन देने वाले महास्वरूप भी वे ही हैं। यह भगवान के सगुण और निर्गुण दोनों अद्भुत स्वरूपों को दर्शाता है।

तीसरे और चौथे श्लोक में, प्रह्लाद कहते हैं कि भगवान कभी उग्र रूप में (दुष्टों के संहार के लिए), तो कभी शांत और सौम्य रूप में (भक्तों पर कृपा करने के लिए) प्रकट होते हैं। वे विद्या के मूल हैं, और अविद्या का कारण बनने वाली माया के भी आत्मस्वरूप आधार हैं। सत् (सत्य) और असत् (असत्य) दोनों रूपों से परे नित्य सत्ता वे ही हैं। भगवान ही नित्य परब्रह्म हैं, और अनित्य इस जगत के आधार भी वे ही हैं। वे निष्कलंक, निष्प्रपंच स्वरूप हैं, एकत्व भी वे ही हैं और अनेकत्व भी वे ही हैं। जगत के प्रारंभ के मूल कारण वासुदेव तत्व के परमात्मा भी वे ही हैं, इस प्रकार उनकी सर्वोच्चता का वर्णन करते हैं।

अंतिम श्लोक में, प्रह्लाद परम रहस्य को उजागर करते हैं—भगवान ही स्थूल हैं, वे ही सूक्ष्म हैं, वे ही प्रकाश हैं, और वे ही संपूर्ण विश्व का स्वरूप हैं। वे सभी प्राणियों में विद्यमान हैं, फिर भी किसी भी भौतिक रूप में उन्हें बांधा नहीं जा सकता। यह ब्रह्मांड उन्हीं से उत्पन्न हुआ है, लेकिन उनका कोई कारण नहीं है। ऐसे पुरुषोत्तम को मेरे अनंत नमस्कार, वे भक्तिपूर्वक प्रार्थना करते हैं। यह स्तोत्र सिखाता है कि भगवान सभी रूपों से परे, सर्वव्यापी, नित्य, स्वतंत्र और आत्मस्वरूप ही उनका वास्तविक स्वरूप है, जो भक्तों को गहरा आध्यात्मिक ज्ञान प्रदान करता है।

लाभ (Benefits):

  • गहरी शांति और स्थिरता: इस स्तोत्र का पाठ मन को अगाध शांति और आध्यात्मिक स्थिरता प्रदान करता है, आंतरिक उलझनों को दूर करता है।
  • आध्यात्मिक स्पष्टता: आत्म तत्व, परमात्मा के स्वरूप और शरणागति के महत्व के बारे में स्पष्ट समझ प्रदान करता है, भक्ति को मजबूत करता है।
  • भय और अज्ञान का निवारण: भगवान की सर्वव्यापकता और शक्ति का ज्ञान भय, चिंता और अज्ञान को दूर करता है, मन में साहस भरता है।
  • ज्ञान और भक्ति का संतुलन: भगवान के दार्शनिक स्वरूप का वर्णन भक्ति और ज्ञान के बीच संतुलन स्थापित करने में मदद करता है, आध्यात्मिक प्रगति का मार्ग प्रशस्त करता है।
  • परमात्मा की अनुभूति: पुरुषोत्तम के अनंत गुणों का स्मरण करने से भक्तों को परमात्मा की अनुभूति के मार्ग पर आगे बढ़ने की प्रेरणा मिलती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

श्री पुरुषोत्तम स्तुति क्या है?
यह प्रह्लाद महाराज द्वारा परमपुरुष भगवान विष्णु को समर्पित एक गहरा दार्शनिक स्तोत्र है। यह भगवान के सर्वव्यापी, नित्य और गुणों से परे स्वरूप का वर्णन करता है।
इस स्तोत्र का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
इस स्तोत्र का पाठ प्रतिदिन सुबह स्नान के बाद, शुद्ध मन से भगवान विष्णु का ध्यान करते हुए किया जा सकता है। किसी भी शुभ दिन या एकादशी पर इसका पाठ करना विशेष फलदायी होता है।
श्री पुरुषोत्तम स्तुति का पाठ करने के क्या लाभ हैं?
इस स्तोत्र का पाठ मन को गहरी शांति, आध्यात्मिक स्पष्टता, भय और अज्ञान का निवारण, तथा ज्ञान और भक्ति का संतुलन प्रदान करता है। यह परमात्मा की अनुभूति के मार्ग में सहायता करता है।
किसे श्री पुरुषोत्तम स्तुति का पाठ करना चाहिए?
भगवान विष्णु में भक्ति रखने वाले, आध्यात्मिक प्रगति चाहने वाले, और जीवन में शांति व स्पष्टता खोजने वाले कोई भी व्यक्ति इस स्तोत्र का पाठ कर सकता है। इस पर लिंग या आयु का कोई प्रतिबंध नहीं है।
इस स्तोत्र का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
इस स्तोत्र का पाठ दिन में कम से कम एक बार करना उत्तम है। अधिक फल के लिए, आप अपने समय और भक्ति के अनुसार 3, 5, 11, या 108 बार इसका पाठ कर सकते हैं। मुख्य बात मन की एकाग्रता है।
श्री पुरुषोत्तम स्तुति का मूल स्रोत क्या है?
यह स्तोत्र श्री विष्णु पुराण के प्रथमांश के बीसवें अध्याय में प्रह्लाद महाराज द्वारा भगवान विष्णु को की गई प्रार्थना के रूप में मिलता है।

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